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पेट पर चर्बी मतलब डायबिटीज होना तय? डॉक्टरों ने एक-एक बात बताई

डायबिटीज़ और ओबेसिटी को मिलाकर 'डायबेसिटी' कहते हैं. डायबेसिटी शब्द इसलिए बना क्योंकि डायबिटीज़ और मोटापे के बीच संबंध है.

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आपका बेली फैट है या नहीं? (फोटो: Freepik)

'Diabesity'. ये शब्द शायद आप पहली बार सुन रहे होंगे. लेकिन डॉक्टर्स आजकल इसके बारे में खूब बात कर रहे हैं. ये एक साइलेंट एपिडेमिक है, जो हम सबकी नजरों के ठीक सामने होते हुए भी छुपा है. डायबेसिटी कोई नई बीमारी नहीं है. वेट गेन और डायबिटीज़ के बीच की कड़ी है. हममें से कई लोगों को लगता है कि तोंद होना एक आम बात है. ज़्यादा से ज़्यादा इंसान फ़िट नहीं दिखता. लेकिन असल में ये एक मेटाबॉलिक वार्निंग है, जो आपका शरीर दे रहा है.

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कैसी वार्निंग? सब बताते हैं. पहले जानें कि वज़न बढ़ने के साथ-साथ डायबिटीज़ का ख़तरा क्यों बढ़ता है. ये हमें समझाया 3 एक्सपर्ट्स ने. पहली एक्सपर्ट हैं डॉक्टर अंबिका टंडन, असिस्टेंट प्रोफेसर, एंडोक्रिनोलॉजी डिपार्टमेंट, SGPGIMS, लखनऊ से. दूसरी एक्सपर्ट हैं डॉक्टर सोनल श्रीवास्तव, सीनियर कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, फाउंडर एंड डायरेक्टर, सोविन हॉर्मोन क्लीनिक, देहरादून से. तीसरी एक्सपर्ट हैं डॉक्टर सुचित्रा यादव, कंसल्टेंट एंडोक्रिनोलॉजिस्ट, अक्षत रिट्रीट, जयपुर से. 

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डॉक्टर अंबिका टंडन, डॉक्टर सोनल श्रीवास्तव, डॉक्टर सुचित्रा यादव
डायबेसिटी क्या होती है?

डायबेसिटी दो शब्द से बना है- डायबिटीज़ और ओबेसिटी (मोटापा). डायबेसिटी शब्द इसलिए बना क्योंकि डायबिटीज़ और मोटापे के बीच संबंध है. देखा गया है कि ओवरवेट या ओबीज़ लोगों को डायबिटीज़ होने का रिस्क ज़्यादा है. खासकर उन लोगों के साथ, जिनके पेट के आसपास चर्बी ज़्यादा जमा होती है. मोटापे और डायबिटीज़ के संबंध को समझाने के लिए 'डायबेसिटी' शब्द बनाया गया है. 

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हालांकि, ये ज़रूरी नहीं है कि मोटापे से जूझ रहे हर व्यक्ति को डायबिटीज़ या डायबेसिटी हो. डायबेसिटी का मतलब सिर्फ वज़न ज़्यादा होना नहीं है. इसका मतलब है कि मोटापे के कारण शरीर में मेटाबॉलिक दिक्कतें होना. ये दिक्कतें धीरे-धीरे शरीर के अलग-अलग अंगों पर असर डालती हैं.

किस तरह का वेट गेन 'रेड फ्लैग'?

मोटापे से जूझ रहे लोग दो तरह के होते हैं. एक होते हैं मेटाबॉलिकली हेल्दी, और दूसरे मेटाबॉलिकली अनहेल्दी. जिनके पेट पर ज़्यादा फैट जमा होता है, वो मेटाबॉलिकली अनहेल्दी होते हैं. भले ही उनके बाकी शरीर पर फैट जमा न हो. ऐसे लोगों को 'मेटाबॉलिकली अनहेल्दी नॉन ओबीस' कहा जाता है. वहीं अगर किसी व्यक्ति के पेट पर ज़्यादा चर्बी नहीं है, लेकिन पूरे शरीर पर हल्का मोटापा है. तब ये ज़रूरी नहीं कि वो व्यक्ति मेटाबॉलिकली अनहेल्दी हो. यानी शरीर में चर्बी कहां जमा हो रही है, ये भी बहुत मायने रखता है. 

शरीर में फैट दो तरह का होता है- विसरल फैट और सबक्यूटेनियस फैट. विसरल फैट पेट के आसपास जमा होता है, जैसे लिवर के आसपास. ये फैट शरीर में सूजन बढ़ा सकता है. इससे इंसुलिन रेज़िस्टेंस हो सकता है. आगे चलकर मेटाबॉलिक कॉम्प्लिकेशंस हो सकते हैं. इसलिए पेट के आसपास जमा होने वाला फैट ज़्यादा ख़तरनाक माना जाता है.

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पेट की चर्बी डायबिटीज़ का रिस्क बढ़ाती है (फोटो: Getty)
पेट की चर्बी ख़तरे की घंटी क्यों?

पेट के आसपास चर्बी जमा होने से मेटाबॉलिज़्म कंट्रोल करने वाले अंगों, जैसे लिवर और पैंक्रियाज़ के आसपास भी फैट जमा होने लगता है. इसकी वजह से शरीर में इंसुलिन रेज़िस्टेंस हो जाता है. इंसुलिन रेज़िस्टेंस का मतलब है कि शरीर में इंसुलिन तो ठीक से बन रहा है, पर सेल्स उसे ठीक से पहचान नहीं पा रहे. इस वजह से ब्लड शुगर बढ़ सकती है. ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है. खून में कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है. शरीर में सूजन बढ़ सकती है. इन सबसे हार्ट अटैक का रिस्क भी बढ़ जाता है.

बिना लक्षण डायबेसिटी हो सकती है?

डायबेसिटी के शुरुआती चरण में अक्सर कोई लक्षण महसूस नहीं होते. जब ब्लड शुगर काफी बढ़ जाती है, तब कुछ लक्षण दिखाई देने लगते हैं. जैसे बहुत प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना और लगातार थकान महसूस होना. लेकिन ये लक्षण आमतौर पर काफी देर से सामने आते हैं. इसलिए जल्दी जांच कराना ज़रूरी है. मोटापे से जूझ रहे लोगों को शुगर, लिवर और कोलेस्ट्रॉल से जुड़ी जांचें करानी चाहिए. जिससे दिक्कत आगे बढ़ने से रोकी जा सके और समय पर इलाज हो सके.

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मेटाबॉलिज़्म जितना ज़्यादा, फैट लॉस करना उतना आसान (फोटो: Freepik)
मेटाबॉलिज़्म धीमा होने के संकेत

मेटाबॉलिज़्म शरीर की सभी प्रक्रियाओं को कंट्रोल करता है. ये तय करता है कि शरीर कितने प्रभावी तरीके से काम करेगा. मेटाबॉलिज़्म स्लो होने पर शरीर में एनर्जी बनने और खर्च होने की प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है. मेटाबॉलिज्म धीमा होने पर शरीर कई तरह के संकेत देने लगता है. 

जैसे कम खाना खाने के बावजूद वज़न बढ़ना. कई मरीज़ शिकायत करते हैं कि वो कम खाते हैं, फिर भी उनका वजन बढ़ रहा है. वो वज़न घटाने के लिए खूब मेहनत करते हैं, तब भी वज़न कम नहीं होता. वज़न घटाने में मुश्किल आती है. कम खाकर भी वज़न बढ़ जाता है. पेट की चर्बी (बेली फैट) बढ़ने लगती है. बार-बार थकान महसूस होती है. सुबह उठने के बाद और पूरे दिन शरीर में थकान बनी रहती है. शरीर और जोड़ों में दर्द होने लगता है. स्किन पतली और कमज़ोर लगने लगती है. बाल झड़ने लगते हैं और पतले हो जाते हैं. मूड स्विंग्स होने लगते हैं. मसल लॉस होने लगता है. मेटाबॉलिज़्म धीमा होने पर इस तरह के कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं.

तोंद यानी डायबिटीज़ का रिस्क?

सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि तोंद क्या होती है. सुबह खाली पेट नाभि के स्तर पर अपनी कमर (तोंद) को नापें. अगर पुरुषों में ये माप 90 सेमी से ज़्यादा हो और महिलाओं में 80 सेमी से ज़्यादा हो. तब इसे सेंट्रल ओबेसिटी यानी तोंद कहा जाता है. पेट की चर्बी बढ़ने से इंसुलिन रेज़िस्टेंस का खतरा बढ़ जाता है. यानी सेल्स इंसुलिन को ठीक से पहचान या इस्तेमाल नहीं कर पाते. 

हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि डायबिटीज़ ज़रूर होगी. डायबिटीज़ होने के पीछे कुछ और रिस्क फैक्टर्स भी होते हैं. जैसे परिवार में फर्स्ट-डिग्री रिश्तेदार (माता-पिता या भाई-बहन) को डायबिटीज़ होना. हफ्ते में 150 मिनट से कम एक्सरसाइज़ करना. बहुत ज़्यादा बाहर का खाना. 6 घंटे से कम नींद लेना. देर से सोना और देर से जागना. इन रिस्क फैक्टर्स से डायबिटीज़ का रिस्क बढ़ता है.

डायबेसिटी की फैमिली हिस्ट्री वाले क्या करें?

जीन्स एक रिस्क फैक्टर है. लेकिन डायबिटीज़ या डायबेसिटी होगी या नहीं, ये लाइफस्टाइल पर निर्भर करता है. लाइफस्टाइल यानी हमारी दिनचर्या कैसी है. हमारा खान-पान कैसा है. हम एक्सरसाइज़ करते हैं या नहीं. देखा गया है कि अगर पैरेंट्स को 50 साल की उम्र में डायबिटीज़ हुई थी. तब उनके बच्चों को 30-40 साल की उम्र में डायबिटीज़ हो रही है. 

इसका मुख्य कारण लाइफस्टाइल में बदलाव आना है. पहले हमारे माता-पिता ज़्यादा काम करते थे. उस समय कार और बाइक भी इतनी ज़्यादा नहीं थीं. लोग बहुत चलते-फिरते थे, शारीरिक मेहनत भी करते थे. इसलिए एक उम्र तक डायबिटीज़ और मोटापा कंट्रोल में रहता था. अभी हमारा लाइफस्टाइल पूरी तरह बदल गया है. एक्सरसाइज़ करना कम हो गया है. खानपान में बहुत बदलाव आया है. इस वजह से डायबिटीज़ जल्दी हो रही है. लाइफस्टाइल बदलने से डायबिटीज़ को टाला ज़रूर जा सकता है.

सेंट्रल ओबेसिटी पूरी तरह ठीक हो सकती है?

सेंट्रल ओबेसिटी यानी पेट के आसपास ज़्यादा चर्बी जमा होना. इसकी वजह से कमर का घेरा बढ़ जाता है. इसे वेस्ट सरकमफेरेंस (कमर का माप) के ज़रिए मापा जाता है. सेंट्रल ओबेसिटी को रोका जा सकता है. अगर सेंट्रल ओबेसिटी हल्की से मीडियम हो, तो इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. अगर सेंट्रल ओबेसिटी बहुत ज़्यादा हो, तो इसे पूरी तरह खत्म करना मुश्किल हो सकता है.

विसरल फैट कम होने से डायबिटीज़ का रिस्क घट सकता है. मेटाबोलिक सिंड्रोम से जुड़े रिस्क भी कम होते हैं. जैसे कोलेस्ट्रॉल बढ़ना. ब्लड प्रेशर बढ़ना. दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ना. वज़न कम करने से ये सारे रिस्क घटाए जा सकते हैं. 

विसरल फैट कम करने के लिए हाइली रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट न खाएं. टोटल कैलोरी इनटेक कम करें. रोज़ एक्सरसाइज करें. एरोबिक एक्सरसाइज़ के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें. इससे मांसपेशियां मज़बूत होती हैं. रोज़ आधा घंटा एक्सरसाइज़ करने से विसरल फैट घटाने में मदद मिलती है. साथ ही, कई रिस्क फैक्टर्स को भी आसानी से घटाया जा सकता है. 

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घर में लोगों को डायबिटीज़ है, तो आप ज़्यादा सावधान रहें (फोटो: Freepik)
सेंट्रल ओबेसिटी में कौन-सी गलतियां न करें?

सेंट्रल ओबेसिटी कम करने के लिए कई लोग क्रैश डाइट फॉलो करने लगते हैं. वो अपना कैलोरी इनटेक बहुत ज़्यादा कम कर देते हैं. कई बार लोग रोज़ाना 1200 कैलोरी से भी कम खाना शुरू कर देते हैं. इससे शरीर का मेटाबॉलिज़्म 15–20% तक धीमा हो सकता है. मसल लॉस होने लगता है, जिससे मेटाबॉलिज़्म और धीमा हो जाता है. इसलिए सेंट्रल ओबेसिटी कम करने के लिए कभी भी क्रैश डाइट फॉलो न करें.

कुछ लोग केवल रनिंग, जॉगिंग या साइकिलिंग ही करते हैं. वो रेजिस्टेंस ट्रेनिंग नहीं करते. लेकिन सेंट्रल ओबेसिटी घटाने के लिए रेजिस्टेंस ट्रेनिंग बहुत ज़रूरी है. रेजिस्टेंस ट्रेनिंग यानी वो एक्सरसाइज़, जो वज़न या रेज़िस्टेंस के खिलाफ की जाती हैं. 

कई वीडियो में कहा जाता है कि क्रंचेज़ या एब्स की एक्सरसाइज़ करने से पेट की चर्बी कम हो जाएगी. लेकिन सिर्फ किसी एक खास एक्सरसाइज़ से पेट का फैट सीधे कम नहीं होता. जब पूरे शरीर का फैट कम होता है, तभी पेट की चर्बी भी कम होती है. इसके लिए कैलोरी डेफिसिट डाइट और संतुलित एक्सरसाइज़ प्लान अपनाना ज़रूरी है.

स्ट्रेस से 'बेली-डायबिटीज़ साइकिल' का रिस्क?

लंबे समय तक स्ट्रेस में रहने से शरीर में कोर्टिसोल हॉर्मोन बढ़ जाता है. कोर्टिसोल हॉर्मोन बढ़ने से कई चीज़ें होती हैं. इनमें से एक है- पेट के आसपास चर्बी जमा होना. पेट के आसपास ज़्यादा चर्बी जमा होने से इंसुलिन रेज़िस्टेंस होता है. यानी इंसुलिन हॉर्मोन अपना काम ठीक से नहीं कर पाता. इंसुलिन का काम है खाने से बनी शुगर (ग्लूकोज़) को शरीर में इस्तेमाल करवाना. जब इंसुलिन हॉर्मोन अपना काम ठीक से नहीं कर पाता, तब खून में शुगर का लेवल बढ़ता है. ये एक तरह का चक्र बन जाता है.

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रेगुलरली अपना वज़न चेक करना ज़रूरी है (फोटो: Freepik)
घर पर किस तरह के टेस्ट करें?

सबसे पहले अपना वज़न चेक करें. हर हफ्ते या हर महीने एक बार अपना वज़न ज़रूर नापें. अगर आप ओवरवेट हैं, तो हर हफ्ते सुबह खाली पेट अपना वज़न चेक करें. अपना वज़न नोट करके रखें. अगर वज़न तेजी से बढ़ा है, तो ये रेड फ्लैग हो सकता है. तेज़ी से वज़न बढ़ने का मतलब है, एक साल में लगभग 5 किलो वजन बढ़ जाना. 

दूसरा, कमर का घेरा (वेस्ट सरकमफेरेंस) मापें. इसे नापने के लिए टेप को आखिरी पसली और हिप बोन के बीच रखें. ध्यान रखें कि टेप सीधा रहे, टेढ़ा-मेढ़ा न हो. कमर की माप अपनी डायरी में नोट करते रहें. इसे हर महीने कम से कम एक बार ज़रूर चेक करें. महिलाओं में 80 सेमी से ज़्यादा कमर का घेरा होना रेड फ्लैग माना जाता है. ये सेंट्रल ओबेसिटी और विसरल फैट की अधिकता दिखाता है. पुरुषों में 90 सेमी से ज़्यादा कमर का घेरा सेंट्रल ओबेसिटी को दर्शाता है.

तीसरा, अपना ब्लड प्रेशर चेक करें. 35 साल से ज़्यादा उम्र के लोग अपना बीपी रेगुलरली चेक करें. यह मेटाबॉलिक सिंड्रोम का एक अहम हिस्सा है. अगर ब्लड प्रेशर 130/85 से ज़्यादा है, तो डॉक्टर से सलाह लें. 

चौथी चीज़, गर्दन के पीछे की स्किन पर ध्यान दें. अगर वहां की स्किन काली हो रही है या छोटे-छोटे स्किन टैग (मस्से) बन रहे हैं. ये मस्से बहुत तेज़ी से निकल रहे हैं, बगल और गर्दन के पीछे की स्किन काली हो रही है. तब इसे एकैंथोसिस कहते हैं, जो इंसुलिन रेज़िस्टेंस का बहुत बड़ा मार्कर है. ये सभी चीज़ें आप घर पर ही आसानी से चेक कर सकते हैं.

अगर आपकी उम्र 35 साल से ज़्यादा है और कोई खास लक्षण नहीं हैं, तब भी कुछ लैब टेस्ट कराने चाहिए. जैसे लिपिड प्रोफाइल, फास्टिंग शुगर, HbA1c, लिवर फंक्शन टेस्ट और थायरॉइड फंक्शन टेस्ट. ये टेस्ट साल में कम से कम एक बार जरूर कराने चाहिए.

लोगों के लिए सलाह

पेट की चर्बी धीरे-धीरे घटाएं. क्रैश डाइट फॉलो न करें, इससे मेटाबॉलिज़्म धीमा हो सकता है. पेट की चर्बी घटाने के लिए 500 कैलोरी का डेफिसिट करें. अपने खाने में प्रोटीन बढ़ाएं. प्रोटीन लगभग 1.2-1.6 ग्राम प्रति किलो बॉडी वेट के हिसाब से लें. रोज़ 7–9 घंटे की अच्छी नींद लें और समय पर सोने की आदत डालें. बाहर का खाना अवॉयड करें. हफ्ते में कम से कम 150 मिनट एक्सरसाइज करें. इसके अलावा, हफ्ते में 3 दिन रेज़िस्टेंस ट्रेनिंग भी करें. ऐसा करके आप अपने पेट की चर्बी घटा सकते हैं.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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