इससे स्टूपिड बात दूसरी हो नहीं सकती. लोकतंत्र का मतलब ही यही होता है कि मेरे मन की हर बात कह सकता हूं. बिना किसी डर के. अजय ने हॉब्स, लॉक, रूसो के सामाजिक समझौते के सिद्धांतों को पढ़ा होता तो जान जाते कि मैं क्या कर रहा हूं या वो क्या बोल रहे थे. वो सामाजिक समझौता जिससे राजनीतिक व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था बनती गई. क्या अजय देवगन कह रहे हैं कि मैं अपने देश के प्रधानमंत्री से सवाल नहीं कर सकता हूं? वे क्या बच्चे हैं या नशा किया हुआ है? क्या वे भारत में राजनीतिक व्यंग्य, कार्टून, लेखों और आलोचनाओं के कल्चर और इतिहास को भूल गए. राजनेताओं को न जाने क्या-क्या कहा गया है और किसी ने कभी आपत्ति नहीं ली. संसद में बैठने वाले लोगों की तो जनता, पत्रकार, सिविल सोसायटी के लोग खासतौर पर किसी कारण या अकारण भी घोर आलोचना करते रहे हैं और यही एक अच्छे लोकतंत्र की निशानी है. राजनेता हमारे नौकर हैं, चौकीदार हैं, सेवक हैं. हमने उन्हें चुनकर संसद व अन्य संस्थानों में भेजते हैं. उसके बाद उनके काम में मीन-मेख निकालते रहकर हम उन पर बंदिश रखते हैं ताकि वे अपना काम गंभीरता से और जनदबाव में ईमानदारी से करते रहें. जब तक भाषा संसदीय हो, तब तक हम कुछ भी कह सकते हैं और आजादी से कह सकते हैं. ये मोदी के दौर में ही देखने को मिल रहा है कि उनसे सवाल करने मात्र से सोशल मीडिया पर गुंडों की फौज हमला बोल देती है. ये पहले तो कभी न हुआ. अटल बिहारी वाजपेयी तक ने नरेंद्र मोदी को 2002 में गुजरात दंगों के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में सबके सामने लताड़ा था कि 'राजधर्म निभाओ, राजा के लिए प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता'. मोदी से जवाब देते नहीं बना था लेकिन तब भी चुप्प रहने के बजाय जरा बेशर्मी से बोल गए कि 'हम भी वही कर रहे हैं साब'. https://www.youtube.com/watch?v=x5W3RCpOGbQ मनमोहन सिंह की हमने इतनी आलोचनाएं की हैं. रोज सुबह उठकर लोग कुल्ला करके शुरू होते थे और न जाने क्या क्या कहते थे. अब भी मोदी उत्तर प्रदेश के चुनावों में भाषण करने जा रहे हैं तो कह रहे हैं कि 'मैं सेवक हूं सेवा करना चाहता हूं, मुझे मालिक नहीं बनना'. अजय देवगन की मानें तो मोदी को अपने भाषणों में जनता से ये भी स्पष्ट कह देना चाहिए कि "जीतने के बाद तुम लोग हमें कुछ बोले तो ये न समझना की लोकतंत्र है और बचकर निकल जाओगे." ये कैसी चरसियों जैसी बात बोल दी अजय ने.उन्होंने पहले तो कहा कि अनुराग ने जो किया वो गैर-जरूरी था. फिर बोले, लोकतंत्र का
मतलब ये नहीं है कि आप जो भी कहना चाहेंगे वो कह देंगे और फिर बच जाएंगे.
सीरियसली अजय? आप अनुराग के कहे को समझ गए? क्या आप उनकी बनाई 'रमन राघव 2.0' के कंटेंट को भी समझ सकते हैं? आप रिटायरमेंट ले लेंगे तब तक भी अनुराग के किए काम की विवेचना हो रही होगी. इसमें भी जोड़ दूं कि बेहतर समझदारी वाली उनकी फिल्मों की तारीफ करने के साथ साथ उनकी घोर निंदा भी हम करते हैं क्योंकि ये प्रक्रिया नुकसान नहीं करती. आप तो कमर्शियल बॉलीवुड एक्टर हैं, नाच-गाना-मार-धाड़ वाले उत्पाद बनाकर बेचते हैं. इससे ज्यादा आपने कुछ देखा-सीखा नहीं. तो ऐसा करें कि किसी भी समझदार पोलिटिकल साइंटिस्ट, निष्पक्ष शिक्षाविद् या साख वाले साहित्यकार से पूछ लें कि अनुराग ने जो कहा उसके मायने क्या थे. थे भी कि नहीं? शायद इसी से आप संतुष्ट हो पाएंगे.उन्होंने कहा कि कुछ कारण होते हैं कि चीजें की जाती हैं और आप उस पर ऐसी बात नहीं बोल सकते जिसका आपको भी न पता हो कि क्या बोल रहे हैं. हमें जिम्मेदार होना चाहिए कि हम क्या बोल रहे हैं और उसका मतलब क्या है?
बात वही है अजय देवगन. अनुराग ने जो आलोचना की वो सटीक थी. बल्कि ऐसी थी जो मिसिंग थी. ऐसे सवाल जो पत्रकार भी नहीं पूछ रहे थे उन्होंने पूछे. अनुराग ने यही पूछा कि फिल्ममेकर्स को डराया जा रहा है, उनकी फिल्मों की रिलीज को लेकर डर का माहौल तैयार किया जा रहा है. फिरौती उगाही जा रही है और पीएम कुछ नहीं कहते. भई वो प्रधानमंत्री सिर्फ आपके ही नहीं हैं न, अनुराग कश्यप के भी प्रधानमंत्री हैं, करण जौहर के भी हैं. वे थका देने वाली मन की बात कहते रहते हैं, रैलियों, उद्घाटनों में 50 परसेंट लाइनें अतिरिक्त ही बोलते हैं, फिर क्यों सुनिश्चित नहीं करते कि फिल्म उद्योग के लोगों पर ही पाकिस्तान के प्रति नफरत दिखाने का जिम्मा नहीं होना चाहिए. अनुराग यही पूछ रहे थे कि करण जौहर जैसे निर्देशक ने अपनी फिल्म में पाकिस्तानी एक्टर तब लिया जब माहौल ठीक था. देश के नेता की देखा-देखी ही क्रिएटिव लोगों ने संबंध अच्छे करने की कोशिशों में पाक एक्टर्स को लिया. पाक सिंगर्स आ-जा रहे थे. लेकिन अब जब फिल्में तैयार हैं और सीमा पर तनाव है तो क्या उनकी रीलें जला दी जाएं? फिल्म तो रिलीज होगी ही न! अगर वो बात नहीं है तो क्यों अभी तक पाकिस्तान से ट्रेड बंद नहीं किया गया है? इस सवाल का कोई जवाब अजय के पास न होगा. हो सकता है वे ये बोल देंगे कि इस बात का कोई रेलेवेंस ही नहीं है. अब किसी के पास भेजा ही न हो, तो कोई इलाज नहीं हो सकता है.अजय यह भी बोले कि तुम ऐसी किसी चीज में क्यों घुस रहे हो जिसका कोई मतलब ही नहीं है. इस स्थिति (पाकिस्तानी एक्टर्स पर बैन की स्थिति) और उस स्थिति (प्रधानमंत्री का गलबहियां करने पाकिस्तान जाना) में फर्क था. तुम पूछते हो प्रधानमंत्री तब क्यों गए? वो चीजें सही करने गए थे. जो नहीं हो पाईं. हालात अलग थे. अब हालात अलग हैं. तो राजनैतिक रूप से वो गलत कदम नहीं था.
अब बताएं. लास्ट में बोल गए कि "क्योंकि तुम्हे लगता है तुम लोकतंत्र में हो.." तो क्या हम लोकतंत्र में नहीं हैं अजय? और बकवास वो है जो आप कर रहे हैं. वे ऐसा क्यों बोल रहे हैं यही इस इंटरव्यू में अन्य स्थानों पर जाहिर होता है. उनसे जब पूछा गया कि "ऐ दिल है मुश्किल को रिलीज करने के लिए करण जौहर न जाने क्या क्या करना पड़ा. उन्हें वीडियो मैसेज में सबको अपनी देशभक्ति को लेकर आश्वस्त करना पड़ा. उनकी बांह मरोड़ी गई और रिलीज की ऐवज में 5 करोड़ मांगे गए. हर किसी ने कहा है कि ये सीधे-सीधे फिरौती है." इस पर अजय ने कहा, "जैसे मैंने सदा कहा है, हमारी फिल्म इंडस्ट्री को लेकर हर कोई कहता है कि आप लोग कोई स्टैंड क्यों नहीं लेते जब ऐसी राजनैतिक बातें होती हैं तो? हम नहीं लेते क्योंकि हम डरे हुए हैं. क्योंकि हम बहुत आसान शिकार हैं. यही कारण है कि हम चुप रहने की कोशिश करते हैं. जब बात समाज या राष्ट्र की आती है तो हम पक्ष ले सकते हैं लेकिन बात राजनीति की आती है तो हमें स्टैंड लेने से डर लगता है." यहां अजय, आप खुद बोल रहे हैं कि फिल्मी लोग राजनीति से डरते हैं, लेकिन अगर अनुराग कश्यप नहीं डरता है और बोलता है तो तुम कहते हो कि उसे भी चुप रहना चाहिए. क्यों? वो भी आप लोगों की तरह डरकर रहे? फिल्मों में बड़े लड़ते हो, हीरो बनते हो, न लड़ने वालों को हिजड़ों की फौज बोलते हो, असल जीवन में कोई नहीं डरता है तो बोलते हो कि 'चुप बैठो, तुमको नहीं पता क्या हो रहा है'. इस स्थिति तक आते-आते अजय देवगन 'शोले' या 'चाइना गेट' जैसी फिल्मों के डरपोक गांववालों में से एक लगते हैं. डरे हुए, और दूसरों को भी डरे रहने की बात कहते हुए. आप खुद ही बोल गए कि समाज और राष्ट्र की बातों में अपने नंबर चमका जाते हो और राजनीति से जुड़े या बेहद गंभीर मसलों में आप लोग चुप रहते हो. सत्ता से आप लोग डरते हो. उसकी तारीफ करते हो. लेकिन सब ऐसे नहीं हैं. आखिरी स्टूपिड बात भी जान लीजिए जो उन्होंने कही.अजय ने और कहा, 'अनुराग कश्यप जैसे लोग ही होते हैं जो चीजों को बिगाड़ते हैं. फिर देश बंट जाता है. आधे लोग सोचते हैं वे सही हैं और आधे सोचते हैं वे गलत हैं. तो जब आप ऐसे विवादित बयान देते हैं तो ये उल्टा असर होता है. बेहतर यही है कि चुप बैठो और चीजों को सही होने दो. न कि बकवास बातें बोलो क्योंकि तुम्हे लगता है कि तुम लोकतंत्र में रहते हो.'
अब बताइए. एक आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा भी बता देगा कि राष्ट्रवादी विचारधारा वाले दल होते हैं, जैसे कि अभी भारत की रूलिंग पार्टी हिंदुवादी और राष्ट्रवादी है. उनकी सारी राजनीति इस टर्म के इर्द-गिर्द घूमती है. पाकिस्तान, कश्मीर, राम मंदिर जैसे मुद्दे राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए चारा हैं. हिटलर ने राष्ट्रवादी राजनीति करके दूसरा विश्व युद्ध करवा दिया था और करोड़ों लोगों को मरवा दिया था. बहुत दुख होता है जब-जब हमारे एक्शन हीरोज़ या सुपरस्टार्स गंभीर मसलों पर अपना मुंह खोलते हैं और दशकों से की गई पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, सिविल सोसायटी की समाज को समान और आज़ाद बनाने की मेहनत को चंद सैकेंड में जमीन पर ले आते हैं. समाज फिर से उतना ही पीछे आ जाता है क्योंकि जो करोड़ों लोग अजय देवगन को देवता मानते हैं वे आंख-कान-दिमाग बंद करके उनकी बात को जीवन में ढाल लेते हैं. और अगर कोई उनके देवता के खिलाफ कुछ कहे या लिखे तो उससे बातचीत की शुरुआत गंदी, बदबूदार भाषा से होती है. ये गुंडा प्रवृत्ति की भीड़ बॉलीवुड के सुपरस्टार्स की हमें देन है. ये ही हमारी नियति हैं. अजय का इंटरव्यू: https://www.youtube.com/watch?v=TAsOJHG8a5o Also Read: ये अनुराग कश्यप को डर नहीं लगता क्या! नरेंद्र मोदी को ताना मार दिया है! बेचारा करण जौहर प्रेमी आदमी है, तुम बुलीज़ से हार गया है! प्रियंका चोपड़ा पाक एक्टर्स के पक्ष में, पर उन्हें गद्दार बोला तो देशभक्ति छिन जाएगी! करण जौहर के 5 करोड़ से पहले सेना के इस फंड का क्या हाल है, जान लीजिए देवेंद्र फडनवीस, गुंडा एक्ट लगाकर राज ठाकरे को जेल में क्यों नहीं ठूंस देते? बुलीज के सामने गिरा दूसरा विकेट, ओम पुरी शहीद के घर गए, माफी मांगी और रोए भीजब पूछा गया कि लोगों को एंटी-नेशनल बोलने की राजनीति हो रही है तो बोले, 'राजनीति का राष्ट्र से या राष्ट्रवादी होने से कोई लेना-देना नहीं है.'














