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इन 5 कुतर्कों के चलते आपसे लगातार हर बहस जीतते आ रहे हैं लोग

जानिए ‘जिहाद करने वालों को सौ हूरें मिलेंगी’ जैसी बातों की तार्किक काट क्या है?

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फोटो - thelallantop
विवाद कोई भी हो देश, समाज, दुनिया दो धड़ों में बंट ही जाती है. विवाद की ‘आवश्यक शर्त’ ही है – दो धड़े.

# बात और विवाद

और जहां पर दो धड़े होते हैं वहां पर होती हैं बहसें, वाद-विवाद, तीखी नोंक-झोंक और समर्थन-विरोध. हर कोई इस बात से सहमत है कि बातों से हल निकालना, युद्ध करने से, हथियार उठा लेने से कहीं बेहतर है. लेकिन फिर भी क्यूं मुद्दे का हल पाने के लिए लोग हथियार उठा लेते हैं, युद्ध करने लगते हैं, आतंकवादी बन जाते हैं, नक्सली बन जाते हैं? कारण है बातों का असफल हो जाना. और बातों से हल निकले भी तो वो अस्थाई ही रहता है, क्यूंकि दोनों में एक पक्ष हमेशा ठगा हुआ फील करता है. कृष्ण और दुर्योधन के वार्तलाप का असफल हो जाना महाभारत का कारण बना. हिटलर-चर्चिल के बीच कम्युनिकेशन-गैप द्वितीय विश्व युद्ध का. दुखद तो ये है कि अपनी समस्त विभीषिकाओं के बावज़ूद युद्ध भी अंतिम हल नहीं. इसलिए ही तो हमें बार-बार प्रथम विकल्प यानी बातों की ओर रुख करना पड़ता है.

# कैसे करें कोई बहस?

अब बातों से हल निकालने के लिए दो महत्वपूर्ण चीज़ों की ज़रूरत पड़ेगी एक तो जिस मुद्दे पर बात हो रही है उसकी पूरी जानकारी, पक्ष की भी और विपक्ष की भी और दूसरा – हम बात करने में अतार्किकता का तो उपयोग नहीं कर रहे. पहली बात - यानी मुद्दों की जानकारी होना तो हर विवाद के लिए वैरी करता है. पद्मावती विवाद की जानकारी से अयोध्या विवाद का हल नहीं निकाला जा सकता. लेकिन दूसरी बात यानी तार्किकता और अतार्किकता जैनरिक है. और इसलिए शाम को चाय के वक्त होने वाली बहसों से लेकर संसद तक में होनी वाली बहसों को करने वालों या सुनने वालों के लिए इन 5 ‘फॉलसीज’ का ज्ञान होना बहुत जरूरी है. और सबसे इंट्रेस्टिंग बात ये कि इन फॉलसीज को जानने के बाद आपको लगभग हर नेता की बात और हर विवाद बहुत हास्यास्पद लगेगा. आपको हमेशा ये पता चल जाएगा कि कहां पर ये ग़लती कर गया और क्यूं. इसलिए ही हमने हर फॉलसी साथ एक रियल लाइफ उदाहरण दिया है.

# क्या होती है ‘फॉलसी’?

बहस करते वक्त अतार्किक बातें करना और उससे कुछ भी निष्कर्ष निकाल लेना ही फॉलसी है. जैसे कि -'कल तुमने मुझसे दो रूपये लिए और आज दो रूपये और ले लिए है. अब चूंकि दो और दो का योग दस होता है इसलिए तुम मुझे दस रूपये लौटाओगे.' अब इस बात में आपको पता ही है कि कहने वाला क्यूं अतार्किक है. और क्यूं ये कथन एक फॉलसी है. लेकिन हर बार और हर बात में फॉलसी को पहचानना इतना आसान नहीं होता. कई बार अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिये चतुर लोग जानबूझकर फॉलसी का सहारा लेते हैं और कई बार अनजाने में ही हम सब फॉलसी का शिकार हो जाते हैं. क्यूंकि हर बार ये फॉलसी ‘दो और दो, दस’ जैसी आसानी से पकड़ में नहीं आती. और इसलिए ही तो इन 5 तरह की फॉलसी का ज्ञान होना न केवल अपनी बात को दोषमुक्त बनाने के लिये जरूरी है बल्कि किसी दूसरे की बात में भी निहित तर्क दोष को उजागर करके उसे तर्कपूर्ण बात कहने के लिये विवश करने के लिए भी आवश्यक है.

# 1 - नो ट्रू स्कॉट्समैन फॉलसी

(‘जिसने धर्म के लिए हथियार उठाए वो सच्चा मुसलमान नहीं’ ‘जो सच्चा हिंदुस्तानी नहीं होगा वही पाकिस्तान के एक्टर्स का बॉलीवुड में काम करने का समर्थन करेगा.’ ‘सच्चे राष्ट्रभक्त हो तो पढ़ते ही शेयर करो’.)
कल्पना कीजिए कि एक भारतीय, अख़बार में एक लेख पढ़ रहा है – ‘पाकिस्तान में एक यौन-कुंठित व्यक्ति ने लड़कियों पर फिर हमला किया.’ अब, जो हिंदुस्तानी ये लेख पढ़ रहा है वो लेख देखकर चौंकता है और कहता है कि – ‘कोई हिंदुस्तानी कभी ऐसा नहीं करेगा.’ लेकिन अलगे ही दिन वो पढ़ता है – ‘दिल्ली में एक यौन-कुंठित व्यक्ति ने लड़कियों पर हमला किया.’ अब वो इस बात को तो मानेगा नहीं कि कल जो उसने कहा था वो गलत था. इसलिए इस बार वो कहता है – ‘कोई सच्चा हिंदुस्तानी ऐसा नहीं करेगा.’ यहां पर हिंदुस्तानी को ‘स्कॉटिश’ या ‘स्कॉट्समैन’ से बदल दीजिए, क्यूंकि पहली बार जिस ने इस फॉलसी के बारे में लेख लिखा वो एक अंग्रेज़ था. और इसलिए ही इस फॉलसी का नाम अपने सबसे पहले उदाहरण के वजह से ‘नो ट्रू स्कॉट्समैन फॉलसी’ या हिंदी में कहें तो ‘सच्चा स्कॉट्समैन नहीं है फॉलसी’ पड़ गया. ये बड़ी मज़ेदार टाइप फॉलसी है और लगभग हर दूसरे विवाद में ये प्रयुक्त हो ही जाती है. इस तरह की फॉलसी में हम किसी सिद्धांत के प्रतिपक्ष में दिए गए तर्क को केवल यह कहकर खारिज़ कर देते हैं कि तर्क में दिया गया ‘उदाहरण’ सिद्धांत की परिभाषा में फिट ही नहीं बैठता. और हास्यास्पद बात ये कि परिभाषा क्या है इससे किसी को कोई मतलब नहीं. अब आप ही बताइए कि सच्चे हिंदुस्तानी की परिभाषा में ये कहां लिखा है कि व्हाट्सएप मैसेज को पढ़ते ही शेयर करना चाहिए? बहरहाल, ये फॉलसी किस तरह से पूरी बातचीत को दूसरी तरफ मोड़ देता है और किस तरह से ये आज के दौर की सबसे खतरनाक फॉलसी है, ये आप समझ ही गए होंगे. कोई भी असली स्कॉट्समैन ये नहीं करेगा कहकर हमने उस उदाहरण को ही ‘स्कॉट्समैन’ की बिरादरी से बाहर कर दिया. इस फॉलसी से हमें इस बात की शिक्षा भी मिलती है कि ‘तर्कों’ में ‘भावनाओं’ का कोई स्थान नहीं, और होना भी नहीं चाहिए.

# 2 - एड होमिनेम फॉलसी

(‘एक पुरुष होकर महिला हितों की बात कर रहे हो, तुम नारीवादी नहीं ‘फर्ज़ी नाड़ीवादी’ हो’ ’जो लोग ए.सी. रूम में बैठकर पॉलिसी बनाते हैं वो मज़दूरों के लिए कुछ अच्छा करेंगे, ये सोचना भी ग़लत है’)
ऊपर के दोनों कथन एड होमिनेम फॉलसी का शिकार हैं. आइये समझते हैं कैसे. एड होमोनिम एक लैटिन शब्द है. इसमें ‘होमो’ का अर्थ तो पता ही होगा. क्यूंकि हिंदी तक में ‘होमोसेक्शुअल’ और ‘होमोसेपियंस’ जैसे शब्द बहुत प्रयुक्त होते है. इन सभी शब्दों में होमो का अर्थ है – व्यक्ति/मनुष्य/इंसान. और इस तरह, एड होमोनिम का अर्थ बहुत हद तक – ‘व्यक्तिगत’ होता है. देखिये, जब हम किसी के तर्क को ख़ारिज करने के लिए तर्क को छोड़कर तर्क देने वाले व्यक्ति या संस्था पर आक्षेप करने लगते हैं तो हमारी बातें जाने अंजाने इस फॉलसी से प्रभावित हो जाती हैं. पहले उदाहरण में हमने ये नहीं देखा कि उस नारीवादी ने क्या बात कही, ज़रूरत ही नहीं समझी. वो कुछ भी कहे, सत्य या असत्य दोनों ही स्थितियों में हमें ‘पता ही’ है कि वो ‘फर्ज़ी नाड़ीवादी’ है. दूसरे उदाहरण में ए.सी. रूम में बैठे लोग चाहे देश के मजदूरों के लिए कितनी ही अच्छी पॉलिसी बना लें लेकिन हमने इसलिए उस पॉलिसी का खारिज कर दिया क्यूंकि वो ए.सी. रूम में बैठकर बनाई गई है. इस फॉलसी की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि हमको दिए गए तर्कों से फर्क ही नहीं पड़ता, चाहे उन तर्कों की काट करना इश्वर के बस में भी न हो तो भी, हमें उन तर्कों को पढ़ने कि ज़रूरत ही नहीं, वो ग़लत ही हैं, क्यूंकि उनको कहने वाला ग़लत है! आइडिया से करैक्टर में बात शिफ्ट हो जाना ही एड होमिनेम फॉलसी है. विचारों से किरदारों में बात शिफ्ट हो जाना ही एड होमिनेम फॉलसी है.

# 3 - स्ट्रॉमैन फॉलसी

(एक: देश में इनटोलरेंस बढ़ रहा है, हमें देश छोड़ देना चाहिए! दूसरा: तब कहां थे जब 1984 हुआ था, मुजफ्फरनगर हुआ था?)
खेतों को नील गाय, चिड़िया और बंदरों आदि से बचाने के लिए घास-फूस का जो पुतला बनाया जाता है उसे स्ट्रॉमैन कहा जाता है. जानवरों को लगता है कि ये असली इंसान है लेकिन वो असली नहीं ये हम सब जानते हैं. उसी तरह का हिसाब किताब स्ट्रामैन फॉलसी का भी है. आप एक चीज़ को लेकर बहस कर रहे हैं और दूसरा बंदा बहस का रुख बड़ी सफाई से दूसरी तरफ मोड़ देता है, यानी पूरी बहस का एक स्ट्रॉमैन खड़ा कर देता है. होने को ये हमेशा जान बूझ कर नहीं होता कभी कभी हमें संदर्भ नहीं पता होता या कभी कभी हमें पता ही नहीं होता कि घास फूस का पुतला बन गया. दिए गए उदाहरण में बात इनटोलरेंस पर होनी चाहिए थी मगर अब पहले व्यक्ति को ये सफाई देनी पड़ेगी कि वो 1984 में कहां था? एक और उदाहरण देखिए और पहचानिए कि ये स्ट्रॉमैन फॉलसी कैसे है: एक: मुझे लगता है कि टी.वी. के ऊपर भी सेंसरशिप होनी चाहिए, बच्चों पर ग़लत असर पड़ रहा है बिग बॉस का. दूसरा: तुम जैसे लोग ही ‘अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता’ के लिए खतरा हैं. अब जो बात बिग बॉस की सेंसरशिप पर होनी चाहिए थी वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर होगी. और फिर बहस - राउंड एंड राउंड एंड राउंड...

# 4 - फॉलस डिलेमा या ब्लैक एंड व्हाइट फॉलसी

(तुमको मोदी पसंद नहीं, पाकिस्तान चले जाओ.)
ब्लैक एंड वाइट फॉलसी के शिकार कुतर्की को लगता है कि दो ही विकल्प हैं, जबकि ऐसा नहीं होता. देशभक्त न होने का मतलब देशद्रोही होना नहीं होता. ऊपर के उदाहरण में ऐसा लगता है कि दुनिया में दो ही लोग है – पहला जो मोदी को पसंद करते हैं दूसरे जो देशद्रोही हैं. अब यदि हम पापा से कहें कि - 'मुझे बी.टेक. नहीं करना 'और पापा कहें कि - 'तो क्या बेरोजगार रहेगा?' तो पापा की बातें फॉलस डिलेमा का शिकार हैं, क्यूंकि बी.टेक. करने का मतलब शायद रोज़गार मिल जाना होता भी हो, तो भी बी.टेक. नहीं करने का मतलब बेरोज़गारी तो कतई नहीं. इसका नाम इसलिए ही तो ब्लैक एंड व्हाइट फॉलसी है. क्यूंकि जो कोई भी जाने-अंजाने इसका प्रयोग करता है वो ये मानता है कि दुनिया में दो ही विकल्प हैं.

# 5 - ऑथरटेटिव फॉलसी

(‘जिहाद करने वालों को सौ हूरें मिलेंगी’ ‘भारत 2050 में विश्व शक्ति होगा’)
आपको इन सब बातों में क्यूं विश्वास हो जाता है? क्यूंकि ये किसी ‘विशेष व्यक्ति’ ने कहा है. लेकिन क्या विशेष व्यक्ति के कह देने से वो बात सत्य हो जाएगी? और इस ऑथरटेटिव फॉलसी का उपयोग हर जगह हो रहा है. यूनेस्को ने भारत के राष्ट्रगान को सबसे अच्छा घोषित किया. अब ये बात व्हाट्सएप ज्ञान से ज़्यादा कुछ नहीं लेकिन यदि यूनेस्को उसे सबसे अच्छा घोषित भी कर दे तो क्या सबसे अच्छा राष्ट्रगान हो जाएगा? मेरे मम्मी कहती है कि जो झूठ बोलते हैं उनका काली माता गला काट लेती है. अब ये बात क्या केवल इसलिए सत्य हो जाती है क्यूंकि मेरी मां मेरी फेवरेट है? नहीं न? इसलिए ही जब तक कोई विशेष व्यक्ति अमुक सब्जेक्ट का 'सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट' नहीं तब तक उसकी बात ऑथरटेटिव फॉलसी के अंदर ही आएगी. बड़े बड़े राजनेताओं के कोट जो हमने दीवारों पर चिपकाए हुए हैं फेसबुक में शेयर किए हैं, वो केवल इसलिए सत्य मान लिए जाएं क्यूंकि ऐसा उन्होंने कहा है – यही तो ऑथरटेटिव फॉलसी हैं. याद रखिए इज्ज़तदार व्यक्ति में और विशेषज्ञ व्यक्ति में अंतर होता है. आप किसी की इज्ज़त करते हैं या पूरा समाज किसी की इज्ज़त करता है, इसका मतलब ये नहीं कि उसकी बातें भी सही हों, या उसकी बातें किसी तर्क में यूज़ कि जाएं.
तो दोस्तों बातें कीजिए, विवाद कीजिए, सहमत होइए, असहमत होइए, निष्कर्ष निकालिए, हल निकालिए. क्यूंकि मानव ने जितनी भी उन्नति की है असहमतियों से ही तो की है. मगर देखिए कि कोई आपको या आप किसी को जाने अंजाने ‘बातों-बातों में’ टोपी तो नहीं पहना रहा/रहे.

कुछ और दस नंबरिया:

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 Video देखें:

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