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पैकेज्ड फूड का पैकेट पीछे पलटने जरूरत नहीं, सामने लिखा मिलेगा, अंदर कितनी शुगर, कितना नमक और कितना फैट है

10 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था. इसमें मांग की गई थी कि पैकेट वाले खाने पर सामने की तरफ ‘वॉर्निंग लेबल’ लगाना मैंडेटरी किया जाए.

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चिप्स, नमकीन, बिस्किट आपको भी बहुत पसंद हैं?

किसी पैकेज्ड फूड आइटम में कितनी शुगर है, कितना नमक है, कितना फैट है, ये जानकारी जल्द ही पैकेट के आगे लिखी मिलेगी. आपको पैकेट पलटकर इंग्रीडिएंट लिस्ट देखने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

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दरअसल, 10 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था. इस याचिका में मांग की गई थी कि पैकेट वाले खाने पर सामने की तरफ ‘वॉर्निंग लेबल’ लगाना मैंडेटरी किया जाए. कोर्ट को भी ये मांग जायज़ लगी. फिर जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिव के.वी.विश्वनाथन की बेंच ने FSSAI को कुछ निर्देश दिए. FSSAI यानी Food Safety and Standards Authority of India. वही FSSAI, जिसके हिस्से का काम आजकल तमाम यूट्यूब चैनल्स और इंफ्लुएंसर्स करते हैं.

बेंच ने कहा कि जिन पैकेटबंद चीज़ों में ज़्यादा नमक, चीनी और सैचुरेटेड फैट हो, उनके फ्रंट साइड पर वॉर्निंग लेबल लगाने पर गंभीरता से विचार किया जाए. साथ ही, FSSAI 4 हफ्तों के भीतर जवाब दे कि इस बारे में क्या कदम उठाए जाएंगे.

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बेंच ने ये भी कहा कि कंपनियां ऐसे नियमों का विरोध कर सकती हैं. लेकिन FSSAI इन कंपनियों के फायदे को नहीं, बल्कि लोगों की सेहत को ऊपर रखे. कोर्ट ने ये भी साफ कहा कि अगर FSSAI ने कदम नहीं उठाए. तो कोर्ट खुद दखल देगा.

पैकेटबंद चीज़ों में मौजूद ज़्यादा नमक, शुगर, सैचुरेटेड फैट सेहत पर क्या असर डालते हैं? भारत में जिस तरह मोटापा, डायबिटीज़ और दिल की बीमारियां बढ़ रही हैं, उसे देखते हुए ऐसे लेबल कितने ज़रूरी हैं? और क्या सिर्फ लेबल लगाना काफी है? ये सब हमने पूछा Ultra-Processed Foods & Human Health पर दी लैंसेट की सीरीज़ के को-ऑथर, और, Nutrition Advocacy for Public Interest नाम के थिंक टैंक के कन्वीनर डॉक्टर अरुण गुप्ता से.

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डॉ. अरुण गुप्ता, कन्वीनर, न्यूट्रिशन एडवोकेसी फॉर पब्लिक इंटरेस्ट

डॉक्टर अरुण कहते हैं कि ज़्यादातर पैकेज्ड फूड्स में फाइबर, विटामिन्स और मिनरल्स जैसे ज़रूरी पोषक तत्व नहीं होते. इनमें फैट और शुगर भर-भरकर डाले जाते हैं. इनसे मोटापा बढ़ता है. फिर मोटापे से डायबिटीज़ का रिस्क बढ़ता है.

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इसके अलावा, इनमें सोडियम का भी खूब इस्तेमाल होता है. ज़्यादा नमक की वजह से ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है. हाई बीपी यानी दिल की बीमारियों का ख़तरा. ज़्यादा सोडियम की वजह से किडनियों को भी नुकसान पहुंचता है. पैकेज्ड फूड्स में कलर और प्रिज़रवेटिव्स भी डाले जाते हैं. ये भी शरीर के लिए लिए अच्छे नहीं होते. इसलिए ये चीज़ें जितना कम खाएं, उतना अच्छा.

भारत में जिस तरह मोटापा, डायबिटीज़ और दिल की बीमारियां बढ़ रही हैं. उसे देखते हुए पैकेज्ड फूड के आगे लेबल होना ही चाहिए. ये जानना हमारा अधिकार है कि हम जो खा रहे हैं. उसमें क्या-क्या डाला गया है, ताकि तय कर सकें कि हमें वो चीज़ खानी भी है या नहीं.

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एक हेल्दी चॉइस के लिए पैकेट के फ्रंट साइड पर वॉर्निंग लेबल मैंडेटरी होना चाहिए (फोटो: Freepik)

पैकेट के फ्रंट साइड पर वॉर्निंग लेबल लगाना मैंडेटरी करना चाहिए. अगर ये मैंडेटरी नहीं होगा. तो शायद कंपनियां इस पर अमल नहीं करेंगी. फिर लोग जाने-अनजाने ज़्यादा शुगर, नमक या फैट वाली चीज़ें खरीदते रहेंगे.

वैसे सिर्फ वॉर्निंग लेबल लगाना काफी नहीं होगा. सरकार को कुछ और ठोस कदम भी उठाने चाहिए. मसलन जिस भी फूड आइटम में शुगर, नमक या फैट ज़्यादा हो. उसका विज्ञापन टीवी, अखबार और सोशल मीडिया पर बंद कर दिया जाए. अगर ऐड पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई जा सकती, तो उसके घंटे तय किए जाएं. जैसे सुबह 6 से रात 11 बजे तक सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के विज्ञापन न आएं.

जिस भी प्रोडक्ट में चीनी, नमक या फैट तय सीमा से ज़्यादा हो, उस पर ज़्यादा टैक्स लगाया जाए. फिर इस पैसे का इस्तेमाल हेल्दी फूड को सस्ता बनाने के लिए किया जाए.

स्कूल कैंटीन्स में हाई फैट, हाई शुगर वाले प्रोडक्ट बिकने बंद हों. वहां सिर्फ हेल्दी चीज़ें ही मिलें.

साथ ही, सरकार कैंपेन करके लोगों को बताए कि कौन-सी चीज़ हेल्दी है. कौन-सी नहीं. सरकार के पास संस्थाएं हैं. संसाधन है. इनके ज़रिए हर भाषा में जानकारी आम लोगों तक पहुंचाई जा सकती है. जब इन सभी सुधारों को एक साथ लागू किया जाएगा. तभी असर देखने को मिलेगा.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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