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कौन हैं काज़ी तौकीर, जिन्होंने 'बिग बॉस 20' के घर में आग लगा रखा है?

काज़ी तौकीर- अरिजीत सिंह के उस दोस्त की कहानी, जो उनसे बड़े स्टार बनकर भी गुमनाम हो गए.

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डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने काज़ी तौकीर को 'हीरो ऑफ कश्मीर' कहा था.

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  • काज़ी तौकीर ने 2005 में रियलिटी शो 'फ़ेम गुरुकुल' में हिस्सा लिया और जनता के वोटों से यह शो साझा विजेता बने, जो उस समय के रिकॉर्ड से ज्यादा था।
  • कश्मीर के राजनीतिक और सांस्कृतिक कठिन दौर में काज़ी तौकीर ने बिना किसी फॉर्मल ट्रेनिंग के संगीत में अपनी पहचान बनाई, जिसके चलते उन्हें जनता का व्यापक समर्थन मिला।
  • शो जीतने के बाद काज़ी ने फिल्मों में काम करने के प्रयास किए, मगर दुर्घटना और परियोजना रुकावटों के कारण वे मुख्यधारा की इंडस्ट्री से दूर रहते हुए कश्मीर में अपनी संगीत यात्रा जारी रखे।

"अरिजीत! अगर तुम शो पर वापस आओगे तो हमारे लिए खतरा है. मगर मुझे चैलेंज पसंद है. इसलिए मैंने तुम्हें वोट किया है."

साल 2005. 17-18 साल के Arijit Singh, सिंगिंग शो 'फ़ेम गुरुकुल' से लगभग बाहर हो चुके थे. मगर ऐन मौके पर दूसरे प्रतिभागी Qazi Touqeer ने अपने इन्हीं शब्दों के साथ उन्हें रोक लिया. यही वो मौका था, जिसने अरिजीत और काज़ी को पक्का दोस्त बना दिया. अरिजीत 'फ़ेम गुरुकुल' जीत तो नहीं सके. मगर अगले दो दशक में इंडियन म्यूजिक के सबसे बड़े स्टार बन गए. दूसरी तरफ़, काज़ी उस शो को जीतने के बावजूद लगभग ग़ुमनामी में खो गए. इन दिनों वो 'बिग बॉस 20' में बतौर कंटेस्टेंट नज़र आ रहे हैं. वहां काज़ी के अनोखे अंदाज़ ने उन्हें एक बार फिर चर्चा का विषय बना दिया है. मगर ये सब शुरू कैसे हुआ?  

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श्रीनगर के एक मिडिल क्लास परिवार में पैदा हुए काज़ी की मां टीचर थीं. उनके पिता वकालत किया करते थे. मगर काज़ी की रुचि सूफ़ी संगीत में थी. काज़ी के चाचा भी सिंगर थे. इसलिए घर में शुरुआत से ही म्यूजिकल माहौल रहता था. फिर भी काज़ी ने गाने की कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली. उन्हें कश्मीरी लोक गीत और हिंदी फिल्मों के गाने सुनने का शौक था. इसलिए काज़ी ने उन धुनों को ही अपना गुरु बना लिया.

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2000 के शुरुआती दौर में टीवी और केबल कनेक्शन देश के कोने-कोने तक पहुंच चुका था. ऐसे में रियलिटी शोज़ भारी डिमांड में थे. 'इंडियन आइडल' जैसे म्यूजिक शोज़ घर-घर में देखे जाने लगे. साल 2005 में सोनी एंटरटेनमेंट ने भी अपना म्यूजिक शो शुरू किया. नाम रखा- 'फ़ेम गुरुकुल'. ये इंटरनेशनल सिंगिंग शो 'फ़ेम अकैडमी' का देसी वर्जन था. देशभर में ऑडिशन लिए जाने लगे. काज़ी ने तय किया कि वो इस शो का हिस्सा बनेंगे. मगर ये इतना भी आसान नहीं था. दरअसल, तब कश्मीर का देश के बाकी हिस्सों से आज जैसा कनेक्शन नहीं था. न ही काज़ी के पास ऐसा कोई कश्मीरी रोल मॉडल था, जिससे वो ऑडिशन के लिए गाइडेंस ले सकें. फिर भी, उन्होंने अपना पत्ता फेंका और ऑडिशन में सिलेक्ट हो गए.

काज़ी उन 16 प्रतिभागियों में से एक थे, जिन्हें 'फ़ेम गुरुकुल' के लिए चुना गया था. उनके अलावा रेक्स डीसूजा, रूपरेखा बनर्जी, कीर्ति सगाठिया, संदीप बत्रा और शमित त्यागी जैसे नाम भी इस शो का हिस्सा थे. मगर इस शो को सबसे ज़्यादा काज़ी और अरिजीत सिंह के लिए ही याद किया जाता है. शो में कंटेस्टेंट्स को गुरुकुल जैसे माहौल में रखा जाता था. वहां उन्हें गाने के साथ स्टेज परफॉर्मेंस की ट्रेनिंग भी दी जाती. हर हफ्ते वो जावेद अख्तर, शान, शंकर महादेवन और केके जैसे बड़े जजों के सामने परफ़ॉर्म करते थे. फ़ेम गुरुकुल' में दर्शक SMS के जरिए अपने पसंदीदा कंटेस्टेंट को वोट कर सकते थे. तब एक मैसेज करने के लगभग 6 रुपए लगते थे. आज के हिसाब से देखें तो ये काफी महंगा है. बावजूद इसके, जनता खूब जोश-खरोश से इसमें पार्टिसिपेट करती थी.

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शाहिद कपूर के साथ अरिजीत सिंह और काज़ी तौकीर.

जैसा कि हमने शुरुआत में बताया, काज़ी तौकीर ने गाने की कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी. इसलिए ‘फ़ेम गुरुकुल’ के मंच पर वो बाकी कंटेस्टेंट्स के सामने उन्नीस रह जाते. जज अक्सर उनकी इस तकनीकी खामी पर उन्हें टोकते. कई बार उन्हें झाड़ भी पड़ जाती. काज़ी खुद भी स्वीकारते हैं कि तब वो अच्छा नहीं गाते थे. ऐसे में उनका शो जीतना किसी चमत्कार से कम नहीं था. फिर भी, जब काज़ी को शो के बाकी 15 प्रतिभागियों के सामने खड़ा करें, तो एक डिपार्टमेंट में वो इक्कीस नज़र आएंगे. ये डिपार्टमेंट है उनका कॉन्फिडेंस. काज़ी को चाहे कितनी ही डांट पड़ जाए, मंच पर वो अपनी परफॉर्मेंस से तूफान ला देते थे. उनकी पर्सनैलिटी भी बाकी कंटेस्टेंट से ज़्यादा चार्मिंग थी. अमेरिका, बांग्लादेश, फ्रांस, इटली और नाइजीरिया से उन्हें फैन मेल्स आते थे. लड़कियों के बीच भी काज़ी बड़े पॉपुलर हो गए थे.

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सबसे खास बात ये है कि लोगों को उनका इमोशनल साइड बहुत पसंद था. वो फेक नहीं लगते थे. उनमें उसी बच्चे जैसी बेसब्री थी, जो सब जीतना चाहता था. हर हफ्ते जज ये कह देते कि वो अच्छा नहीं गाता. हर हफ्ते वो खुद को फिर साबित करते. इसलिए टीवी देख रही जनता उनसे आसानी से कनेक्ट करती थी. कहते हैं कि काज़ी ‘फ़ेम गुरुकुल’ केवल इसलिए नहीं जीते कि वो अच्छे परफ़ॉर्मर थे. बल्कि वो इसलिए भी जीते क्योंकि जनता को उनमें एक अच्छा इंसान दिख रहा था. तब सोनी एंटरटेनमेंट के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसीडेंट और बिजनेस हेड तरुण कात्याल ने एक इंटरव्यू में कहा भी था,

“हम इस लड़के का क्या करें! इसने साबित कर दिया है कि किसी स्टार की कामयाबी सिर्फ टैलेंट से तय नहीं होती. बल्कि उससे भी कहीं बड़ी ताकतें होती हैं, जो किसी को स्टार बना सकती हैं.”

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‘फ़ेम गुरुकुल’ में काज़ी तौकीर.

काज़ी ने जाने-अनजाने ऑडियंस से ऐसा बॉन्ड बना लिया था, जो उनके लिए कर्ण के कवच जैसा था. शो पर वो 10 बार एलिमिनेट हुए. पूरे सीजन में शायद सबसे ज़्यादा बार उन्हें ही बाहर किया जा रहा था. लेकिन हर बार जनता का वोट उन्हें शो में वापस ले आता. मीडिया ने उन्हें ‘जनता का दुलारा’ कहना शुरू कर दिया था. तब जजों के पैनल और दर्शकों में खींचा-तानी चल रही थी. इसका फायदा काज़ी को मिला और उनकी पॉपुलैरिटी आसमान छूने लगी. कश्मीर में तब ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं. फिर भी काज़ी को सुनने के लिए लोग कोई-न-कोई जुगाड़ भिड़ा लेते. परिवार साथ बैठकर टीवी पर उन्हें देखता. दुकानदार अपने ग्राहकों को उनका ट्रैक रिकॉर्ड देते रहते. एक ऐसा प्रदेश, जो आतंक और हिंसा की गिरफ़्त में था, उसके लिए काज़ी उम्मीद की किरण बनकर आए. इसलिए उनका आगे बढ़ना पूरे कश्मीर के आगे बढ़ने जैसा महसूस हो रहा था.

और फिर आता है- 20 अक्टूबर 2005. उस रात ‘फ़ेम गुरुकुल’ का सीजन फिनाले था. देशभर के लोग अपने घरों में टीवी से चिपके हुए थे. जैसी उम्मीद थी, काज़ी बड़े अंतर से इस शो के विजेता बन गए. तब वो केवल 20 साल के थे. लोगों ने उन्हें इतना वोट किया कि रिकॉर्ड बन गया. कैसा रिकॉर्ड, इसे समझने के लिए आपको एक गणित जानना पड़ेगा. दरअसल, जब ‘इंडियन आइडल’ का पहला सीज़न आया था, तब अभिजीत सावंत और अमित साना जैसे कंटेस्टेंट्स को 3 करोड़ वोट मिले थे. वो भी पूरे सीजन को मिलाकर. उसकी तुलना में ‘फ़ेम गुरुकुल’ एक छोटा शो था. मगर वहां काज़ी तौकीर को अकेले ही 2.5 करोड़ से ज़्यादा वोट दिए गए. तब भारत में किसी भी रियलिटी शो कंटेस्टेंट को इतने वोट नहीं मिले थे. देश के अलग-अलग इलाकों से जनता ने उनके लिए SMS भेजे. कहते हैं कि तब ऑडियंस ने काज़ी के सपोर्ट में किए गए मैसेजों पर 11 से 15 करोड़ रुपए खर्च कर दिए थे. ये अपने आप में एक बड़ा रिकॉर्ड है.

‘फेम गुरुकुल’ में काज़ी ने विजेता का ये खिताब रूपरेखा बनर्जी के साथ शेयर किया था. उन्हें शो की ‘फ़ेम जोड़ी’ बताया गया. दोनों को 50-50 लाख रुपए मिले. साथ ही सोनी म्यूजिक का कॉन्ट्रैक्ट और एक-एक मारुति ऑल्टो भी. वो ऐतिहासिक पल था. काज़ी को तब कश्मीर का हीरो घोषित कर दिया गया था. श्रीनगर में बड़ा जश्न मनाया जाने लगा. लोग नाचे-गाए और उनके घर के बाहर जमा हो गए. अखबारों की सुर्खियां उनके नाम से पट गईं. काज़ी को ‘फ़ेम गुरुकुल’ जाने से पहले भले खुद कोई मेंटर न मिला हो. मगर उनके जीतते ही कश्मीरी युवाओं ने सिंगिंग शोज़ के लिए ऑडिशन देना चालू कर दिया. ‘इंडियन आइडल’ के श्रीनगर ऑडिशन में रिकॉर्डतोड़ प्रतिभागी पहुंचने लगे थे.

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अरिजीत सिंह और काज़ी तौकीर.

काज़ी उस दौर में वायरल हुए, जब वायरैलिटी जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था. देखते ही देखते उनकी पॉपुलैरिटी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में दस्तक देने लगी. उस साल ‘फ़ेम गुरुकुल’ के प्रतिभागियों को राष्ट्रपति भवन से भी बुलावा आया था. तब डॉ एपीजे कलाम खुद काज़ी से मिले और उन्हें ‘हीरो ऑफ कश्मीर’ कहा. काज़ी के लिए ये ‘फ़ेम गुरुकुल’ जीतने से भी बड़ी उपलब्धि थी. क्योंकि वो हर कश्मीरी यंगस्टर के लिए प्रेरणा बन गए थे.

जब शोहरत का ये शोर-शराबा थोड़ा थमा, तो सोनी के बैनर तले काज़ी और रूपरेखा का पहला एल्बम ‘ये पल’ रिलीज़ हुआ. उसमें ‘ये पल’, ‘कहकशां’ और ‘मेरी महबूबा’ जैसे गाने थे. लगा कि काज़ी को वो शुरुआत मिल गई है, जो उन्हें अगला सिंगिंग सुपरस्टार बना सकती है. लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ, उसकी कल्पना शायद किसी ने भी नहीं की होगी. दरअसल, काज़ी ने तय किया कि वो सक्सेस के पीछे भागने की जगह केवल वही काम करेंगे, जो उन्हें पसंद आएगा. वो वापस कश्मीर चले गए. साथ ही अपने गानों को लेकर भी बहुत सिलेक्टिव हो गए. 2009 में उन्होंने ‘सरकार की दुनिया’ रियलिटी शो में पार्टिसिपेट किया. हालांकि वहां से वो जल्द ही बाहर हो गए.

काज़ी हमेशा से जानते थे कि वो बहुत अच्छे सिंगर नहीं हैं. साथ ही उन्हें ये भी पता था कि उन जैसा परफ़ॉर्मर कोई और नहीं. इसलिए उन्होंने फिल्मों में काम करने का फैसला किया. सिंगर नहीं, बल्कि एक्टर के तौर पर. खास बात ये है कि उन्हें दो मूवीज़ मिल भी गईं. वेटरन कोरियोग्राफर और डायरेक्टर गणेश आचार्य ने उन्हें अपनी फिल्म ‘टेक ऑफ’ में लीड रोल  दिया. प्रोजेक्ट पर काम शुरू भी हो गया था. मगर फिर सेट पर एक ऐसी दुर्घटना हुई, जिसने काज़ी की बची-खुची उम्मीद तोड़ दी. दरअसल, एक इंटेन्स डांस सीक्वेंस की प्रैक्टिस करते हुए उनके गले पर बहुत बुरी चोट लग गई. उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा. इस कारण पहले फिल्म शूटिंग रुकी और बाद में इस पूरे प्रोजेक्ट को ही शेल्व करना पड़ा. वैसे, गणेश आचार्य से पहले कोरियोग्राफर अहमद खान ने भी काज़ी को एक मूवी ऑफर की थी. उसमें स्नेहा उल्लाल को उनके अपोजिट कास्ट किया गया था. मगर वो फिल्म भी कभी बन नहीं पाई.  

खैर, उस चोट के बाद काज़ी लाइमलाइट से पूरी तरह दूर हो गए. उन्होंने कश्मीर में लाइव शोज़ और इवेंट में परफ़ॉर्म करना शुरू कर दिया. साथ ही वो पुराने गानों का रीमेक भी बनाने लगे. फिर आया 2015. डायरेक्टर कबीर खान, कटरीना कैफ और सैफ अली खान के साथ ‘फैन्टम’ नाम की फिल्म बना रहे थे. उसमें एक गाना शूट होना था. गाने का नाम- ‘अफ़गान जलेबी’. नई पीढ़ी काज़ी को इसी गाने की वजह से जानती है. वो ‘बिग बॉस 20’ में भी अक्सर इसे गाते रहते हैं. मगर लोगों को भ्रम है कि वो इस गाने के ओरिजिनल सिंगर हैं. ऐसा नहीं है. दरअसल, ‘अफ़गान जलेबी’ को पाकिस्तानी सिंगर असरार ने गाया है. काज़ी केवल उसमें फीचर हुए हैं. लेकिन उन्हें ये गाना कैसे मिला, वो भी बड़ा मज़ेदार किस्सा है.

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पाकिस्तानी सिंगर- असरार शाह.

दरअसल, एक दिन काज़ी मुंबई के पृथ्वी थिएटर गए थे. वहां उनकी मुलाकात शाहनवाज़ नाम के अपने एक फैन से हुई. शाहनवाज़ ‘फ़ेम गुरुकुल’ से दिनों से काज़ी के फैन थे. इसलिए उन्हें देखकर वो इमोशनल हो गए. दोनों गले मिले. साथ में फोटोज़ खिंचवाई. नंबर एक्सचेंज हुए और दोनों अपने-अपने घर चले गए. कुछ दिन बाद शाहनवाज़ ने काज़ी को कॉल किया और उनसे मिलने की इच्छा जताई. काज़ी ने उन्हें घर बुला लिया. शाहनवाज़ ने आते ही उन्हें बताया कि कोरियोग्राफर अहमद खान के असिस्टेंट ने उन्हें कॉन्टैक्ट किया है. दरअसल, उस असिस्टेंट ने फ़ेसबुक पर काज़ी और शाहनवाज़ की फोटो देखी थी. इसलिए उसे भी एकाएक उनका ख्याल आ गया. शाहनवाज़ ने दोनों की बात करवा दी. उस असिस्टेंट ने काज़ी को बताया कि वो दो दिन बाद कटरीना कैफ के साथ एक गाना शूट करने वाले हैं. क्या वो उसमें काम करना चाहेंगे?

काज़ी इस बात से हैरान थे. उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि गुमनामी के इतने सालों बाद एक फैन उनसे अचानक मिला और अगले ही पल उन्हें कटरीना के साथ गाना ऑफर हो गया. पता चला कि उन्हें गाने में फीचर होना है, उसे गाना नहीं है. पहले काज़ी को लगा कि वो बैकग्राउंड में रहेंगे, इसलिए उन्होंने खास रुचि नहीं दिखाई. मगर उन्हें बताया गया कि उन्हें ‘अफ़गान जलेबी’ में कटरीना जितना ही स्क्रीनटाइम दिया जाएगा. काज़ी को लगा कि फाइनली उनका एक्टिंग का सपना पूरा हो रहा है. इसलिए वो इसके लिए झट से तैयार हो गए.  

अगले दिन काज़ी शूट पर पहुंचे. वहां कटरीना की तरह उन्हें भी वैनिटी वैन दी गई थी. ‘अफ़गान जलेबी’ की शूटिंग दो दिन तक चली. काज़ी बताते हैं कि अहमद खान ने उन्हें गाने में मुस्कुराने कहा था. मगर उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया क्योंकि पठानों का अपना अलग एटिट्यूड होता है. जो भी हो, गाना रिलीज़ हुआ और इंटरनेट पर भयंकर वायरल हो गया. टी-सीरीज़ ने काज़ी को क्रेडिट में मेंशन नहीं किया था. फिर भी हजारों लोग कमेंट बॉक्स में ‘काज़ी इज़ बैक’ लिखने लगे. उन्हें हजारों फोन्स आए. पिछले दिनों खुद सलमान खान ने भी ‘बिग बॉस 20’ के मंच से उन्हें ‘अफ़गान जलेबी’ को पॉपुलर करने का श्रेय दिया था.

मगर ‘अफ़गान जलेबी’ की सक्सेस भी उन्हें फिल्मों में ज्यादा काम नहीं दिलवा पाई. इसलिए उन्होंने कश्मीर में अपने शोज़ का काम जारी रखा. तब तक भारत में इंटरनेट और सोशल मीडिया ने भी काफी रफ़्तार पकड़ ली थी. ऐसे में काज़ी ने अपने गानों को यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर शेयर करना शुरू कर दिया. यही कारण है कि इतने उतार-चढ़ाव देखने के बाद भी वो चर्चा में बने रहते हैं. समय-समय पर उनके गाने सोशल मीडिया पर भी वायरल हो जाते हैं.

काज़ी तौकीर को ‘फ़ेम गुरुकुल’ का विजेता बने 21 साल बीत गए हैं. इस दौरान उन्होंने अर्श और फर्श, दोनों देखा. बावजूद इसके, अरिजीत सिंह और उनकी दोस्ती जस-की-तस बनी हुई है. काज़ी के मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री से केवल अरिजीत ही हैं, जिनसे वो अब तक कॉन्टैक्ट में हैं. दोनों लगातार फोन और मैसेज पर बातें करते हैं. कभी-कभी काज़ी वेस्ट बंगाल में अरिजीत के घर भी चले जाते हैं. वहां दोनों साथ में स्कूटी पर घूमते हैं, क्रिकेट खेलते हैं और गाने बनाते हैं. काज़ी अक्सर कहते हैं कि उन्हें अरिजीत पर बहुत गर्व होता है. दूसरी तरफ़, अरिजीत ने भी पब्लिकली ये कहा कि वो ‘बिग बॉस 20’ केवल इसलिए देखेंगे क्योंकि उसमें उनका दोस्त काज़ी आया है.

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काज़ी तौकीर के सपोर्ट में अरिजीत सिंह का पोस्ट. 

कुल मिलाकर, काज़ी की कहानी के दो पहलू हैं. एक वो, जहां उन्होंने शोहरत देखी. दूसरा वो, जहां वो दशकों तक गुमनामी में रहे. इन सबके बावजूद उन्होंने अपना अंदाज़ नहीं बदला. वो ‘बिग बॉस 20’ में भी उतने ही कॉन्फिडेंट हैं, जितना 21 साल पहले ‘फ़ेम गुरुकुल’ में थे. उनकी ज़िंदगी ने स्टारडम चखने के बावजूद वो फास्ट पेस रास्ता नहीं पकड़ा, जो उन्हें मालामाल कर सकता था. उल्टा, वो वापस कश्मीर चले गए. उन्हीं लोगों के बीच, जिन्होंने उन्हें स्टार बनाया था. 

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