पद्मावत फ़िल्म रिव्यू
रणवीर सिंह, शाहिद कपूर और दीपिका पादुकोण की फ़िल्म, जिसकी विलेन करणी सेना है.
'पद्मावत' के इस एक मुद्दे पर देखें, तो पाकिस्तान हमसे कई गुना ज्यादा समझदार निकला. मक्खन की तरह होगी वहां फिल्म रिलीज होगी. वहीं हमारे यहां इस फिल्म को लेकर दंगा छिड़ा हुआ है. हंगामा है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. कानून-व्यवस्था सब घुटने टेकते दिख रहे हैं.
24 जनवरी 2018 (अपडेटेड: 24 जनवरी 2018, 11:35 AM IST)
"सारा खेल तो ख्वाहिशों का है."
जलालुद्दीन खिलजी ने अपने दरबारियों के सामने गोश्त चबाते हुए बड़े ही आराम से ये बात कह दी थी. फ़िल्म पद्मावत की कहानी पूरी तरह से इसी एक बात पर चलती है. इन्हीं ख्वाहिशों के चलते जलालुद्दीन को उसके भतीजे अलाउद्दीन ने मार डाला. इसी ख्वाहिश के चलते राजा रतन सिंह को मेवाड़ से सिंहल आना पड़ता है क्यूंकि उनकी पत्नी को सिंहल के मोतियों का हार चाहिए था. यहां रतन सिंह को दिखती है पद्मावती. सिंहल नरेश की बेटी. और फिर जागती है ख्वाहिश उसे अपने साथ मेवाड़ ले जाने की. अलाउद्दीन की भी ख्वाहिश है - पद्मावती को पाने की. क्यूंकि वो पूरी दुनिया जीतने की ख्वाहिश रखता है. राजा रतन सिंह राजपूताना आन, बान और शान को कतई खरोंच भी आने नहीं देना चाहता. राजपूताना सम्मान की सलामती उसकी ख्वाहिश है. इसी ख्वाहिश का खेल है संजय लीला भंसाली की पद्मावत.
बड़ी ही जद्दोजहद के बाद ये फ़िल्म रिलीज़ हो पाई है. वो भीड़ जो इसे रिलीज़ न होने देने के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार है, जब इस फ़िल्म को देखेगी तो अपना सर पीटेगी. वो सभी सोचेंगे कि क्यूं नहीं इस फ़िल्म को दो-तीन साल पहले ही बनवा दिया. मुझे डर है कहीं ये ऑफेंडेड सेना जाकर भंसाली के घर उनसे क्षमायाचना करते हुए उन्हें एक-दो राजस्थानी गांव उपहार स्वरूप न दे दे.
फ़िल्म की कहानी से हम सभी वाकिफ़ हैं. मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत पर आधारित. फ़िल्म की शुरुआत में दबी जुबान में ये भी कहा गया है कि 'इस पूरी कथा को काल्पनिक भी कहा जाता है.' खैर, वो बाद की बात है. राजा रतन सिंह सिंहल आए होते हैं. उनकी मुलाक़ात होती है पद्मावती से. रतन सिंह उसे रानी पद्मावती बना कर मेवाड़ आ जाते हैं. मेवाड़ से एक राजपंडित जी का देशनिकाला किया जाता है. वो जाकर अलाउद्दीन से मिल जाता है और अलाउद्दीन को पद्मावती के रूप के बारे में बताता है. अलाउद्दीन, जिसे हर अच्छी चीज़ अपने लिए चाहिए होती थी, पद्मावती को पाने के लिए निकल पड़ता है. यहीं से शुरू होती है दिल्ली और मेवाड़ के बीच ख्वाहिशों की लड़ाई. अलाउद्दीन और रतन सिंह के बीच पद्मावती की लड़ाई.
संजय लीला भंसाली ने इस फ़िल्म को बनाते वक्त अपनी सारी ताकत और अभी तक का अपना सारा अनुभव डाल दिया है. पूरी फ़िल्म के दौरान वो दिखता रहा. भव्यता को दिखाना उनकी ताकत रहा है और उन्होंने इसी ताकत पर खेल रचा है. हमें जब भी लेजेंड्स पर कहानियां दिखानी हों, उन्हें पद्मावत जैसा ही दिखाया जाए.
अलाउद्दीन खिलजी. एक इंसान के रूप में खूंखार दानव. इसे रणवीर सिंह ने निभाया है. रणवीर सिंह ने इस फ़िल्म में खूब नंबर कमाए हैं. न चाहते हुए भी रणवीर इस फ़िल्म के नायक बन जाते हैं. बजाय रतन सिंह के जज़्बे और उनके साहस के, या पद्मावती के जौहर करने के 'साहसिक फ़ैसले' के, फ़िल्म अलाउद्दीन की असफलता की कहानी बन जाती है. कहानी पूरी तरह से अलाउद्दीन के इर्द-गिर्द घूमने लगती है और सब कुछ उसी के तम्बू में केंद्रित हो जाता है. और ये सब तब, जब कहीं भी अलाउद्दीन के किए-धरे को सही नहीं ठहराया गया है. रणवीर सिंह अपनी एनर्जी से सब कुछ जीत लेते हैं. इस फ़िल्म से उन्हें खूब शाबाशी मिलने वाली है. कई जगहों पर वो आपको अपने एक्सप्रेशन और अपनी एनर्जी से चौंका देते हैं. एक बेहद निर्मम और कठोर इंसान, जो इंसान से लगभग एक दरिंदा बन चुका है, के रोल में रणवीर ने कमाल का काम किया है.

दीपिका पादुकोण यानी पद्मावती. ग्राफ़िक्स से न केवल उनकी कमर छुपाई गई है, बल्कि उन्हें रूपवती भी किया है. कई जगहों पर टाइट फ्रेम्स में बनावटी रूप साफ़ दिखाई दे रहा था. किलो के भाव ज्वेलरी पहनी है और घूमर के वक़्त उन्हें भारी भरकम गहनों और कपड़ों से लदे होने के बाद नाचते हुए देखने में सांस फूलती मालूम देती है. शाहिद कपूर यानी राजा रतन सिंह. मेवाड़ का राजा जो सलमान खान बनना चाहता है और इसलिए अक्सर शर्ट उतार के खड़ा दिखाई मिलता है. अज्ञात वजहों से शाहिद कपूर दाढ़ी और ताव दी गई मूंछों के बावजूद वो 'राजपूताना' वाली फ़ीलिंग नहीं दे पाते हैं. (लगता ही नहीं है कि आगे चलकर इसी की आने वाली पीढ़ी जाकर एक फ़िल्म की रिलीज़ पर देश भर में तोड़फोड़ मचाएगी.) उनके दांत जो उन्हें क्यूट बना देते हैं, शायद इसकी एक बड़ी वजह होंगे. एक जगह पर बकरे की बलि देने के लिए बेहद इंटेंस सीक्वेंस में जैसे ही वो तलवार उठाकर 'जय भवानी' का नारा लगाते हैं, उनके दांत दिख जाते हैं और सारी इंटेंसिटी ख़तम हो जाती है. दीपिका और शाहिद, दोनों को ही रणवीर सिंह ने बिना कुछ जोर लगाए अपनी परछाईं में ले लिया है. फ़िल्म में रणवीर ही रणवीर दिखाई देता है.

फ़िल्म पेट्रियार्की अर्थात पितृसत्ता का एक बहुत बड़ा उदाहरण है. ये एक पीरियड ड्रामा है और उस वक़्त ऐसी चीज़ें ही हुआ करती थीं. इस लिहाज़ से फ़िल्म में इन सभी बातों की मौजूदी की वजह से इसे नकारा नहीं जाना चाहिए. चोरी करना गैरकानूनी है, मगर चोर पर बनी फ़िल्म में उसकी मॉरल वैल्यू को बचाए रखने के लिए ज़बरदस्ती चोरी न दिखाई जाए तो बेवकूफ़ी ही होगी. राज-पाट के समय में महिलाओं की बुरी स्थिति तब दिखती है जब प्रजा की रक्षा के खातिर पद्मावती अलाउद्दीन के सामने जाने का फ़ैसला करती है और राज रतन उसे ये याद दिलाते हैं कि वो भले ही वहां की रानी हैं लेकिन शासकीय फ़ैसले लेने का हक़ उन्हें नहीं मिला है. अब इस बात को फ़िल्म में दिखाए जाने पर इसे महिला विरोधी क़रार दिया जाए तो काफ़ी बचकानी बात लगेगी.
हमें समझना ये चाहिए कि जिस वक़्त की कहानी बताई गई है, महिलाओं को बपौती और उसे उपभोग किये जाने की एक चीज़ बनाकर रख दिया गया था. इसके ऊपर आन, बान और शान की चाशनी लपेट एक अच्छे होमियोपैथी के डॉक्टर की तरह उसे परोसा जाता रहा. फ़िल्म इसे उघाड़ कर रख देती है.
कुल मिलाकर पद्मावत फ़िल्म देखी जानी चाहिए. इसे देखकर अहसास होता है कि इसके लगभग बैन हो जाने की स्थिति आ जाने पर भंसाली किस कदर छटपटाए होंगे. ऑफेंडेड सेना को हमारा नमस्ते. वो खुद पर पेट्रोल फेंकने से पहले ये फ़िल्म देखे. रणवीर सिंह ने बाज़ी मारी है. उनके लिए ये फ़िल्म देखी जाए. भंसाली के सेट और उनके महल देखने के लिए ये फ़िल्म देखी जाए. शायद इसलिए भी देखी जाए क्यूंकि एक मानसिक रूप से दिवालिया हो चुका तबका इस फ़िल्म को सामने ही नहीं आने देना चाहता है. इसका विरोध भी बेहद ज़रूरी है.