एक टेक एक्सपर्ट बताता है कि लोग अपने पासवर्ड में आमतौर पर किसी का बर्थडे, एनिवर्सरी, कुत्ते-बिल्ली या किसी पालतू का नाम वगैरह का कॉम्बिनेशन रखते हैं. ऐसे में उनके बारे में ये सब डिटेल्स पता करके पासवर्ड क्रैक करना आसान हो जाता है. बगल में खड़ा अरशद वारसी का किरदार कहता है,
सीरीज रिव्यू: प्रीतम एंड पेड्रो
राज कुमार हीरानी अपनी किस्म का सिनेमा बनाते हैं. सामाजिक मसलों को बड़े कॉमिक ढंग से पेश करना उनकी स्पेशैलिटी रही है. इस सीरीज़ में भी उसकी छाप दिखती है.


"मेरे पासवर्ड में तो ऐसा कुछ नहीं है, फिर भी आजतक कोई क्रैक नहीं कर पाया..."
पूछा गया पासवर्ड क्या है, तो जवाब मिला- "12345".
बस इसी पासवर्ड जितनी सिंपल, छोटी और 'आसानी से क्रैक ना होने वाली' सीरीज आई है. जिससे राज कुमार हीरानी ने OTT की दुनिया कदम रखा है. सीरीज़ का नाम है 'प्रीतम एंड पेड्रो'. अविनाश अरूण ने इसे डायरेक्ट किया है. हीरानी इसके प्रोड्यूसर हैं.
सीरीज़ में अरशद वारसी और वीर हीरानी की जोड़ी कई केस सॉल्व करती नजर आ रही है. कहानी सेट है गोवा में. अरशद ने पेड्रो गोंजाल्वेज़ नाम के एक ऐसे पुलिसवाले का रोल किया है, जिसे क्राइम सॉल्व करने का जुनून है. एक जगह उनका किरदार ये कहता नजर आता है,
"मेरेको ना मारपीट, भागदौड़, खून-खराबा, ये सब क्राइम की जब खुशबू आती है ना, तब मज़ा आता है."
लेकिन सीरीज़ की शुरुआत में ही एक गलती की वजह से पेड्रो का ट्रांसफर साइबर सेल में हो जाता है. वो दुनिया जिससे पेड्रो पूरी तरह अनभिज्ञ है. अपने करियर में अब तक उसे वो अनदेखा और बहुत कम आंकता रहा था. क्योंकि उसका मानना है कि क्रिमिनल्स पकड़ने के लिए फील्ड में उतरना पड़ता है. कंप्यूटर के सामने बैठकर केस सॉल्व नहीं होता. इसलिए साइबर सेल में आने के बाद ऐसी शर्त होती है कि अगर वो जल्दी से कुछ केसेज सॉल्व करे, तो उसकी क्राइम ब्रांच में वापसी हो सकती है.
ट्रांसफर से कुछ दिन पहले उसकी मुलाकात प्रीतम पार्कर से होती है. प्रीतम का किरदार, वीर हीरानी निभा रहे हैं. प्रीतम टेक की दुनिया को बहुत अच्छी तरह समझता है. वो 15 मिनट में एक केस सॉल्व करने का चैलेंज लेता है और करके दिखाता है. इसलिए ट्रांसफर के बाद पेड्रो उससे केस सॉल्व करने में मदद लेना शुरू कर देता है. कुछ केस वो दोनों मिलकर सॉल्व करते भी हैं. फिर दोनों एक केस में आकर फंस जाते हैं. ये एक मिनिस्टर के बेटे की किडनैपिंग का मामला है. जो शुरू में काफी साधारण लगता है. लेकिन वक्त के साथ पेचीदा होता चला जाता है. इसी केस में उनका सामना विक्रांत मैसी के किरदार से होता है. जिसकी वजह से केस में एक के बाद एक ऐसी परतें खुलती हैं जो प्रीतम और पेड्रो दोनों के अतीत से भी जुड़ी होती हैं. ऐसे में क्या वो केस सॉल्व कर पाते हैं और क्या पेड्रो क्राइम ब्रांच वापस जा पाता है, यही इस सीरीज़ की मूल कहानी है.

राज कुमार हीरानी अपनी किस्म का सिनेमा बनाते हैं. सामाजिक मसलों को बड़े कॉमिक ढंग से पेश करना उनकी स्पेशैलिटी रही है. मसलन, 'मुन्ना भाई', 'पीके', '3 इडियट्स'. उनकी ये छाप इस सीरीज़ में भी नजर आती है. उनके किरदार मज़े-मज़े में अपना मैसेज डिलीवर करके चले जाते हैं. जैसे एक सीन में प्रीतम, पुलिस स्टेशन के वाई-फाई की बुराई करता है. फिर डर के मारे पेड्रो को सॉरी बोलता है. इसके जवाब में पेड्रो कहता है, "Opposition के क्रिटिसिज्म से ही डेमोक्रेसी चलती है". सीरीज़ में इंसानी मूल्यों के महत्व को बारीक तरीके से बरता गया है. किसी से माफी मांग लेने, या उसे माफ कर देने की अहमियत आपको यहां मालूम पड़ती है.
हिंदी सिनेमा में अमूमन मॉनीटर पर ढेर सारे भागते नंबर्स और जबरदस्ती कीबोर्ड पर रैंडम बटन दबाकर क्लीशे तरीके हैकिंग सीन्स दिखाए जाते हैं. लेकिन इस सीरीज़ में हैकिंग, मॉर्फिंग, इंटरनेट से डेटा लीक होना, डबल आइडेंटिटी, साइबर ठगी, एथिकल हैकिंग, डेटा मैपिंग जैसे कठिन सब्जेक्ट्स को बहुत आसान और आमफहम तरीके से दिखाया गया है. ताकि आम लोगों को भी समझ आए की इंटरनेट की दुनिया में हम कितने एक्सपोज्ड हैं.
वीर हीरानी ने इस सीरीज़ से अपना एक्टिंग डेब्यू किया हैं. सीरीज़ में उनका काम मजबूत है. वो तैयार लगते हैं. उनका किरदार प्रीतम एक मंझा हुआ हैकर है. जो कुछ वजह से उस काम को छोड़कर वैक्यूम क्लीनर बेच रहा है.अपने दादा के साथ रह रहा है. सीन इमोशनल हो या सीरियस, वीर की स्क्रीन प्रजेंस कॉन्फिडेंट है. वैसे आपने इनकी एक झलक मुन्ना भाई एमबीबीएस में देखी होगी. वो एंड क्रेडिट सीन में अरशद वारसी के किरदार यानी सर्किट के बच्चे के किरदार में दिखे थे.

विक्रांत मैसी अपना रोल और उसके इमोशंस जस्टिफाई करते नजर आते हैं. विट्टीनेस से गुस्सैल इमोशन का ट्रांजिशन अबरप्ट नहीं लगता है. इस सीरीज़ में मोना सिंह, बोमन ईरानी भी हैं. दोनों ने अपने हिस्से का काम पूरी ईमानदारी से किया है. इस सीरीज़ में साइबर फ्रॉड, बच्चों के पॉपुलर ब्लू व्हेल गेम, साइबर लिटरेसी पर बात हुई है. इंटरनेट की बदलती दुनिया और इसमें बच्चों को मिले वाईफाई एक्सेस की आज़ादी कितनी खतरनाक साबित हो सकती है, ये बताया गया है. मगर बेहद संजीदा और सिंपल तरीके से.
सीरीज़ की कहानी में कुछ लूपहोल्स ज़रूर हैं. मगर फिर भी इसका सस्पेंस और थ्रिल कम नहीं होता. कहानी में भरपूर उतार-चढ़ाव हैं. नयापन है. हाल की किसी सीरीज़ या फिल्म से मेल नहीं खाती. आत्महत्या, किडनैपिंग और क्राइम सीन्स से डील करते हुए भी कहानी बोझिल और हैवी नहीं होती. ट्रीटमेंट ऐसा है कि ये डार्क नहीं लगती. ये शो आपको एंटरटेन करेगा. कुछ कैमियोज़ भी हैं, जो नैरेटिव के साथ जाते हैं. ठूंसे हुए नहीं लगते. इसे मास्टपीस नहीं कह सकते. मगर ये लीक से हटकर कुछ करने की कोशिश करती है. काफी हद तक उसमें सफल भी होती है. आप 'प्रीतम और पेड्रो' को जियो हॉटस्टार पर स्ट्रीम कर सकते हैं.
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