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महीनों पहले मुलायम को हटाने की भूमिका बना ली थी प्रो. रामगोपाल यादव ने

पार्टी से परिवार तक, कैसा भी बवाल हो, जीतता वही है, जिस खेमे में प्रोफेसर साहब खड़े होते हैं.

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फोटो - thelallantop

सपा में अखिलेश के  अलावा रामगोपाल हैं जिन्होेंने अपना धुर्रा गाड़ दिया है राजनीति में. अचानक से हर जगह यही हैं. अगर अखिलेश अकबर हैं तो रामगोपाल बैरम खान. पर कौन हैं रामगोपाल जिनका कद हल्क की तरह बढ़ता गया है?

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साल 2010. अगस्त का आखिरी सप्ताह. प्रोफेसर रामगोपाल यादव दिल्ली के एम्स हॉस्पिटल में बैठे फूट-फूटकर रो रहे थे. पत्नी फूलन देवी का देहांत हो गया था. ये विरला मौका था, जब रामगोपाल को रोते देखा गया. वो रोते नहीं हैं. भावुक भी नहीं होते. कड़क मिजाज इंसान हैं. परिवार से लेकर पार्टी के काम-काज में सबसे ज्यादा सक्रिय रहे, लेकिन कभी मंत्री पद नहीं लिया. मुलायम ने इनकी सलाह के बिना कोई फैसला नहीं लिया. इनकी आवाज पर ही अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनाए गए थे. कोई खुलकर विरोध भी नहीं कर पाया था. समाजवादी पार्टी का संविधान भी रामगोपाल ने ही लिखा है.

ये वो बातें हैं, जो समाजवादी पार्टी और यूपी सरकार में फिजिक्स के इस प्रोफेसर की हैसियत बयां करती हैं. जो अभी तक छुपी थी.

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भतीजे अखिलेश के पाले में खड़े होने की वजह से रामगोपाल पिछले तीन महीने में पार्टी से तीन बार निलंबित हो चुके हैं. हालांकि, वो हर बार वापसी करने में कामयाब रहे. लेकिन ये जानना वाकई रोचक है कि 1 जनवरी, 2017 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी में जो हाई-वोल्टेज ड्रामा हुआ, प्रोफेसर साहब ने उसकी भूमिका कैसे रची.

सरकार के अलावा पार्टी में भी अखिलेश को सर्वेसर्वा बनाने की कवायद तभी शुरू हो गई थी, जब अखिलेश ने शिवपाल के नजदीकी दीपक सिंघल को यूपी के चीफ सेक्रटरी पद से हटा दिया था. तब अखिलेश ने दो मंत्रियों को भी कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया था. बड़ा हल्ला हुआ. मुलायम नाराज भी हुए. लेकिन, रामगोपाल अखिलेश के समर्थन में खड़े नजर आए. कहा कि ये सीएम के विशेषाधिकार के तहत आता है, जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता. यहीं से समीकरण बदलने शुरू हुए. रामगोपाल एक्शन मोड में आ चुके थे.

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अपने परिवार की भसड़ के पीछे अखिलेश जिस तरह खुलेआम अमर सिंह को लताड़ते हैं, वही रुख रामगोपाल का भी रहा. उन्होंने पूरे बवाल के लिए खुलकर अमर सिंह को दोष दिया. वो अखिलेश के लिए लॉयल भी हैं और चाणक्य भी. अखिलेश के लिए उन्होंने पार्टी के कई 'पुराने किले' ध्वस्त किए हैं. उनके आगे एकमात्र चुनौती सिर्फ शिवपाल यादव ही हैं, जो जमीन राजनीति के मामले में उनसे कोसों आगे हैं.

तख्तापलट की बहुत पहले से हो रही थी प्लानिंग

एक जनवरी को हुए समाजवादी पार्टी के कन्वेंशन और दूसरे कई इवेंट रामगोपाल ने बड़े परफेक्शन के साथ प्लान किए थे. 'ग्रैंड संडे' को हुए हाईवोल्टेज ड्रामे से पहले रामगोपाल कई महीनों से लीगल एक्सपर्ट्स और चुनाव आयोग के संपर्क में थे. मीटिंग कर रहे थे. रामगोपाल ने इस बात की पूरी प्लानिंग कर रखी थी कि अगर पार्टी में बंटवारा अनिवार्य हो गया, तब भी अखिलेश को किसी तरह की परेशानी न आए. 4 आज मुलायम सिंह यादव सपा के इस कन्वेंशन को असंवैधानिक बता रहे हैं. उनकी इस बात पर रामगोपाल बड़े रूखे और दृढ स्वर में कहते हैं, 'अरे उनको पता ही क्या है पार्टी संविधान के बारे में.' अब जाहिर सी बात है कि जिसने संविधान लिखा है, उससे ज्यादा संविधान के बारे में किसे पता हो सकता है. सपा का संविधान कहता है कि अगर पार्टी के 40% निर्वाचित प्रतिनिधि चाहें, तो पार्टी का जनरल सेक्रटरी ऐसे सत्र बुला सकता है और उसमें पार्टी से जुड़े फैसले हो सकते हैं. रविवार को हुए इस कन्वेंशन की अध्यक्षता किरनमय नंदा ने की, जो पार्टी के उपाध्यक्ष हैं, लेकिन मुलायम ने खुद को अध्यक्ष मानते हुए उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया है. पार्टी संविधान कहता है कि इस तरह के कन्वेंशन में पार्टी अध्यक्ष की गैर-मौजूदगी में अगर उपाध्यक्ष उपस्थित रहता है, तो सब कुछ संवैधानिक है. इसी आधार पर मुलायम को मार्गदर्शक बनाकर अखिलेश को पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया है.

अपने काम में परफेक्शन

1 जनवरी, 2017 को समाजवादी पार्टी के आपात अधिवेशन में कार्यकर्ताओं के बीच रामगोपाल सिर्फ 20 मिनट बोले, लेकिन इन 20 मिनट में ही उन्होंने मुलायम की जगह अखिलेश को राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ-साथ प्रदेश अध्यक्ष और मुलायम के सगे भाई शिवपाल को 'हटाने' के प्रस्ताव को पारित करवा लिया.

सालों पहले ऑस्ट्रेलिया से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके लौटने के बाद अखिलेश यादव ऑटोमोबाइल बिजनेस करना चाहते थे, लेकिन ये रामगोपाल ही थे, जो उन्हें राजनीति में लाए. फिरोजाबाद की लोकसभा सीट से डिंपल यादव के चुनाव हारने के बाद रामगोपाल को बड़ा झटका लगा था. उन्होंने ये सीट जीतने की ठान ली थी और उनके बेटे अक्षय की उम्मीदवारी इसी का नतीजा थी.

रामगोपाल की उपलब्धि

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इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही कि कहीं भी मामला हिंसक होने की नौबत नहीं आई. यूपी में सपा से जुड़ी इतनी बड़ी गतिविधि शांति से होना बड़ी बात है. शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर नरेश उत्तम को अध्यक्ष बनाना और उनका ऑफिस जाकर शिवपाल समर्थकों के बीच से कमरे के बाहर अपनी नेम प्लेट लगाना बड़ी घटना है, लेकिन गुंडई मिजाज वाले इस काम को इतनी चालाकी से अंजाम दिया गया कि कहीं कोई कॉन्फ्लिक्ट नहीं हुआ.

शक्ति-प्रदर्शन को लेकर रणनीति बहुत ही करीने से बनाई गई थी. मुलायम ने जिस दिन विधायकों की बैठक बुलाई, उसी दिन अखिलेश ने भी उनके घर से महज 200 मीटर की दूरी पर अपने समर्थकों, नेताओं और विधायकों को बुलाया. उनका मजमा मुलायम गुट से कहीं बड़ा था और एक झटके में अखिलेश के जीतने की लहर बन गई. मीडिया में साफ दिखा कि अखिलेश के पास बड़ा समर्थन है और मुलायम को पीछे हटना पड़ा. इस सबके पीछे अखिलेश से ज्यादा रामगोपाल की रणनीति ने काम किया.

https://www.youtube.com/watch?v=AJCmImuMRM8

कांग्रेस की याद दिलाता है रामगोपाल का दांव

अखिलेश और रामगोपाल की जोड़ी बहुत पहले से ही राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगे हुए थे. उनकी इस प्लानिंग को 1960 की उस घटना से भी जोड़कर देखा जा सकता है, जब इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में सिंडिकेट बनाम इंडिकेट की लड़ाई को बढ़ावा दिया था. उस समय पार्टी के विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन की मांग की गई थी और फिर सार्वजनिक तौर पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, जो पार्टी में स्वीकार्य नहीं थे. इसके बाद मनपसंद नेता का चुनाव करके उसे मन-मुताबिक काम करने की आजादी दी गई. अभी सपा में अखिलेश के पक्ष में भी ऐसा ही हो रहा है.

https://www.youtube.com/watch?v=pmkfZaOFtaU

सरकार का कितना सपोर्ट करते हैं रामगोपाल

5 अगस्त, 2013. नोएडा की SDM दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच खींचतान बहुत बढ़ गई थी. तब समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सांसद प्रो. रामगोपाल यादव मीडिया के सामने आए और बोले, 'केंद्र सरकार चाहे, तो उत्तर प्रदेश से सारे IAS और IPS अधिकारी वापस बुला ले. अखिलेश यादव राज्य के PCS से ही काम चला लेंगे.' रामगोपाल इस हद तक अखिलेश और अखिलेश सरकार के पक्ष में रहते हैं.

यादव परिवार का सबसे पढ़ा-लिखा आदमी: रामगोपाल

प्रो. रामगोपाल अपने परिवार के सबसे पढ़े-लिखे सदस्य हैं. मुलायम सिंह यादव प्राइमरी टीचर रहे, जबकि शिवपाल ने स्कूल में क्लर्क का काम किया, लेकिन रामगोपाल आगरा से पीएचडी करके प्रोफेसर बने. हालांकि, राजनीति को लेकर उनमें बहुत अनिच्छा थी. वो खुद बताते हैं, 'मैं राजनीति में नहीं आना चाहता था. पेशे से प्राध्यापक था, तो एक दिन मुलायम आए और बोले कि कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा है, तुम इटावा के बसरेहर से ब्लॉक प्रमुख चुनाव के लिए नामांकन कर आओ. उसे जीतने के बाद फिर जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हुआ और तब तक मैं सक्रिय राजनीति में पहुंच चुका था.'

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रामगोपाल की छवि हमेशा बिना जनाधार वाले नेता की रही है, लेकिन मुलायम सिंह कोई भी बड़ा फैसला लेते समय उनकी राय जरूर लेते थे. कम से अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने तक तो ऐसा ही हुआ. हालांकि, अखिलेश के मुख्यमंत्री बनते समय ही रामगोपाल ने अपना पक्ष चुन लिया था. तब शिवपाल ने मुलायम खेमा चुना था. असल में दोनों नेताओं के ये फैसले एक दांव थे और नतीजा आज सबके सामने है.

दौर हमेशा कायम रहता है

समाजवादी पार्टी में बेनी प्रसाद वर्मा, आजम खान और अमर सिंह जैसे कई लोग हैं, जिनके दौर आते-जाते रहते हैं. कभी इनके नाम का बड़ा हल्ला होता है, तो कभी ये नेपथ्य में चले जाते हैं. लेकिन, रामगोपाल का दौर हमेशा बरकरार रहता है. पार्टी के अंदरखाने एक कहावत भी चलती है कि कैसा भी बवाल हो, जीतता वही है, जिस खेमे में प्रोफेसर साहब खड़े होते हैं. यादव परिवार के बच्चे कहां पढ़ेंगे, इसका फैसला भी रामगोपाल ही करते हैं. पार्टी के मौजूदा उपाध्यक्ष किरनमय नंदा के चेले रहे अमर सिंह भी जब 2010 में पार्टी से दूर हो गए थे, तो मुलायम ने 'दिल्ली संभालने' रामगोपाल को ही भेजा था.

काम करने का तरीका

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नाश्ते में दलिया और फल. दोपहर में धुली मूंग की दाल. दिन में तीन बार बिना चीनी की चाय. ऐसी दिनचर्या वाले रामगोपाल 'सादा जीवन' जीने वाले दिखते हैं. समय के पाबंद हैं. सुबह जल्दी उठते हैं और सबसे पहले 'प्रार्थना पत्र' और 'सिफारिशी चिट्ठियां' निपटाते हैं. एक पत्रकार ने BBC को अपना किस्सा बताया था कि उसने चार बार रामगोपाल से मिलने का समय मांगा और चारों बार उसे सुबह साढ़े पांच से सात बजे के बीच का वक्त मिला. लंबी फाइलें देखकर खीझ उठते हैं. संकोच में अगर आप उनसे अपनी बात नहीं कह पाए, तो उनका वक्त जाया मत कीजिए. दूसरे दिन आइए.

पार्टी और परिवार, दोनों से लग रहे गंभीर आरोप

शिवपाल यादव आरोप लगाते हैं कि सपा को कमजोर करने के लिए रामगोपाल ने बीजेपी से हाथ मिला लिया है और बीजेपी के इशारे पर ही वो पार्टी और परिवार का माहौल बिगाड़ रहे हैं, अखिलेश का करियर बर्बाद कर रहे हैं. अपने अखिलेश-प्रेम के लिए फेमस रामगोपाल पर गंभीर आरोप हैं. कहा जा रहा है कि रामगोपाल और उनके परिवार के खिलाफ CBI जांच रही है. करोड़ों के घोटाले के मामले में, जो यादव सिंह से जुड़ा हुआ है. रामगोपाल के खिलाफ CBI जांच इन दिनों धीमी हो गई है. ऐसे में शक जताया जा रहा है कि रामगोपाल-बीजेपी के बीच 'डील' हो गई है.

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बचपन में शिवपाल यादव के कंधे पर खेलने वाले अखिलेश आज एक-दूसरे को फूट आंख नहीं सुहा रहे हैं और उन्हें रामगोपाल से बड़ा कोई अपना हितैषी नजर नहीं आ रहा है. ऐसे में समाजवादी पार्टी और यूपी में अखिलेश सरकार का भविष्य देखना रोचक होगा.


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