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डॉक्टर के क्लीनिक में मिलते हैं ये दस भांत के लोग

रहस्यमयी बीमारी से लेकर बीपी के मरीजों तक, दुखियारी मां समेत कौन-कौन मिलता है यहां.

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Symbolic image- reuters
ये साल का वो समय है जब एक तरफ मच्छर आपका खून नहीं छोड़ते. उनसे जो बच जाता है वो डॉक्टर चूस लेते हैं. मलेरिया से लेकर टायफाइड तक पॉजिटिव होते हैं. आदमी जिंदगी में पॉजिटिविटी चाहता है. पर इस तरह से भी नहीं. इलाज ये कि इलाज के लिए डॉक्टर के यहां भागिए. वहां भी गजब किस्म के लोग मिलते हैं. आगे जो आप पढने जा रहे हैं दरअसल इनको आपने कभी न कभी डॉक्टर के क्लिनिक में भुगता होगा. पढ़िए दस भांत के लोगों के बारे में जो क्लीनिक में मिलते ही मिलते हैं.
  • शो ऑफ वाले अंकल-आंटी

ये वो लोग होते हैं जो हमेशा महंगे-महंगे अस्पतालों के नाम लेते हुए बताते हैं कि हम तो हमेशा वहां जाते हैं. इनकी मानें तो इनकी नाक भी चूती है तो छिरिकने लीलावती या हिंदुजा जाते हैं. ये तो इस बार इमरजेंसी थी इसलिए यहां आ गए. इनको बीमार होना और महंगे अस्पतालों में जाना भी इतना अच्छा लगता है कि बस डॉक्टर के यहां अगल-बगल बैठों को महंगे अस्पताल में खींची हुई सेल्फी बस दिखाना रह जाता है. ये उस किस्म के लोगों में से हैं जिनके खानदान से कोई विदेश यात्रा करने जाए तो चौराहे पर होर्डिंग लगाकर एम्बैरेस करते हैं.
  • रहस्यमयी बीमारी वाले

इनको लगता है कि इनको कोई रहस्यमयी बीमारी हो गई है. इनका शुगर ठीक है. सांसें ठीक हैं. मलेरिया नहीं हुआ, वायरल नहीं हुआ होता. खून में थक्के नहीं बंधते. नाक नहीं फेफराती. मुंह से दुर्गन्ध नहीं आती. पेट नहीं गड़गड़ाता. गैस के गुल्थे नहीं फूलते. देह में चकत्ते नहीं बनते. लेकिन चक्कर आते हैं. इनके मुताबिक़ इसकी वजह कमजोरी नहीं है. इसकी वजह शायद दूसरे ग्रह के एलियन होते हैं जो कोई रहस्यमयी बीमारी सिर्फ इन्हें भेज कर मानवजाति के खिलाफ कोई बड़ा षड्यंत्र कर रहे हैं.
  • जल्दी वाला बाबू

एक आदमी ऐसा होता है जिसे बहुत जल्दी होती है. ये आपसे बार-बार पूछेगा कि आपका नंबर कब आएगा. थोड़ी देर बात और कीजिए तो ये आपसे आपके पहले जाने की परमीशन भी मांग लेगा. ये बीच-बीच में कम्पाउंडर से भी पूछता रहेगा कि इसको पहले नहीं जाने दिया जा सकता. इसको देख लगता है अगर इसको जल्दी जाने न दिया गया तो बीमारी के बजाय जल्दी से मर जाएगा.
  • डॉक्टर से बड़ा डॉक्टर

आपको एक आदमी पक्का ऐसा मिल जाएगा जो आस-पास वालों के रोग, लक्षण सब पूछ डालेगा. साथ ही उनको इलाज भी बता डालेगा. इसके खुद के अनुभव होते हैं. इसकी ताई की बहन को जो रोग हुआ होगा उसी के अकॉर्डिंग ये आपको इलाज बता डालेगा. ये आपको निमोनिया में हल्दी-शहद खिला सकता है. कांख के फोड़े में आपको नीम की पुल्टिस बंधवा सकता है. इसे देख समझ नहीं आता कि ये इलाज कराने आया है या डॉक्टर की दुकान बंद कराने.
  • बीपी का मरीज

ये आते ही बीमारी बाद में दिखाएगा, लक्षण बाद में बताएगा. थर्मामीटर बाद में छुआएगा. बीपी पहले ही टेस्ट करा लेना चाहता है. इसको जाने क्यों लगता कि इसका बीपी गिरा या चढ़ा है. बीपी की एक प्रयोगशाला खुद इसके घर में होती है. ऐसे लोगों को बीपी की पूरी शब्दावली रटी होती है. लो हुआ तो किस अनुपात में या चढ़ा तो किस अनुपात में. इसको सारी बीमारियों की जड़ बीपी लगता है. इसको लगता है अगर वक़्त रहते डॉक्टर ने दवाई देकर बीपी को कंट्रोल में नहीं किया तो इसके साथ बहुत बुरा हो जाएगा. फिर भले डॉक्टर कहता जाए कि आपका बीपी नहीं गैस चढ़ी है. ये भरोसा नहीं करते.
  • डॉक्टर का रिश्तेदार

ये बड़ा पुराना मरीज होता है. और यही चीज दूसरों को भी जतलाना चाहता है. वेटिंग रूम में बैठे-बैठे भी ये बात कई बार कहता है. जब डॉक्टर के पास पहुंचता है तो भाभी जी के हाल-चाल पूछ अपनापन दिखाता है. अगर बच्चों को साथ ले गया हो तो 'आपने ही तो चार साल पहले दवाई दी थी, उसके बाद आज ही बीमार पड़ा' टाइप बातें कहता है.
  • बीमार जिसे देख आप बीमार हो जाएं

ये बीमार कम होता है लेकिन इसकी शक्ल ज्यादा उतरी होती है. ये आपके बगल में बैठा हो तो आप भी बीमार फील करना शुरू कर देते हैं. अगर आप इससे बात करना शुरू करें तो आपको महसूस होगा आपकी जांघ के नीचे की नसें कुलमुलाने लगी हैं. आपको ठंडी सी लगने लगेगी.
  • सब याद रखने वाले 

इनको सब याद रहता है. एक हफ्ते पहले शाम को खाने में बैगन खाया था. तीन दिन पहले सुबह खीरा ज्यादा खा लिया था. 5 दिन पहले दोपहर को सेब खाना भूल गए थे. तीन बरस पहले दवाई के साढ़े आठ घंटे बाद नींबू खा लिया था. इनने अन्नप्राशन में क्या खाया था. इन्हें ये भी याद रहता है. ये दवाइयों के नाम भी ऐसे बताने लगते हैं मानो एमिनेम मंत्र जप रहा हो. ये जब दवाइयों के नाम लेना शुरू करते हैं तो मेडिकल स्टोर वाला भी बी. फार्मा की डिग्री इनके सुपुर्द कर दुकान छोड़ देता है.
  • दुखियारी मां 

दुनिया की हर मां की तरह इसका भी एक ही रोना होता है. बच्चा कुछ खाता ही नहीं, ये शिकायत उन्हें तब से शुरू हो जाती है जब बच्चे की खाने की उम्र भी नहीं होती. छह महीने के बच्चे से भी उन्हें यही शिकायत होती है. और छह साल वाले से भी और सोलह साल वाले से भी. डॉक्टर की चिंता भले ये हो कि लड़के के दांत मीठा खाकर कड़ाए जा रहे हैं. वजन इतना बढ़ रहा हो कि डॉक्टर हेल्थ के लिए चिंतित हों, ये कहेंगी यही कि लड़का न खाने के कारण बीमार है.
  • डूबकर टीवी देखने वाले 

भले वहां फोन पर चिल्ला-चिल्लाकर फोन पर बिजनेस मीटिंग करने वाले बैठे हों. जोर-जोर से जान-बूझकर खांसने वाले हों लेकिन सबसे अलग वो लोग होते हैं जो वेटिंग रूम में टीवी देखने लगते हैं. ये टीवी में पूरा डूब जाते हैं, जैसे ये जिंदगी में पहली बार टीवी देख रहे हों. और आखिरी भी. इनके बीमार होने का उद्देश्य ही यही था कि ये बीमार हों क्लिनिक आएं और टीवी देख सकें.

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