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मुश्ताक खान: 'वेलकम' के उस हॉकी प्लेयर की कहानी, जो 'गदर 2' के कारण किडनैप हो गए थे!

सलीम खान ने मुश्ताक की एक्टिंग देखकर खुद महेश भट्ट से उनकी सिफारिश की थी.

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मुश्ताक खान का कैंसर के कारण 24 सितंबर को निधन हो गया.

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  • मुश्ताक खान ने अपने 45 वर्षों के करियर में 400 से अधिक फिल्मों और टीवी शो में काम किया, और वे खारिजी कलाकारों में से एक थे जिनकी एक्टिंग ने महत्वपूर्ण छाप छोड़ी।
  • उनके एक्टिंग करियर की शुरुआत आर्थिक कठिनाइयों और परिवार के डॉक्टर बनने की अपेक्षा के बीच हुई, जिसके कारण उन्होंने मेडिकल की बजाय कला की ओर रुख किया।
  • मुश्ताक खान की किडनैपिंग और फिर उनके निधन ने मनोरंजन जगत को प्रभावित किया, साथ ही उनके योगदान को याद करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।

सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो पोस्टर पर नहीं दिखते. मगर स्क्रीन पर उतरते ही अपनी अलग छाप छोड़ जाते हैं. वेटरन एक्टर मुश्ताक खान भी उनमें से एक हैं. अपने 45 साल से अधिक के करियर में उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्मों व सीरियल्स में काम किया था. इस दौरान वो कभी 'हम हैं राही प्यार के' वाले मिश्रा जी बन जाते, तो कभी 'वेलकम' के वो दमदार हॉकी प्लेयर बल्लू, जिनकी टांगें उदय भाई ने तोड़ दी थी. उनकी एक्टिंग रेंज का अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि उन्होंने नसीरुद्दीन शाह व आमिर खान से लेकर राजकुमार राव व बाबिल खान तक, हर पीढ़ी के साथ काम किया. मुश्ताक अब इस दुनिया में नहीं. ऐसे में हम आपको उनकी वो कहानी सुनाते हैं, जिसने एक छोटे शहर से निकले लड़के को सिनेमा के सबसे चिर-परिचित चेहरों में से एक बना दिया.

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# डॉक्टर बन जाते मगर…

मुश्ताक खान का जन्म मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में हुआ था. उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए एक्टर बनने-बनाने की ख्याल कोसों दूर था. मुश्ताक के माता-पिता चाहते थे कि वो डॉक्टर बनें. इस चक्कर में वो मेडिकल की तैयारी करने लगे. साइंस को उन्होंने सालभर समय दिया. परीक्षा में भी बैठे. मगर आंसर शीट भरते-भरते उन्हें ये समझ आ गया कि वो इस काम के लिए नहीं बने. फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में काफी कम नंबर आए. तंग आकर उन्होंने बीए करने का फैसला किया. इससे उन्हें कॉलेज में एक्टिंग करने के काफी मौके मिले.

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# मुंबई की सड़कों पर भूखे पेट सोए

मुश्ताक शुरुआत से ही एक्टर बनना चाहते थे. स्कूली दिनों में वो अपनी इस कला के कारण काफी पसंद किए जाते थे. सातवीं क्लास तक वो खुद नाटक लिखने लगे, जिसमें वो खुद ही डायरेक्ट और एक्ट करते थे. कॉलेज में तो वो इतने पॉपुलर हो गए कि प्रोफेसर्स खुद उन्हें कहते कि एक्टिंग की तरफ़ निकल लो. मगर उनके पिता को ये बात जमती नहीं थी. इसकी एक वजह ये भी थी कि उन्होंने मुश्ताक को कभी अभिनय करते नहीं देखा था. मगर उनके भाई को उनके टैलेंट का पता था. इसलिए घर में सबसे ज्यादा वो ही मुश्ताक को एक्टर बनने के लिए प्रेरित करते थे. उनकी वजह से मुश्ताक मुंबई तक जा सके. शुरुआती दिनों में उनके पास रहने और खाने की जगह तक नहीं थी. इस कारण वो अक्सर भूखे पेट सड़क किनारे सो जाते थे. लेकिन जब उन्होंने थिएटर करना शुरू किया तो उनकी स्थिति बेहतर होने लगी.

# अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?

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मुंबई आने के कुछ समय बाद मुश्ताक ने नेशनल अकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन को जॉइन किया. वहां छह महीने के कोर्स में उन्होंने एक्टिंग की बारीकियां सीखीं. फिर उन्होंने IPTA यानी इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन को जॉइन किया. वहां एक्टिंग करते हुए उन्हें अपनी पहली मूवी 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' मिली. इसमें नसीरुद्दीन शाह, शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल लीड रोल में थे. मूवी में मुश्ताक का किरदार स्मिता से फ़्लर्ट करता था. कैरेक्टर छोटा था, मगर उनके करियर को पुश देने के लिए काफी जरूरी भी.

# जब सलीम खान ने की मुकेश भट्ट से सिफारिश

IPTA के दिनों में मुश्ताक अपनी एक्टिंग के कारण काफी पॉपुलर होने लगे थे. इस कारण उन्होंने 10-12 साल तक लगातार नाटकों में काम किया. अक्सर लोग उन्हें देखने थिएटर आया करते. वहां डायरेक्टर इस्माइल श्रॉफ ने उनका काम देखा तो अपनी मूवी 'थोड़ी-सी बेवफाई' ऑफर कर दी. उसमें राजेश खन्ना लीड रोल में थे. उसी दौरान वेटरन स्क्रीनराइटर सलीम खान ने भी उन्हें 'लोककथा' नाटक में परफॉर्म करते देखा. वो मुश्ताक से इतना इंप्रेस हुए कि उन्हें सीधे महेश भट्ट के पास भेज दिया. महेश को उनमें काबिलियत नज़र आई. यही कारण है कि उन्होंने मुश्ताक को अपनी 15 मूवीज़ में कास्ट किया था. इनमें 'कब्जा', 'सड़क', 'साथी', 'जूनून', 'दिल है कि मानता नहीं' और 'हम हैं राही प्यार के' जैसे प्रोजेक्ट्स शामिल हैं.

# 900 रुपए की फीस

मुंबई आने वाला हर एक्टर फिल्मों में लीड हीरो बनना चाहता है. मगर मुश्ताक को बहुत जल्द ये समझ आ गया था कि उन्हें लीड या सपोर्टिंग से ज्यादा अच्छे काम पर फोकस करना है. यही कारण है कि कभी वो एक सीन वाली फिल्मों में दिखाई देते, तो कभी लगभग लीड रोल में कास्ट कर लिए जाते. डेब्यू के अगले साल यानी 1981 में उन्होंने अमिताभ बच्चन की 'कालिया' में काम किया. उनके लिए ये करो या मरो वाली बात थी क्योंकि तब वो जुहू में रहते थे. उनके घर का किराया 125 रुपए महीना था. वो पांच महीने का रेंट नहीं दे पाए थे. दाल-चावल की भी तंगी थी. ऐसे में मकान मालिक ने उन्हें घर छोड़ने का फ़रमान सुनाया. इत्तेफाक से उनके दोस्त सुमित के पिता टीनु आनंद को जानते थे. इसलिए उन्होंने सुमित से उनकी मदद करने कहा.

टीनु उनसे मिले तो मुश्ताक ने अपनी परेशानी बताई. टीनु तब अमिताभ बच्चन और प्राण के साथ 'कालिया' में काम कर रहे थे. उन्होंने मुश्ताक को बताया कि फिल्म में एक छोटा-सा रोल है, जिसके लिए वो झट से तैयार हो गए. 9 दिन की शूटिंग पर उन्हें हर दिन के 100 रुपए मिलते थे. मगर इस बहाने वो अमिताभ की नजरों में आ गए. अमिताभ ने उनकी तारीफ की. साथ ही वो नाटक भी देखा, जहां मुश्ताक जया बच्चन के साथ काम कर रहे थे. आने वाले सालों में दोनों ने 'मैं आजाद हूं', 'मृत्युदाता', 'मेजर साब' और 'लाडला' जैसी फिल्मों में काम किया.

# अमिताभ बच्चन के पत्र से मिला पहला घर

अमिताभ के गुड बुक्स में आने का सबसे बड़ा फायदा उन्हें अपनी शादी के बाद मिला. दरअसल, मुश्ताक के पास तब रहने को घर नहीं था. ऐसे में उनके दोस्तों ने कहा कि वो अमिताभ से बात करें. वो इसलिए क्योंकि अमिताभ तब पॉलिटिक्स में एक्टिव थे और उनकी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार से अच्छी दोस्ती थी. मुश्ताक और अमिताभ उन दिनों 'लाडला' की शूटिंग कर रहे थे. सेट पर जब उन्होंने अपनी समस्या बताई तो अमिताभ ने खुद उनके लिए एक रिकमेंडेशन लेटर लिखा. उसे लेकर मुश्ताक शरद पवार के पास गए, जिन्होंने तुरंत ही उस पर साइन कर दिया. इस तरह मुश्ताक को आर्टिस्ट कोटा से 2 लाख 40 हजार में अपना पहला घर मिल गया.

# करियर का सबसे बेहतरीन काम रिलीज़ ही नहीं हुआ

'उमराव जान' के डायरेक्टर मुजफ्फर अली 1985-86 में 'अंजुमन' डायरेक्ट कर रहे थे. उसमें शबाना आज़मी और फारूख शेख के साथ मुश्ताक खान को भी कास्ट किया गया. फिल्म में उन्हें लखनऊ के एक ऐसे नवाब का रोल दिया गया था, जो शबाना के किरदार को इंप्रेस करना चाहता है. मुश्ताक बताते हैं कि तब उनकी उम्र 21-22 साल की रही होगी. मगर डायरेक्टर ने उन्हें 50 साल के नवाब का रोल दे दिया. साथ ही ये कहा कि वो लखनऊ में खूब बिरयानी खाएं और पान चबा-चबाकर अपने दांत गंदे कर लें. मुश्ताक को मौके की जरूरत थी, इसलिए वो इन सबके लिए तैयार हो गए. वो दिनभर बिरयानी ठूसकर अपना वजन बढ़ाने लगे. साथ ही ढेरों शेरो-शायरी रटने लगे. जब काम की बारी आई तो उन्होंने वहां झंडे गाड़ दिए. वो इसे अपने करियर का सबसे बेहतरीन काम बताते हैं. लगा कि मामला अब सेट होने वाला है. मगर तभी मूवी के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर्स आपस में लड़ लिए. इस कारण 'अंजुमन' सिनेमाघरों में रिलीज़ नहीं हुई और लोग उनके इस काम को देख नहीं सके.

# कॉमिक रोल्स में हुए टाइपकास्ट 

आज मुश्ताक को ज़्यादातर कॉमिक रोल्स के लिए याद किया जाता है. इसका श्रेय महेश भट्ट के डायरेक्शन में बनी 'हम हैं राही प्यार के' को मिलना चाहिए. 1993 में महेश ने मुश्ताक को अपनी दो फिल्मों में लिया था. पहली थी नसीरुद्दीन शाह स्टारर 'सर', जिसमें उन्होंने नेगेटिव रोल किया था. वहीं आमिर खान की 'हम हैं राही प्यार के' में वो जापान से लौटे एक बिहारी शख्स मिश्राजी का रोल कर रहे थे. महेश भट्ट ने उन्हें इस मूवी में कास्ट करने का फैसला तब लिया था, तब उन्होंने वहीदा रहमान की 'स्वयं' में मुश्ताक का काम देखा. उस फिल्म में वो गारमेंट शॉप में काम करने वाले एक बिहारी कैरेक्टर में थे. उनका ये अंदाज महेश को इतना पसंद आया कि उन्होंने 'हम हैं राही प्यार के' में उन्हें भरा-पूरा रोल दे दिया. हालांकि मुश्ताक मानते हैं कि मिश्राजी के कॉमिक एलिमेंट ने उन्हें हमेशा के लिए टाइपकास्ट करवा दिया.

# आमिर ने आधी रात को दरवाजा खटखटाया

'अकेले हम अकेले तुम' में मुश्ताक आमिर खान के वकील बने थे. एक सीन में वो जज के सामने अपनी बात रख थे कि तभी आमिर को उनका एक पॉइंट पसंद नहीं आया. मगर डायरेक्टर मंसूर खान ने उनकी बात को अनसुना कर दिया. पैकअप शाम 6 बजे हुआ. 8 बजे फोन आया कि आमिर बात करना चाहते हैं. उन्होंने मुश्ताक से पूछा कि तुम रात में कब सोते हो? मुश्ताक ने 11 बजे का समय बताया. आमिर ने कहा कि उन्हें एक पॉइंट मिल गया है, जिसे वो राइटर के साथ लिख रहे हैं. मुश्ताक ने कहा कि वो अगले दिन इस पर डिस्कस करेंगे और फिर सोने चले गए. रात सवा 12 बजे उनके दरवाजे पर खटखटाहट हुई. गेट खोला तो आमिर बाहर खड़े थे. उन्होंने लैंप पोस्ट के नीचे खड़े होकर पूरा सीन सुनाया और तब जाकर उन्होंने अगले दिन दोबारा शूटिंग की.

# मेरी एक टांग नकली है, मैं हॉकी का बहुत बड़ा प्लेयर था

वैसे तो मुश्ताक ने अपने करियर में सैकड़ों मूवीज़ में काम किया है. मगर पॉप कल्चर में वो सबसे ज्यादा पॉपुलर 'वेलकम' के बल्लू द हॉकी प्लेयर बनकर ही हुए. इस फिल्म से उनका डायलॉग, "मेरी एक टांग नकली है. मैं हॉकी का बहुत बड़ा प्लेयर था", आज सबकी जुबान पर चढ़ा हुआ है. मगर इस कैरेक्टर की भी एक अलग कहानी है. दरअसल, 'वेलकम' की शूटिंग के लिए डायरेक्टर अनीस बज़्मी पूरी कास्ट एंड क्रू के साथ दुबई गए हुए थे. वहां शुरुआती छह-सात दिनों तक मुश्ताक सिर्फ हॉकी स्टिक लेकर खड़े रहे. अनिल कपूर, अक्षय कुमार, नाना पाटेकर और बाकी सब अपने सीन्स कर रहे थे. मगर मुश्ताक के हिस्से एक भी डायलॉग नहीं था. इस बात ने उन्हें काफी उदास कर दिया.

एक दिन मुश्ताक ने थोड़ी हिम्मत जुटाकर अनीस को अपनी समस्या बताई. इस पर अनीस ने कहा कि उनके पास अब तक हुए सीन्स में भले कोई डायलॉग न हो, मगर जब होगा, तो कमाल का होगा. कुछ समय बाद मुश्ताक को अपना डायलॉग मिला. स्क्रीन पर उन्होंने कई बार बताया कि उनकी एक टांग नकली है और वो हॉकी के बहुत बड़े प्लेयर थे. फिर क्या था, उनका ये डायलॉग फट पड़ा. सोशल मीडिया के चलन के बाद तो लोगों ने इस पर जितने मीम्स बनाए, उसका एक अलग हिसाब है.

# ‘वेलकम’ के लिए मिले बस 1 लाख रुपए!

मुश्ताक बताते हैं कि 'वेलकम' के लिए उनसे 25 दिन का समय मांगा गया था. बाद में 15 दिन और लिए गए. धीरे-धीरे काम 70 दिन तक खिंच गया. मगर इस काम के लिए उन्हें अक्षय कुमार के स्टाफ से भी कम पैसे मिले. कॉन्ट्रैक्ट में बंधे होने के कारण तब उन्हें केवल 1 लाख रुपए दिए गए. यही नहीं, दुबई में उन्हें उसी होटल में ठहराया गया जहां एक्टर्स के स्टाफ रहते थे. मुश्ताक को ये बात काफी खलती थी. हालांकि दूसरी तरफ़ वो इस बात की खुशी जाहिर करते हैं कि 'वेलकम' के कारण उन्हें आगे काफी काम मिला.  

# जब ‘गदर 2’ के कारण हो गए किडनैप

मुश्ताक खान के निधन से पहले अगर आप उन्हें गूगल करते, तो सबसे पहले उनके किडनैपिंग की कहानी आती. जी हां, नवंबर 2024 में उन्हें रील नहीं बल्कि रियल लाइफ में किडनैप कर लिया गया था. दरअसल, फिल्म एक्टर्स को अक्सर अलग-अलग इवेंट्स के लिए कॉन्टैक्ट किया जाता है. ज्यादातर समय वो सामने वाली पार्टी को जानते भी नहीं. फोन पर बात होती है और उसके आधार पर ही डेट व पैसा तय होता है. इसी सिलसिले में उन्हें मेरठ के एक अवार्ड फंक्शन के लिए कॉल आया. मामला जमा तो अडवांस पेमेंट और टिकट आ गई. जाने वाले दिन ड्राइवर गाड़ी लेकर भी पहुंच गया.

मगर मुश्ताक जैसे ही गाड़ी में बैठे, उन्हें किडनैप कर लिया गया. मुंह मोटी चादर से ढका था. किडनैपर्स उन्हें एक अनजान जगह पर ले गए. शुरू में उनसे 'गदर 2' की कमाई का हवाला देकर 1 करोड़ की फिरौती मांगी गई. फिर मामला 20 लाख तक आ गया. मुश्ताक का रातभर डर से बुरा हाल था. वो घंटों तक ऐसे ही पड़े रहे, जबकि किडनैपर्स शराब के नशे में धुत्त थे. उन्होंने मुश्ताक को बांधा नहीं था. सुबह साढ़े 5 बजे अजान की आवाज से मुश्ताक की आंखें खुलीं. दोनों किडनैपर्स सोए हुए थे. ऐसे में वो जूते हाथ में लेकर दबे पांव बाहर आए. दरवाजे खुला था, तो वो झट से भाग निकले. बगल में मस्जिद थी, जहां खुशकिस्मती से लोगों ने उन्हें पहचान लिया. मुश्ताक ने एक शख्स का फोन लेकर अपने घर पर कॉल लगाया. बाद में वो पुलिस के पास गए तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ. वो इस बात से हैरान थे कि मुश्ताक को बिना बांधे किडनैप कैसे किया गया. थोड़ी कहा-सुनी के बाद मुश्ताक किसी तरह अपने घर लौट आए.

# कैसे हुआ निधन?

मुश्ताक ने ‘बाप नंबरी, बेटा दस नंबरी’, ‘हम हैं राही प्यार के’, ‘मुझसे शादी करोगी’, ‘गदर: एक प्रेम कथा’, ‘वेल्कम’, 'गदर' और 'वॉन्टेड' जैसी कई फिल्मों में काम किया है. हालिया वर्षों में वो ‘भाभीजी घर पर हैं: फन ऑन द रन’, ‘जाट’, ‘स्त्री 2’, ‘गदर 2’ और ‘बाला’ जैसी मूवीज़ में नजर आए. यही नहीं, टीवी पर उन्होंने ‘कुछ रंग प्यार के ऐसे भी’, ‘अदालत’, ‘भारत: एक खोज’ और ‘वाग्ले की दुनिया’ जैसे शोज़ में काम किया है. करीब पांच साल पहले उन्हें लिवर कैंसर डिटेक्ट हुआ था. इलाज के बाद वो ठीक हो गए थे. मगर हाल ही में उनकी ये बीमारी दोबारा लौट आई. इस कारण लगभग 15 दिन पहले उन्हें मुंबई के नानावती हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया था. मगर 24 सितंबर को उनका निधन हो गया. 

वीडियो: सलीम खान बेटे सलमान के लिए ये चाहते थे... मुश्ताक ने सुनाया किस्सा

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