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"हिमेश रेशमिया ने नाक से गाया, और लोग उन्हें सिर पर लेकर नाचे, तो अब क्या ही बोलूं..."

हिमेश रेशमिया के नाक से गाने के बारे में सुरेश वाडकर ने कहा- "मैं शब्दों पर बिंदी लगा नहीं पाता था, वो बिंदी लगाकर ही गा रहे हैं."

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सुरेश वाडकर ने बताया कि अमेरिका में हिमेश के शो में हज़ारों लोग पहुंचते थे. और दीवानों की तरह नाचते थे.

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  • सुरेश वाडकर ने पॉपुलर म्यूजिक डायरेक्टर हिमेश रेशमिया के गानों के अंदाज़ में नाक से गाने के स्टाइल की चर्चा की और इसे उनके पहचान बनाने वाले फैक्ट के तौर पर बताया।
  • हिमेश रेशमिया के नेज़ल सिंगिंग स्टाइल को लेकर आलोचनाएं होती रहीं लेकिन उनकी लोकप्रियता और बड़े आयोजनों में उनके गानों की सफलता इसके पीछे का कारण रही।
  • सुरेश वाडकर के अनुसार, हिमेश के गानों की तिहाई और अनोखा स्टाइल दर्शकों द्वारा स्वीकार किये जाने के कारण उनकी संगीत यात्रा में यह पैटर्न अगली पीढ़ी तक जाता रहेगा।

Suresh Wadkar ने हिंदी सिनेमा के म्यूज़िक के कई दौर देखे हैं. उन्होंने Mohammad Rafi और Lata Mangeshkar जैसे दिग्गजों का दौर भी देखा. और Himesh Reshammiya वाला फेज़ भी. हिमेश बड़े सुपरहिट हुए. मगर नाक से गाने की वजह से आलोचना के शिकार भी हुए. पिछले दिनों जब सुरेश वाडकर दी लल्लनटॉप के ख़ास कार्यक्रम गेस्ट इन द न्यूज़रूम में आए, तो उन्होंने इस बारे में भी बात की. 

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हिमेश रेशमिया और उनके गाने के अंदाज़ के बारे में उन्होंने कहा,

“बुरा कैसे बोल सकता हूं मैं उसके लिए? जब लोग उस चीज़ को पसंद कर रहे हैं. देखिए, सारा दारोमदार हमारे माई-बाप,अन्नदाता, जो हमारे सुनने वाले हैं, उनका है. उन्हीं का हम लोग जीते, खाते-पीते हैं. हम लोग ऑडियंस को माई-बाप बोलते हैं. देवता बोलते हैं. तो जब देवताओं को ही ये चीज़ पसंद आ गई है, तो वो बुरी कैसे हो सकती है? और अगर उन्होंने नाक में गाया है, और लोग उन्हें सिर पर लेकर नाचे हैं, सुपर-डुपर हिट उस समय उनके गाने चले हैं. तो उसका वो स्टाइल बन गया ना. तो फिर वो नेज़ल ही गाएगा ना!”

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हिमेश के गानों का एक पैटर्न था. इसके बारे में सुरेश ने कहा,

"उनके हर गाने में तिहाई होती है. जैसे आशिक़ बनाया, आशिक़ बनाया, आशिक़ बनाया आपने... ये है तिहाई. ये ख़ासियत होती थी उनकी. एक कोई वर्ड वो तीन-तीन बार गाते थे. मुखड़े में भी, अंतरे में भी. ये उनका स्टाइल बन गया था. और उनकी कितनी पिक्चरें आईं. मैं उन दिनों यूएस में था. मैंने देखा है वहां उनका टुअर चल रहा था. 50-50 हज़ार लोग स्टेडियम में बैठे होते थे उनका गाना सुनने के लिए. और दीवानों की तरह नाचते थे. तो बुरा कैसे हो सकता है वो. हां, उन्होंने अपना स्टाइल बनाया था नाक से गाने का. अब उनकी आवाज़ ही वैसी होगी."

# "मैं बिंदी लगा नहीं पाता था, वो बिंदी लगाकर ही गा रहे हैं"

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सुरेश वाडकर ने बताया कि उन्हें शब्दों के ऊपर लगे अनुस्वार के उच्चारण में परेशानी होती थी. अक्सर अनुस्वार छूट जाता था. उषा खन्ना ने उनकी ये आदत छुड़वाई. बकौल सुरेश,

“अभी मैं मराठी हूं ना, जब शुरू-शुरू में आया था इंडस्ट्री में, तो अनुस्वार जो होता है, वो जल्दी से साउंड करता ही नहीं था मुझसे. उसमें मुझे थोड़ा टाइम लग गया. उषा खन्ना जी जो हैं, वो मेरी बहन बनी हुई. तो वो मुझे बोलती थीं- ‘ओ घाटी! वो ऊपर की बिंदी कौन गाएगा?’ मराठी में घाटी, बर्तन मांझने वाले को बोलते हैं. तो वो टोक देती थीं मुझे. अभी कहां तो मैं बिंदी लगा नहीं पा रहा. और कहां वो (हिमेश) बिंदी लगाकर ही गा रहे थे. मगर जब मेरे माई-बाप उसको स्वीकार रहे हैं, तो मैं क्या ही बोलूं. पब्लिक के सामने तो हम लोग नतमस्तक हैं.”

साल 1955 में कोल्हापुर में जन्मे सुरेश वाडकर ने संगीत की बाक़ायदा तालीम 4 साल की उम्र में शुरू की. 20 साल की उम्र में उन्होंने 'सुर श्रृंगार' नाम की एक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. इसमें म्यूज़िक डायरेक्टर जयदेव और रवींद्र जैन जज थे. दोनों ही सुरेश की आवाज़ और उनकी तैयारी से प्रभावित हुए. कुछ वक्त बाद सुरेश जयदेव के असिस्टेंट बने. मगर फिल्मों में उन्हें पहला गाना रवींद्र जैन ने दिया. फिल्म है ‘पहेली’. गाने के बोल हैं- 'वृष्टि पड़े टापुर टुपुर'. ये गाना चलने के बाद जयदेव ने उनसे ‘गमन’ की ग़ज़ल ‘सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यों है…’, गवाई. इन गानों के बाद सुरेश की पूछ-परख बढ़ी. और आगे चलकर उन्होंने हिंदी-मराठी सिनेमा के लिए सैकड़ों गाने गाए. 

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