लॉकडाउन की वजह से इस साल ज्यादातर देशों में लोग रमजान का महीना घर पर ही बिताएंगे. लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं होगा. वहां, रमज़ान के दौरान मस्जिदें खुली रहेंगी.
पाकिस्तान: मौलवी चाहते थे लॉकडाउन में मस्ज़िदें खुली रहें, सरकार ने बात मान ली
पूरी दुनिया घर पर रमज़ान मनाएगी, पाकिस्तान में मस्ज़िदें खुलेंगी.

'द न्यूयॉर्क टाइम्स
' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के कुछ मौलवी कोरोना वायरस के खतरे को समझ रहे हैं, इसलिए लॉकडाउन को मान रहे हैं. लेकिन कुछ इसके खिलाफ हैं. लोगों से अपील की कि वो शुक्रवार की नमाज में शामिल होने आएं.
सरकार को भी बात माननी पड़ी
जैसे ही रमज़ान का महीना पास आया, कुछ कद्दावर मौलवियों ने एक लेटर लिखा. इनमें वो मौलवी भी शामिल थे, जिन्होंने पहले लॉकडाउन के आदेशों का पालन किया था. लेटर में सरकार से कहा कि रमज़ान का महीना आ रहा है, इसलिए मस्ज़िदों को लॉकडाउन से छूट दे दी जाए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो 'अल्लाह का गुस्सा' झेलना होगा.
सरकार ने फिर परमिशन दे दी. बीते शनिवार, यानी 18 अप्रैल के दिन. एक एग्रीमेंट बना, जिसमें मस्ज़िदों को खुले रखने की परमिशन दी गई, लेकिन कोरोना से बचाव के लिए 20 नियमों की शर्त भी लगाई. इनमें एक ये था कि मस्ज़िद में छह फुट की दूरी का पालन करना होगा. नमाज के लिए खुद की चटाई लानी होगी और घर पर उसे धोना होगा.

पाकिस्तान के रावलपिंडी में मस्ज़िद में नमाज पढ़ते लोग. फोटो- PTI.
पाकिस्तान के ही कुछ लोग इसके विरोध में
हसनुल आमीन, इस्लामाबाद में प्रोफेसर हैं, इस्लाम और पॉलिटिक्स के स्कॉलर हैं. उनका कहना है,
'देश पूरी तरह से इन मौलवियों के अधीन आ चुका है. जनता के लिए इस वक्त जो सबसे ज्यादा जरूरी है, सरकार उसका पालन नहीं करवा पा रही. ये पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है.'
क्या पैसा भी एक वजह है?
'द न्यू यॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, मस्ज़िदों को खोलने के पीछे पैसा भी एक बड़ा कारण है. मौलाना अतउल्लाह हाज़रवी, कराची में रहते हैं, उनका कहना है,
'हम जानते हैं कि कोरोना वायरस वैश्विक स्वास्थ्य का मुद्दा है, लेकिन धार्मिक कर्तव्यों का भी त्याग नहीं किया जा सकता. मस्ज़िदें काफी हद तक रमज़ान के महीने में मिलने वाले डोनेशन पर निर्भर रहती हैं.'

पाकिस्तान के कराची में मस्ज़िद में नमाज पढ़ते लोग. फोटो- PTI.
मौलवियों ने पिछले हफ्ते सरकार को जो लेटर लिखा था, उसमें 'पैसा' भी एक बड़ा मुद्दा था. रमज़ान के महीने में मस्ज़िदों को करोड़ों का दान मिलता है. हसनुल आमीन का कहना है,
'मौलवी नहीं चाहते कि सोसायटी पर उनका जो सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव है, वो खत्म हो. उन्हें डर है कि अगर मुस्लिम मस्ज़िद नहीं आएंगे, तो उनकी पावर और प्रभाव खत्म हो जाएगा.'
पत्रकार क्या कहते हैं?
पाकिस्तान का जाना-माना अखबार है 'डॉन'. कुछ दिन पहले इसमें एक एडिटोरियल छपा था. उसमें कहा गया था कि इस संकट के वक्त मौलवियों को पीछे हो जाना चाहिए और सरकार को सबकुछ मैनेज करने देना चाहिए. आगे लिखा,
'इसे (लॉकडाउन) को धर्म के अपमान की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. ये तो जनता की जिंदगी बचाने के लिए लिया गया फैसला है.'
डॉक्टर्स नाराज़ हैं
इधर डॉक्टर्स और हेल्थ वर्कर्स भी मस्ज़िदों के खुलने के विरोध में हैं. उन्होंने 21 अप्रैल को एक लेटर लिखा. अपील की कि मस्ज़िद में एक वक्त पर पांच से ज्यादा लोग इकट्ठे न हों, इसके लिए ऑर्डर पास किया जाए. अगले दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करके भी अपील की.
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