सबका साथ सबका विकास
ये टैगलाइन तो बीजेपी की है लेकिन निभाई धरतीपुत्र मुलायम ने. अपने परिवार में सबको साथ रखने की कोशिश में लगे पड़े हैं. हालात ये बन गए हैं कि अखिलेश यादव केले के पेड़ बने हैं सत्ता के फल से भारी हो रखे हैं. और शिवपाल बेर के दरख्त हैं. कह कबीर कैसे निभे केर बेर को संग. अखिलेश इत्ता नोचा गए हैं कि शिवपाल को कटा पड़ा देखना चाहते हैं. लेकिन मुलायम फैमिली के बड़े हैं. धमकाइयां चमकाइयां प्यार दुलार पुचकार सब आजमा रहे हैं कि एक्को गोटी गिरे न. नहीं तो बाहर सारी पार्टी दांत लगाए हैं. दन्न से हमला कर देंगी. कुर्सी ले लेंगी. सबको समझा बुझाकर रखा है.
बाप बाप होता है
यहां देहात में कहावत है "बेटवा होइगा आप बराबर समझो उसको बाप बराबर." अर्थात साइज में बाप की ऊंचाई तक आ गया है तो उसे बच्चा न समझो. बाप के जूते में बेटे का पैर सेट होने लगे तो भी उसपर से बच्चा होने का दबाव हट जाता है. लेकिन कहावत और प्रैक्टिकल में फर्क है गुरू. अखिलेश कितना बड़े तीस मार खां और सीएम पीएम हो जाएं, मुलायम की नजर में स्वेटर की बांह में नाक पोंछने वाले टीपू ही रहेंगे. तभी तो जब देखो डपटते रहते हैं. इस बात की फिक्र नहीं कि लड़का सीएम है. या कहीं ऊंचा मंच सजा है, सामने पब्लिक खड़ी है. या पार्टी मीटिंग चल रही है जिसमें रिश्तेदारों से लेकर बड़े छोटे तमाम लोग आए हैं. कहीं भी हड़काने लगते हैं. इस लड़ाई से ये प्रूव हो गया कि वो जिंदा रहते टिपिकल बाप ही रहेंगे.
अहसान नहीं भूले
नेता बनने के लिए जो अर्हता होती है उसके लिए एक कहानी सुनाई जाती है. कि बेटे ने बाप से कहा कि पापा मुझे भी राजनीति सीखनी है. बाप ने कहा जाओ छत पर से कूद जाओ, यहां मैं तुमको कैच कर लूंगा. बेटा कूद गया भैया. बाप नीचे से सरक गया. फिर हाथ पांव तुड़ाए बेटे से कहा कि ये होती है राजनीति. बाप बेटे का सगा नहीं होता. और एक बात. इसमें एहसान या विचारधारा जैसी कोई चीज नहीं होती. ये बात रीता बहुगुणा जोशी से बेहतर कौन बता सकता है यूपी वालों को. लेकिन मुलायम ने राजनीति की इस फिलॉसफी को सिर के बल उलटकर खड़ा कर दिया. वो अमर सिंह का एहसान सीने पर रखे ढो रहे हैं. पूरा परिवार चाहे ईंट लेकर एक दूसरे का सिर फोड़ डाले लेकिन उस एहसान में दबे मुलायम अमर सिंह के बारे में एक भी टेढ़ी बात नहीं सुनेंगे. अब वो एहसान क्या है ये उन्हीं से पूछना.
मोहनी मूरत मोदी
इधर यूपी में क्या देश में ही मोदी की लहर चल रही है. जो इस लहर के खिलाफ है (अगर किसी में औकात हो तो दिखाए) तो वो एंटीक पीस होगा. उसे म्यूजियम में रखा जा रहा है या भरे चौराहे गरिया के कान के कीड़े झाड़ दिए जा रहे हैं. मोदी की तारीफ करना संस्कार हैं भैया, संस्कृति है. और इस झगड़े के दौरान इस संस्कृति को अच्छे से निभाया नेताजी ने. मोदी की तारीफ की. कहा उनसे सीखो. पीएम बन गए लेकिन मां के सम्मान में कोई कमी न रखी. बात वाजिब है. नेताजी को शायद एहसास है कि उनका लड़का घर के कटोरी चम्मच तक बटवाएगा, पार्टी की तो बात ही क्या. इसलिए संस्कारी होते हुए उन्होंने मोदी की मिसाल दी.
गरीब को सम्मान और सम्मानित को पार्टी
अगली गाली नेताजी की इंसानियत पर सवाल उठाने वाला खाएगा. उन्होंने भारत की प्राचीन संस्कृति निभाई. आदमी कितना भी बड़ा हो जाए, छोटों को साथ लेकर चलता है. इसलिए उन्होंने गायत्री प्रजापति को वापस बुलाया. टीवी पर नेताजी की आवाज देखने वालों ने साफ साफ सुना होगा. जब उन्होंने कहा कि गायत्री प्रजापति गरीब परिवार से हैं इसलिए उनको पार्टी में वापस बुलाया. तो एक तरफ गरीब को पार्टी में मुकाम दिलाया. दूसरी तरफ मुख्तार अंसारी 'सम्मानित' को. उन्होंने कहा कि मुख्तार का परिवार सम्मानित और ईमानदार है. उनके ऊपर 30 से ऊपर मुकदमे चल रहे हैं लेकिन कोई झंझट नहीं. खुद उप राष्ट्रपति उनसे प्रेम से मिलते हैं इसलिए सम्मानित हैं और समाजवादी पार्टी के साथ रहेंगे. और हां, पार्टी नहीं टूटेगी. ये भी पढ़ें: मुलायम ने गले मिलवाया, लेकिन फिर झगड़ पड़े अखिलेश-शिवपाल साइकिल टूटी तो अमर सिंह पंचर वाला कांटा हथिया लेंगे अखिलेश यादव का सामान कमरे से निकाल फ़ेंका था शिवपाल ने! अखिलेश को लताड़ कर बोले मुलायम, 'अमर-शिवपाल मेरे भाई, अलग नहीं हो सकता'












