फिल्म- आवारापन 2
डायरेक्टर- नितिन कक्कड़
एक्टर्स- इमरान हाशमी, दिशा पाटनी, शबाना आज़मी, पूरण पब्बी, सुविंदर विकी, विजयंत कोहली
रेटिंग- 2.5 स्टार
फिल्म रिव्यू- आवारापन 2
कैसी है इमरान हाशमी की कल्ट फिल्म 'आवारापन' का सीक्वल 'आवारापन 2'?

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भारी फैन फ्रेंज़ी के बीच इमरान हाशमी की 'आवारापन 2' थिएटर्स में रिलीज़ हो चुकी है. 2007 में आई 'आवारापन' का कोर प्रेम था. मगर इसमें कई अन्य मज़मूनों को साधा गया था. इसमें एथीज्म से लेकर आध्यात्मिकता, प्रेम और विरह सबकुछ था. मगर ये सब चीज़ें इसलिए काम कर पाईं क्योंकि उसे कहानी में बड़े करीने से पिरोया गया था. शिवम पंडित को बचाने के लिए उसकी प्रेमिका आलिया अपनी जान दे देती है. जिसका घाव शिवम जीवनपर्यंत कैरी करता है. और फिर एक प्रेमी जोड़े को बचाने की कोशिश में खुद मारा जाता है. वो फिल्म कुछ इस तरह से खत्म होती है मानो उस जोड़े को बचाकर शिवम ने अपने सारे पुराने पाप धो लिए. और मरकर अपनी प्रेमिका के पास चला गया. इसलिए उस फिल्म का इम्पैक्ट ओरिजिनल रिलीज़ के कई सालों बाद तक बना रहा.
मगर 'आवारापन 2' बनने का मतलब ये है कि शिवम ज़िंदा है. मगर वो जिंदा बचा कैसे, इसका जवाब बड़ा सिंपल है- क्योंकि प्रोड्यूसर्स चाहते थे. मगर एक फ्लैशबैक की मदद से इसका सिनेमैटिक कारण बताया जाता है. जो आपके दिमाग में सबसे पहला तरीका आए, शिवम वैसे ही ज़िंदा बचा. अब वो क्राइम की दुनिया से दूर भारत के एक छोटे से शहर में रहता है. तभी उसकी मुलाकात इंटरपोल के एक ऑफिसर से होती है, जो उसे एक मिशन पर भेज देता है.
'आवारापन 2' की शुरुआत में शिवम, आलिया की कब्र पर फूल चढ़ाने जाता है. और पूछता है कि आखिर उसके ज़िंदा बच जाने का मक़सद क्या है. क्या उसकी नीयति सिर्फ तड़पन और छटपटाहट है! ठीक उसी पल उसे अपना नया मक़सद मिलता है. एक और आलिया. जिसे वो दोबारा मरने नहीं दे सकता. अगर इस आलिया को बचाना है, तो उसे एक चाइल्ड ट्रैफिकिंग नेटवर्क में घुसकर उसको खत्म करना होगा. और यही चीज़ इस फिल्म को एक इमोशनल कहानी की बजाय एक टेम्पेलेट क्राइम थ्रिलर में कन्वर्ट कर देती है. जो एक अच्छी थ्रिलर होना तो छोड़िए, अपने होने को जस्टिफाई करने के लिए भी संघर्ष करती है.
'आवारापन 2' अपनी ओरिजिनल फिल्म से टेक्निकली और स्केल वाइज़ बहुत बड़ी और बेहतर फिल्म है. लेकिन तभी आप समझते हैं कि पब्लिक ने 'आवारापन' को कभी उसकी तकनीक या ग्रैंडनेस के लिए याद नहीं रखा. जनता को वो भाव याद है, जो उन्हें वो फिल्म देखते हुए महसूस हुआ था. वो फीलिंग आपको 'आवारापन 2' से कभी नहीं आती. शिवम का घाव इतना गहरा है कि वो ज़िंदा रहते तो नहीं भर सकता. अब वो उसकी हस्ती का सामां है. मगर मेकर्स के लिए वो महज एक प्लॉट डिवाइस है, जिसे वो कैश इन करना चाहते हैं. इसलिए मैं आपको बता दूं कि 'आवारापन 2' के तौर पर आपके साथ एक प्रैंक हुआ है.
ये फिल्म अपने दौर की त्रासदी और बेबसी का बयान है. लेगेसी सीक्वल, पुराने गानों के रीहैश्ड वर्जन, और मास एलीवेशन वाले मोमेंट्स. सबकुछ लुक के लिए हो रहा है, फील की किसी को नहीं पड़ी. कई बार आपको ऐसा लगता है जैसे मेकर्स आपको फुसलाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर आपने 'आवारापन' देखी है, तो आप 'आवारापन 2' ज़ाहिर तौर पर देखना चाहेंगे. इस फिल्म के मेकर्स आपसे बस यही चाहते हैं.
ओरिजिनल फिल्म के दो गाने 'तेरा मेरा रिश्ता पुराना' और 'तो फिर आओ' रिलीज़ के 19 साल बाद भी आपके भीतर वही भाव जगा पाते हैं. एक जगह इस गाने का इस्तेमाल बड़े खूबसूरत तरीके से हुआ है. जब ये फिल्म पहली बार 'आवारापन' का सीक्वल होने का खम ठोकती है. शिवम का पात्र पुलिस की गन पॉइंट पर होता है. तभी नेपथ्य में 'तेरा मेरा रिश्ता' बजता है और कुछ चाइनीज़ मॉन्क उसे घेर लेते हैं. वो बच निकलता है. ईश्वरवाद और नीरीश्वरवाद के बीच की जो लकीर है, वो धुंधली हो जाती है. खासकर शिवम के किरदार के संदर्भ में.
इमरान हाशमी, शिवम के कैरेक्टर में सारे इमोशन वापस लेकर आते हैं, जो दर्शक चाहते हैं. उनकी आंखें, उनकी देहबोली सबकुछ. मगर स्क्रीनप्ले का हल्कापन कुछ भी नया ऑफर नहीं करता. इस कहानी को देखते वक्त आप हमेशा शिवम का एक्सटीरियर देख रहे होते हैं. उसके भीतर जाने का जोखिम ये फिल्म बिल्कुल नहीं लेती. इसलिए आपका और इस फिल्म का नया रिश्ता कभी बन नहीं पाता.
ज़ोरावर के रोल में पूरण गब्बी ही वो इकलौते कैरेक्टर हैं, जिनके पास कुछ फ्रेश करने का मौका था. वो उन्होंने भरसक किया है. उन्हें स्क्रीन पर परफॉर्म करते देखकर ऐसा लगता है कि अगर विजय वर्मा और गुलशन देवैया का लवचाइल्ड होता है, तो वो बिल्कुल ऐसा ही होता. मगर वो भी काफी केरिकेचरिश विलन बनकर रह जाता है. शबाना आज़मी इस फिल्म की मेजर स्टेकहोल्डर हैं. कहानी के लिहाज से. मगर फिल्म में उन्हें कहानी को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. वो भी बेहद सीमित स्क्रीनटाइम के साथ. विजयंत कोहली और सुविंदर विकी के पात्र भी कथानक में कुछ खास जोड़ नहीं पाते. दिशा पाटनी ने इस फिल्म में ज़ारा नाम की लड़की का रोल किया है, जिसका बचपन बड़ा ट्रॉमैटिक रहा है. दिशा को पहली बार थोड़ा कॉम्प्लेक्स रोल मिला है. जिसमें वो कुछ ज़्यादा तो नहीं जोड़ पातीं. मगर खटकने नहीं देतीं.
'आवारापन 2' एक बिगर फिल्म हो सकती है. मगर ओरिजिनल से बेटर फिल्म तो किसी लिहाज से नहीं है. इमरान हाशमी इस फिल्म की आत्मा हैं. मगर ये फिल्म ही खोखली है. ये शिवम के दुख को न समझ पाती है, न उसे कोई क्लोजर दे पाती है. वो उसे सिर्फ एक जॉनर, एक फ्रैंचाइज़ में तब्दील कर देती है, जिसे आगे और भुनाया जा सके.
वीडियो: इमरान हाशमी की आवारापन 2 हुई रिलीज़, कैसा रहा पब्लिक रिएक्शन?











