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पहले खूब मारा, अब ड्रोन हमले कम कर दिए, जंग में बदल गई है ईरान की प्लानिंग

अमेरिका-इजरायल से जंग की शुरुआत में ईरान ने ड्रोन और मिसाइल के कॉम्बिनेशन से अटैक किए. लेकिन दूसरे फेज में मिसाइलों की संख्या कम कर दी. 2 मार्च से 8 मार्च के बीच 120-160 हमले हर दिन किए गए. लेकिन इनमें भी 90 प्रतिशत हमले ड्रोन से हुए. लेकिन अब ड्रोन हमले भी कम किए गए हैं.

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तकरीबन एक हफ्ते से ईरान के ड्रोन हमलों में कमी आई है (PHOTO-IRNA)

ईरान और अमेरिका की जंग में एक हथियार सबसे अधिक चर्चा में है. ये है ईरान का शाहेद-136 ड्रोन. इस ड्रोन ने इजरायल समेत पूरे वेस्ट एशिया में तबाही मचा रखी है. 28 फरवरी को जंग शुरू होने के बाद से ईरान ने हजारों ड्रोन हमले किए हैं. लेकिन, बीते कुछ दिनों से इनकी संख्या में कमी आ रही है. हालांकि इसे भी स्ट्रैटेजी का हिस्सा बताया जा रहा है. डेटा की बारीकी से जांच करने पर पता चला कि ईरान के ड्रोन ऑपरेशंस बिल्कुल प्लानिंग के तहत चलाए गए हैं. ईरान के हमलों को देखें तो ये तीन तरह से, यानी तीन फेज में किए गए. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक भले ही ड्रोन हमलों की अब संख्या कम हो रही है. लेकिन इसके पीछे भी एक पैटर्न छिपा है.

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पहले ताबड़तोड़ हमला कर हिला दिया!

28 फरवरी को इजरायल-अमेरिका ने ईरान पर हमले शुरू किए. इसके बाद ईरान ने जवाब दिया. पहले दिन इरान ने 137 बैलिस्टिक मिसाइल्स और 200 से अधिक ड्रोन हमले किए. अगले दिन भी कुल 362 ड्रोन-मिसाइल हमले हुए. मिलिट्री में ये टैक्टिक्स इसलिए इस्तेमाल की जाती है, ताकि दुश्मन के एयर डिफेंस पोजीशंस का पता लग सके. इस तरह के अलग-अलग हथियारों से हमला करके दुश्मन के रडार एक्टिवेट करवाए जाते हैं. जंग के शुरुआती स्टेज में बैलिस्टिक मिसाइलों का भारी इस्तेमाल किया गया. बैलिस्टिक हथियार ईरान के जखीरे में सबसे कीमती और अहम हथियारों में से एक हैं. शुरुआती दौर में बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती ने अमेरिका-इजरायल पर एक मनोवैज्ञानिक प्रेशर डाला. साथ ही ताबड़तोड़ हमले ने रणनीतिक रूप से ईरान को फायदा पहुंचाया.

फिर पैसे के गणित में उलझाया!

शुरुआत में ईरान ने ड्रोन और मिसाइल के कॉम्बिनेशन से अटैक किए. लेकिन दूसरे फेज में मिसाइलों की संख्या कम कर दी. 2 मार्च से 8 मार्च के बीच 120-160 हमले हर दिन किए गए. लेकिन इनमें भी 90 प्रतिशत हमले ड्रोन से हुए. ईरान के शाहेद ड्रोन, इन्हें रोकने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आधुनिक एयर-डिफेंस मिसाइलों की तुलना में काफी सस्ते हैं. इन ड्रोनों की कीमत लगभग 18 से 50 लाख है. जबकि बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों की कीमत पैट्रियट सिस्टम के लिए 55 करोड़ रुपये और THAAD इंटरसेप्टर के लिए 100 करोड़ तक हो सकती है.

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यह असंतुलन ही इस रणनीति का केंद्र है. विश्लेषकों का अनुमान है कि हमलों की एक लहर में इस्तेमाल हुए ड्रोनों को बनाने में ईरान ने 1.1 करोड़ से 2.7 करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च किए, जबकि बचाव करने वाली टीम ने उन्हें नष्ट करने के लिए इंटरसेप्टर पर करोड़ों डॉलर खर्च कर दिए. दूसरे शब्दों में, बचाव करने वाली टीम ने अपनी सुरक्षा पर हमला करने वाली टीम की तुलना में पांच से दस गुना अधिक पैसा खर्च किया.

अब ड्रोन हमलों में कमी आई, लेकिन क्यों?

9 मार्च के बाद से देखें तो ईरान ने हमले काफी कम कर दिए. इसके भी तीन कारण बताए गए हैं. एक संभावना यह है कि लॉन्च का प्लान इजरायल-अमेरिका के हवाई हमलों के चलते पटरी से उतर गया हो. ये भी संभव है कि ईरान के सप्लाई चेन में दिक्कत आने की वजह से लॉन्च साइट्स पर ड्रोन न पहुंच पा रहे हों. वहीं तीसरी संभावना रणनीतिक चुप्पी की है. संभव है कि ईरान ने हमलों में कटौती इसलिए की है, ताकि उसके पड़ोसी अरब मुल्कों से अधिक तनाव न बढ़े. और ये युद्ध इसी तरह खत्म हो जाए.

वीडियो: ईरान-अमेरिका जंग में यूक्रेन का फायदा हो गया, प्रेसिडेंट ज़ेलेन्स्की ने क्या बताया?

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