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आम आदमी पार्टी के बन रहे ये 13 नए सांसद!

आप भी देख लो. कित्ते सांसदाकांक्षी हैं आम आदमी पार्टी में.

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संजय सिंह (दाएं), मीरा सान्याल (दाएं ऊपर) और यशवंत सिन्हा (दाएं नीचे)

दिल्ली में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं. तीनों पर सांसद कांग्रेस के थे. (उनके नाम- परवेज़ हाशमी, करण सिंह और जनार्दन द्विवेदी) ये तीनों थे ही रहेंगे, क्योंकि अब कांग्रेस के पास दिल्ली विधानसभा में ज़ीरो सीट हैं. तीन भी तिली-लिली धप्पू बराबर हैं, इसीलिए बीजेपी भी खींसे निपोरे. 67 के साथ आम आदमी पार्टी के पास तीनों सीटें जानी तय हैं. जो विधायक नाराज हैं, वो भी कुछ न कबाड़ पाएंगे, क्योंकि व्हिप मने चाबुक की चुस्की उनको भी चखनी होगी.

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पर मसला ये है कि पिछले दो हफ्ते से ये तीन तेरह में बदल चुके हैं. नए-नए नाम चल रहे हैं. चलवाए जा रहे हैं. हमने सब झारन-पछोरन एक जगह कर दी. आप भी देख लो. कित्ते सांसदाकांक्षी हैं आम आदमी पार्टी में. और इसमें हमने RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर का नाम नहीं रखा है, क्योंकि वो लोग केजरीवाल को 'थैंक्यू वेरी मच, एम नॉट इंटरेस्टेड' कह चुके हैं.

तो ये रहे 13 नाम, जिन्हें खूब उछाला गया. बाकी तो अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया अंडमान निकोबार में पार्टी कर रहे हैं. जब लौटेंगे, तब पार्टी को भभ्भड़ का नया मसाला देंगे. तीन तिलंगे चुनकर.

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#1. मीरा सान्याल


मीरा सान्याल
मीरा सान्याल

एक्स बैंकर. रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड की मुखिया रहीं. पिता जी वाइस एडमिरल रहे. खूब प्रतिष्ठित फौजी. मीरा एनजीओ में खूब सक्रिय हैं. 2014 में साउथ मुंबई की लोकसभा सीट से चुनाव लड़ीं और हारीं. 'आप' की नेशनल एग्जिक्यूटिव की मेंबर हैं. मगर इसकी दिल्ली वाली सियासत में न तो दखल रखती हैं और न ही दिलचस्पी दिखाई है पिछले तीन सालों में.

एक बात और- 2014 मीरा का पहला चुनाव नहीं था. बैंक की नौकरी में रहते हुए भी वह 2009 में साउथ मुंबई की सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ी थीं. उन्होंने मुरली देवड़ा के बेटे मिलिंद देवड़ा को चुनौती दी थी और 10 हजार से ज्यादा वोट पाए थे.

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#2. इमरान प्रतापगढ़ी


इमरान प्रतापगढ़ी
इमरान प्रतापगढ़ी

उर्दू के कुमार विश्वास. हालांकि, इमरान इस परिचय को पसंद नहीं करते. असली नाम मोहम्मद इमरान खान. रहने वाले यूपी के प्रतापगढ़ जिले के हैं, सो वही तखल्लुस में आ जुड़ा. जैसे कुमार विश्वास शुरुआती दौर में कैंपस में पॉपुलर हुए, फिर सोशल मीडिया ने उन्हें लोकप्रिय बनाया, वैसा ही ग्राफ इमरान का बन रहा है.

कुमार की तरह इमरान ने भी हिंदी साहित्य की पढ़ाई की है. उनकी दोनों भाषाओं में अच्छी पकड़ है और देश-विदेश के मुशायरों में खूब धमक है. कपिल मिश्रा के ट्वीट के बाद उनके नाम पर खूब चर्चा छिड़ गई. पर ज़्यादातर लोग इसे भी सोशल मीडिया का एक सुरगा भर मानते हैं.

एक बात और- मर्द-ए-मुजाहिद, अकबरुद्दीन ओवैसी के लिए शेर पढ़ते हुए ये कहते थे इमरान. बाद में कांग्रेस के खेमे में चले गए और ओवैसी की जोरदार मुख़ालफत करने लगे.

#3. कुमार विश्वास


अरविंद केजरीवाल के साथ कुमार विश्वास
अरविंद केजरीवाल के साथ कुमार विश्वास

पिलखुवा के लाल. 47 साल के हो गए हैं. 47 में देश आजाद हुआ था. क्या अब कुमार भी 'आप' से आजाद होंगे. नाराज मत होइए, कुमार विश्वास यूं ही तुक बनाते हैं. वही इकलौते बचे हैं 'आप' और उसकी नियंता संस्था PAC में, जो अरविंद केजरीवाल को अरविंद कहते हैं और मनीष सिसोदिया को मनीष. 'जी' का भी लोड नहीं. काहे? क्योंकि मनीष बकौल विश्वास, 'बचपन का यार है'.

यार और प्यार अपनी जगह, कुमार को 'आप' में खुड्डेलाइन कर दिया गया है. वह ट्विटर पर लिखते हैं, 'मैं अभिमन्यु'. औऱ लिखते हैं, 'पहले देश, फिर दल, फिर व्यक्ति'. इन सबसे सहानुभूति और रिट्वीट मिलते हैं, अरविंद केजरीवाल का आशीर्वाद नहीं. और उसके बिना राज्यसभा नहीं.

कई कहते हैं कि केजरीवाल अपनी पार्टी में किसी भी और भीड़-खींचक को तभी तक झेलेंगे, जब तक वह उनके झंडे तले रहे. वरना सिपहसालार निपटा देंगे. कभी अमानतुल्ला खान, कभी दिलीप पांडे बयान बाण मार छलनी किए रहते हैं कुमार को. अब उनकी गति प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव होने की आ गई है, ऐसा भी सुधीजन मानते हैं.


अमानतुल्लाह खान
अमानतुल्लाह खान

एक बात और- कुमार विश्वास बीजेपी को वोट देते हैं. ये बात हम नहीं कह रहे. उन्होंने कही थी. एक जलसे में वह बोले थे, 'राजनाथ सिंह को सांसद बनाने में एक वोट मेरा भी है और यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं'. फिर वह आम आदमी पार्टी में आ गए और शाज़िया इल्मी उम्मीद करती हैं कि 2014 में उन्हें वह वोट मिला होगा.

#4. अरुण शौरी


अरुण शौरी
अरुण शौरी

76 साल के धुरंधर. जालंधर की पैदाइश. दिल्ली और विदेश की पढ़ाई. वर्ल्ड बैंक की नौकरी करते थे. तभी इंडियन एक्सप्रेस में लिखना शुरू किया. फिर इसी के संपादक हो गए. निर्भीक पत्रकारिता की. कई मुख्यमंत्री और मंत्री निपटे उनके दौर में. रेमन मैगसेसे अवॉर्ड पाया संपादक बनने के तीन साल के अंदर. साल था 1982.

एनडीए के दौर में खुलकर सियासत में आए. यूपी से दो बार बीजेपी ने राज्यसभा भेजा. 1998 से 2010 तक. विनिवेश मंत्री के तौर पर अटल सरकार में शानदार काम किया. 2009 में आडवाणी के नेतृत्व में एनडीए हारा, तो सवाल उठाए. मोदी का शुरुआती दौर में स्वागत किया, मगर अब उनकी सरकार को यूपीए प्लस काऊ कहते हैं. 'आप' के डिजिटल कमांडर अंकित लाल की किताब के विमोचन पर अरविंद केजरीवाल के साथ मंच शेयर किया. उसके बाद ही उनको 'आप' की तरफ से राज्यसभा भेजने की बात शुरू हो गई.

एक बात और- शौरी ने अपने दो टर्म की पूरी सांसद निधि IIT कानपुर को दे दी थी. पहले टर्म में इस पैसे से बायो साइंस के डिपार्टमेंट बने. दूसरे टर्म से एनवायरनमेंट साइंस के.

#5. यशवंत सिन्हा


यशवंत सिन्हा
यशवंत सिन्हा

पटना यूनिवर्सिटी से 1958 में पॉलटिकल साइंस में एमए किया, फिर दो साल वही सब्जेक्ट वहीं पढ़ाया. IAS बने. बिहार, दिल्ली और विदेश रहे. रिटायर होने के पहले ही इस्तीफा दे दिया. चंद्रशेखर के खास थे, सो जनता पार्टी में आ गए. 1988 में राज्यसभा सांसद बने और 1990 में चंद्रशेखर की सरकार में वित्त मंत्री. कुछ बरस बाद बीजेपी में आ गए. अटल ने उन्हें 1998 से 2002 तक वित्त मंत्री रखा. संघ उन्हें हटाने पर अड़ा, तो विदेश महकमा दे दिया. हजारीबाग को भी पिया बिदेसिया लगे और 2004 में चुनाव हरा दिया. 2014 में बेटे के लिए सीट छोड़ी. बेटा जीता, मंत्री बना, मगर बाप बागी हो गया. अरुण शौरी की लीग में आ गया.

'आप' को आर्थिक मामलों का जानकार चाहिए. रघुराम नहीं, तो शौरी सही. शौरी नहीं, तो यशवंत सही. लेट्स सी. हालांकि, उम्मीद कम है.

एक बात और- यशवंत सिन्हा ने बजट से जुड़ी एक फालतू परिपाटी खत्म की थी. पहले बजट हमेशा शाम के 5 बजे पेश होता था. क्यों, क्योंकि आजादी के पहले बजट ब्रिटेन की सहूलियत के हिसाब से पेश किया जाता था. ब्रिटिश पार्लियामेंट में उस वक्त सुबह के 11.30 बज रहे होते थे. सिन्हा ने 53 साल पुरानी रवायत को खत्म किया और सुबह बजट पेश किया.

#6. आशुतोष


आशुतोष
आशुतोष

पैदाइश या मार्क्सशीट का नाम, आशुतोष गुप्ता. जाति-विरोधी सो गुप्ता त्याग दिया. केजरीवाल के खास. राजनीतिक आका इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में थे और आशुतोष के पापा भी. ये जबरदस्ती का कनेक्शन है. असल मामला ये है कि आशुतोष ने JNU से पढ़ाई की. फिर आज तक में आ गए. उसके बाद तरक्की हुई और IBN 7 के मैनेजिंग एडिटर हो गए.

इसी दौरान अन्ना आंदोलन शुरू हुआ. आशुतोष ने जोरदारी से कवरेज की. फिर किताब भी लिख डाली अन्ना क्रांति के नाम से. फिर जनवरी 2014 में 'आप' में शामिल हो गए. खूब इल्ज़ाम लगे कि संपादक रहते हुए निष्पक्ष कैसे रहे होंगे. आशुतोष को फर्क नहीं पड़ा. कुछ महीने बाद चांदनी चौक से लोकसभा के लिए मैदान में थे. हारे, मगर कपिल सिब्बल को तीसरे नंबर पर धकेल दिया.

उसके बाद लगातार केजरीवाल के लिए निष्ठावान रहे. उनके फैसलों पर उंगली नहीं उठाई, संगठन के लिए काम किया और अब इनाम की उम्मीद कर रहे हैं.

एक बात और- शुरुआती टीवी दौर में आशुतोष की एक पहचान कांशीराम से तमाचा खाने वाले पत्रकार की भी रही. वह आज तक में थे और कांशीराम के आवास पहुंचे थे. तभी नेता और पत्रकार के बीच ये टकराव हुआ. हालांकि, बाद में दोनों में सुलह हो गई.

#7. संजय सिंह


संजय सिंह
संजय सिंह

सुल्तानपुर के रहने वाले. कोई कहता है कि मकैनिकल इंजीनियरिंग की, कोई कहता है कि माइनिंग में डिप्लोमा किया. NGO सेक्टर के जरिए राजनीति बनाई. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के दौरान अन्ना हजारे से जुड़े. फिर वहां से अरविंद केजरीवाल की तरफ सरक लिए. कभी चुनाव नहीं लड़े और संगठन का काम करने के नाम पर बॉस के खास हो गए. कितने खास? PAC में हैं. पंजाब के प्रभारी रहे और अब सबसे पहला नाम उन्हीं का फाइनल हुआ बताया जा रहा है.

संजय हमेशा फुल टाइम राजनीति करना चाहते थे और यह उनके लिए बड़ी सफलता है. तमाम इल्ज़ाम एक तरफ, केजरीवाल का साथ एक तरफ. कभी सपा के सुल्तानपुर से विधायक रहे अनूप संडा के खास थे. संडा अब विधायक भी नहीं और उनका पूर्व चेला सांसदी की तैयारी में है.

एक बात और- दिल्ली के सुरगेबाज कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल से संजय सिंह को कुमार विश्वास ने मिलवाया था. मनोज तिवारी की गाड़ी में बिठाकर रामलीला मैदान ले गए थे संजय को अरविंद. आज देखिए वक्त का सितम.

#8. आतिशी मरलेना


आतिशी मरलेना
आतिशी मरलेना

मम्मी हिंदू कॉलेज में पढ़ाती थीं. बेटी भी अकैडमिक-एक्टिविस्ट होना चाहती थी. मगर ऑक्सफर्ड की पढ़ाई बीच में छोड़ आ गई. असल भारत में काम करने. आंध्र प्रदेश के ऋषि वैली स्कूल में अध्यापक बनीं और जीवनसाथी से भी मिलीं. शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करती रहीं. फिर समझ आया कि नीचे से कितना बदलाव करें, जब ऊपर पहाड़ जमा हो.

आम आदमी पार्टी से जुड़ीं. एंट्री हुई प्रशांत भूषण के जरिए. योगेंद्र यादव का संरक्षण हासिल हुआ. मगर जब इन्हीं दोनों की कट्टी हो गई केजरीवाल से, तो आतिशी का भी प्रवक्ता पद चला गया. मगर वह जुटी रहीं और फिर से केंद्र के करीब आ गईं. अब डिप्टी सीएम की अडवाइज़र हैं और दिल्ली के स्कूलों में अच्छा काम कर रही हैं.

एक बात और- आतिशी जब ऑक्सफर्ड में थीं, तब एंटी वॉर प्रोटेस्ट में शामिल हुईं. लाखों लोग लंदन में सड़कों पर उतरे. फिर भी इराक वॉर हुआ. उनका मन खिन्न हो गया और पीएचडी अधूरी छोड़ भारत लौट आईं.

#9. दिलीप पांडे


दिलीप पांडेय
दिलीप पांडे

हॉन्गकॉन्ग के IT एक्सपर्ट. अन्ना आंदोलन के दौरान सक्रिय हुए. लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली का कनवीनर बनाया गया. यानी 67-3 वाली जीत में उनका भी रोल रहा. जब अप्रैल 2017 में आप MCD हारी, तो नैतिक जिम्मेदारी ईटीसी हुई और दिलीप ने इस्तीफा दिया.

पार्टी प्रवक्ता अब भी हैं और PAC में भी हैं. केजरीवाल की शह पर दिग्गजों को दुरुस्त करते रहते हैं बयान देकर. मसलन, कुमार विश्वास पर इल्ज़ाम लगाया कि वह वसुंधरा सरकार के खिलाफ पर्याप्त आक्रामक नहीं हैं.

एक बात और- आंदोलन के दौरान अपनी पत्नी प्रियंका से मिले. आंदोलन और इश्क पर नॉवेल भी लिख मारा- दहलीज पर दिल.

#10. दुर्गेश पाठक


दुर्गेश पाठक
दुर्गेश पाठक

गोरखपुर के शिकोहरा गांव के रहने वाले. 40 एकड़ खेती वाले काश्तकार. बाबू जी का सपना कि बेटा IAS बने. बेटा दुर्गेश इलाहाबाद से इंग्लिश में MA कर दिल्ली आ गए. UPSC की तैयारी करने. फिर अन्ना आंदोलन, फिर अरविंद. शुरुआती दौर में ट्यूशन कर काम चलाया. कमरे का खर्चा बचाने के लिए पार्टी दफ्तर में रहे. पंजाब में पहला बड़ा रोल मिला. संगठन प्रभारी बना भेजे गए. सुच्चा सिंह छोटेपुर से भिड़ गए. अरविंद का पूरा हाथ और साथ रहा. संजय सिंह के भी खास हैं. इसीलिए 'आप' की टॉप बॉडी यानी PAC के सबसे यंग मेंबर हैं.

एक बात और- दुर्गेश चे ग्वेरा के भारी फैन हैं. हर जगह उनकी तस्वीर. मगर अरविंद केजरीवाल को चे ग्वेरा से ज़्यादा महान मानते हैं. बकौल दुर्गेश, अरविंद ने अहिंसक ढंग से क्रांति की इसलिए.

#11. नारायण गुप्ता


नवीन गुप्ता
नारायण गुप्ता

CA हैं. CA लोगों के नेता भी. इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया के वाइस चेयरमैन. कई किताबें भी लिखीं. अपने ही ट्रेड में. GST के बड़े जानकार माने जाते हैं एनडी गुप्ता. 68 साल के हैं. अरविंद केजरीवाल के साथ NGO परिवर्तन के वक्त से जुड़े हुए हैं. दो साल से AAP का खाता-बही देख रहे हैं. आर्थिक मामलों वाली लिस्ट में ये नया नाम उछला है, 3 जनवरी की मीटिंग से 24 घंटे पहले. खासी जोरदारी से.

#12. सुशील गुप्ता


सुशील गुप्ता
सुशील गुप्ता

दिल्ली छाप समाजसेवी. स्कूल-अस्पताल चलाते हैं. बिरादरी वाले संगठनों में भी सक्रिय हैं. इनका पूर्व कांग्रेसी हैं. कांग्रेस के टिकट पर चुनाव हार चुके हैं. दिल्ली में इनके करीब 10 चैरिटेबल हॉस्पिटल चलते हैं. कहा ये भी जा रहा है कि इन्हें 2013 में AAP ने मोतीनगर सीट से टिकट का ऑफर दिया था, जिसे इन्होंने मना कर दिया था. इनका नाम भी इधर 24 घंटे में ही आया. और आए ट्विटर पर पुराने फोटो. जिसमें वह 'केजरीवाल हिसाब दो' वाले बैनर में बतौर निवेदक दर्ज हैं.

#13. अरविंद केजरीवाल


अरविंद केजरीवाल
अरविंद केजरीवाल

दिल्ली की गप्प है, सुन लेनी चाहिए. अरविंद केजरीवाल दिल्ली सौंपें मनीष सिसोदिया को. खुद पहुंचें राज्यसभा में. नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ हमलावर हों और खुद को तीसरे मोर्चे के नेता के तौर पर स्थापित करें. मोर्चे को एक सिटिंग सीएम चाहिए. हिंदी पट्टी का. नीतीश कुमार तो एनडीए में चले गए. ममता दीदी को कौन सुनेगा और अखिलेश यादव एक्स हो गए.

एक बात और- राघव चड्ढा बुरा न मानें. दावेदार वह भी हो सकते थे, मगर राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए 30 साल का होना ज़रूरी है.




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