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'बेकार कुत्ते' : बुद्धा, फ़ैज़, नक्सलवाद अौर ट्रैफिक जाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की आधी सदी पुरानी नज़्म, स्वांग वाले रोहित शर्मा का संगीत : 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' का नया गाना

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फोटो - thelallantop

कहते हैं अच्छा कवि या शायर अपने दौर की कहानी बयां करता है, लेकिन अद्वितीय वो रचनाकार है जिसकी कविता हर नए दौर में खुद को रि-इन्वेंट कर लेती है. अपने भीतर एक नया अर्थ भर लेती है. एक नई पोशाक जिसमें नए अर्थों के सुनहरी पर जड़े होते हैं. फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ इसी पाये के शायर हैं. बीसवीं सदी में हमारे उपमहाद्वीप में हुए शायद सबसे चमकदार अौर अज़ीम शायर. सबसे चुनौतियों से भरे भी.

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इन्हीं फैज़ अहमद फैज़ ने जब आधी सदी पहले अपनी किताब 'नक्श-ए-फ़रियादी' में चर्चित नज़्म 'ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते' दर्ज की होगी तो उनके सामने एक गुलाम देश के नागरिक अौर अत्याचारी अंग्रेज सत्ता थी. लेकिन फ़ैज़ की कविता सत्ता को संबोधित नहीं है. फ़ैज़ यहां उन 'कुत्तों' से मुखातिब हैं जो दुत्कारे जा रहे हैं, सताए जा रहे हैं फिर भी चुप हैं. शायद सोये हुए हैं. फ़ैज़ यहां सीधे हमसे संबोधित हैं. इस देश के 'सोये हुए' नागरिक से. इस नज़्म की मार इतनी डाइरेक्ट है, इतनी सीधी है कि असहज कर देती है.

"ना आराम शब को, ना राहत सवेरे

गलाज़त में घर नालियों में बसेरे

जो बिगड़ें तो एक दूसरे से लड़ा दो

ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो"

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लेकिन जब 2016 में स्वांग वाले रोहित शर्मा इसे अपने संगीत में दोबारा रच गाते हैं तो यह नज़्म फिर एक नया अर्थ ग्रहण कर लेती है, एक नई पोशाक पहन लेती है. कैसे, जानने के लिए विवेक अग्निहोत्री की आनेवाली फिल्म 'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' का यह गाना सुनिए.

https://www.youtube.com/watch?v=KKjP3lMyfGM

फिल्म इस गीत के साथ छवियों का एक कोलाज सा बनाती है. यह एक्सट्रीम्स का कोलाज है. इसमें एक अोर किसी अंग्रेजीदां बिजनस स्कूल में पढ़ते अौर पार्टी करते नई पीढ़ी के उतने ही अंग्रेजीदां लड़के लड़कियां दिखाई देते हैं, अौर दूसरी अोर छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों की छवियां हैं.  देश की गरीबी की तस्वीर है तो साथ उसी फ्रेम में माल्या की अमीरी की तस्वीर है. इस कॉन्ट्रास्ट से दूसरी वाली तस्वीर की अश्लीलता खुलकर सामने आती है.

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गीत के पहले कुछ संवाद हैं. हाथ में अधजली सिगरेट लेकर यहां फिल्म के मुख्य प्रोटेगनिस्ट की भूमिका में अरुणोदय सिंह अपनी ही उमर के चंद अन्य नवयुवकों को धिक्कार रहे हैं. उन्हें समझा रहे हैं कि कैसे इंफोसिस, गूगल अौर ऐसी अन्य मल्टीनेशनल कंपनियों के मोटे 'पे पैकेज' दरअसल उन्हें गुलाम बनाने का ज़रिया हैं. 'स्लेव टू दि सिस्टम'. कि कैसे वे चाहें तो दुनिया बदल सकते हैं. अौर फिर आता है फ़ैज़ का 'बेकार कुत्ते'.

कॉर्पोरेट लैडर चढ़ने की फिकर में दुबले हो रहे, रुटीन वाली ज़िन्दगी में उलझे, वीकेंड पर ज़िन्दगी तलाशते, घर की ईएमआई अौर कार लोन को ज़िन्दगी का असली लक्ष्य समझकर चुकाते हुए जब आप फ़ैज़ की यह नज़्म 'बेकार कुत्ते' सुनेंगे, झटका लगेगा. आप सोचेंगे कि यह आदमी आधी सदी पहले हमारे जीवन का सच कैसे लिख गया. अौर वो भी इतनी कड़वी भाषा में, इतनी सच्ची भाषा में.

'बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम' फिल्म भले ही कैसी भी होनेवाली हो, इस निश्छल, बेपरवाह अौर सच्चे प्रयोग को फिल्म का हिस्सा बनाने के लिए उन्हें दिल से साधुवाद है.

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