
यूपी में हेट स्पीच का पहला नोटिस जहां पहुंचना था, पहुंच गया है
साक्षी महाराज हैं. और कौन हो सकता था?
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फोटो - thelallantop
जब बिटिया का ब्याह होता है तो घर में हर कोई ऐसा होता है जिसकी अपनी अपनी जिम्मेदारियां होती हैं. हर कोई अपने-अपने हिसाब से जिम्मेदारी उठा लेता है. जिसका जैसा मिजाज़ वैसा काम. लोगों को सोचना नहीं पड़ता कि इस काम के लिए किसके पास जाया जाए. मालूम होता है कि निमंत्रण की लिस्ट ताऊ बनायेंगे. उस कार्यक्षेत्र में कोई समस्या हो तो उनसे मिलो. मालूम है कि दारू वगैरह की व्यवस्था छोटे वाले चाचा जी करेंगे. शाम होते ही उनको मिस्ड कॉल मारने लग जाओ. जेब में एक मूंग दाल वाली नमकीन पूरे टाइम तैयार रखो. यूपी में भी बिटिया का ब्याह हो रहा है. चुनाव हैं. बिटिया के ब्याह से कम नहीं है. हाहाकार मचा हुआ है. भागा-दौड़ी हो रही है. लड़के के चाचा साइकिल मांग रहे हैं. दहेज़ में नहीं, चुनाव चिन्ह में. बात सपा की हो रही है. उधर पूरे प्रदेश में आचार संहिता लागू हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वोट मांगने के लिए आप जाति-धर्म को मुद्दा नहीं बना सकते. इससे जुड़ी कोई भी बातें नहीं की जा सकतीं. वहीं साक्षी महाराज ने आदतानुसार इसका उल्लंघन कर दिया है. उन्होंने 6 जनवरी को मेरठ में अपनी एक स्पीच के दौरान मुस्लिम परिवारों में 4 पत्नियों और 40 बच्चों के चलन की बात कही. इलेक्शन कमीशन ने तुरंत ऐक्शन लिया और साक्षी महाराज को नोटिस भेजा है. नोटिस में साफ़ कहा गया है कि उनका भाषण धर्म के बेस पर भेदभाव फैलाता है. उत्तर प्रदेश चुनाव में ये पहला नोटिस भेजा गया है. आचार संहिता लगी हुई है और प्रदेश से अब ऐसी चिट्ठियां आनी तय हैं. वैसे बोहनी कहां से होनी थी, और ये पहली चिट्ठी किस पते पर पहुंचनी थी, ये बहुत ही स्वाभाविक था. अगर इलेक्शन कमीशन बिना कबूतर को एड्रेस बताये ये चिट्ठी उसे पकड़ा देता तो भी कबूतर साक्षी महाराज के घर के छज्जे पर ही जाकर बैठता. किसी पते के बिना भी अगर ये चिट्ठी लेटर बॉक्स में डाली जाती तो डाकिया सीधे साक्षी महाराज के घर की ही घंटी बजाता. ये उतना ही स्वाभाविक है जितना सुबह सूरज का उगना. कहना डीएसपी भूरेलाल का, "ई तो साला होना ही था!" 

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