रॉ की पूर्व अधिकारी ने सेक्सुअल हैरेसमेंट के आरोप लगाए थे, कोर्ट ने एक लाख रुपये मुआवजा देने को कहा
महिला ने आरोप लगाया था कि प्रमोशन के लिए उन्हें 'सेक्स रैकेट' में शामिल होने को कहा गया था.
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सुप्रीम कोर्ट ने रॉ की एक पूर्व महिला अधिकारी के सेक्शुअल हेरेसमेंट के मामले में आदेश दिया है. (File Photo: PTI)
सुप्रीम कोर्ट ने सेक्सुअल हैरेसमेंट से जुड़े केस में 24 अप्रैल को केंद्र सरकार को एक आदेश दिया. सरकार से रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ की एक पूर्व महिला अधिकारी को मुआवजे के रूप में एक लाख रुपये देने को कहा. कोर्ट ने यह आदेश रॉ के सेक्सुअल हैरेसमेंट से जुड़े मामले को सही तरीके से हैंडल न कर पाने पर दिया. कोर्ट ने कहा कि रॉ ने शिकायत पर एक्शन लेने में देरी की. यह महिला के जीवन के मूल अधिकार और गरिमा का उल्लंघन है. जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की बेंच मामले की सुनवाई कर रही थी. क्या है मामला बार एंड बेंच की खबर के मुताबिक, अगस्त 2007 में रॉ की एक महिला अधिकारी ने सेक्सुअल हैरेसमेंट की शिकायत की. महिला 1988 में रॉ में शामिल हुई थीं. अपनी शिकायत में उन्होंने रॉ के तत्कालीन सेक्रेटरी अशोक चतुर्वेदी और ज्वॉइंट सेक्रेटरी सुनील उके पर आरोप लगाया कि चतुर्वेदी और उके ने महिला से कहा कि जल्दी प्रमोशन के लिए वह संगठन के अंदर चल रहे 'सेक्स रैकेट' में शामिल हो जाए. लेकिन महिला ने इससे इनकार किया. इसके बाद उसे परेशानियां झेलनी पड़ीं. शिकायत के बाद रॉ की ओर से आरोपों की जांच के लिए करीब तीन महीने बाद जांच कमिटी बनाई गई. महिला ने की थी सुसाइड की कोशिश जांच कमिटी ने सुनील उके पर लगाए आरोपों को खारिज कर दिया. इसके बाद शिकायत करने वाली महिला ने अगस्त 2008 में प्रधानमंत्री के दफ्तर के पास में सुसाइड का प्रयास किया. ऐसे में तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने एक और जांच कमिटी बनाई. जांच का जिम्मा रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रथि विनय झा को दिया गया. इस कमिटी ने भी फैसला शिकायतकर्ता महिला के खिलाफ दिया. आरोपी अधिकारियों को क्लीन चिट दी गई. महिला को दे दिया था कंपल्सरी रिटायरमेंट दिसंबर 2009 में महिला को रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के सेवा नियम 135 के तहत कंपल्सरी रिटायरमेंट दे दिया गया. नियम 135 कहता है कि अगर रॉ का कोई अधिकारी एक्सपोज़ होता है. या सुरक्षा कारणों से संगठन में काम करने लायक नहीं है. या काम के दौरना चोट आती है या अक्षम हो जाता है तो उसे कंपल्सरी रिटायरमेंट दिया जा सकता है. ऐसे में सरकार की ओर से महिला को कहा गया कि सुसाइड के प्रयास के चलते वह खबरों में आ गईं. इस वजह से वह एक्सपोज़ हो गईं. यानी उनकी पहचान सार्वजनिक हो गई. महिला ने इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में अर्जी दी. उन्होंने रूल 135 को असंवैधानिक बताया. लेकिन साल 2012 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार के फैसले को सही माना. महिला अधिकारी ने सरकारी सुविधाएं नहीं छोड़ी. इन सभी मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट चली गईं. अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा - कोर्ट ने माना कि शिकायत पर सही तरीके से कार्रवाई नहीं की गई. सीनियर अधिकारियों ने प्रक्रिया के तहत कई गलतियां कीं. उनका रवैया भी ढीला था. इससे महिला की गरिमा और जीने के अधिकार को नुकसान पहुंचा. - कोर्ट ने आगे कहा कि महिला ने जब सेक्सुअल हैरेसमेंट की शिकायत की तो अधिकारियों का रवैया लापरवाही भरा था. इस वजह से महिला को असंवेदनशीलता और अशोभनीय माहौल का सामना करना पड़ा. - जांच का नतीजा चाहे जो आया हो, लेकिन महिला के मूल अधिकारों को नुकसान पहुंचा. इसलिए महिला को मुआवजे के रूप में एक लाख रुपये दिए जाने चाहिए. यह पैसे छह सप्ताह के अंदर-अंदर दिए जाए. - कोर्ट ने महिला को तीन महीने में सरकारी घर खाली करने को भी कहा है. साथ ही सरकार से कहा कि महिला से किसी भी तरह का किराया या बकाया नहीं लिया जाएगा. - कोर्ट ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के सेवा नियम 135 को सही माना. कहा कि यह असंवैधानिक नहीं है. - कोर्ट ने कंपल्सरी रिटायरमेंट देने को भी सही माना. और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. -महिला ने अपनी बेटी की उच्च शिक्षा के लिए सरकार से 26 लाख रुपये की मांग की थी. लेकिन कोर्ट कहा कि महिला रिटायरमेंट के तहत मिलने वाले फायदों और सुविधाओं की ही अधिकारी हैं. इसके अलावा कोई मुआवजा नहीं दिया जा सकता. भारत में कोरोना वायरस के मामलों का स्टेटस
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