The Lallantop

राहुल गांधी ने रायबरेली से पर्चा तो भर दिया, लेकिन डगर आसान होगी?

समर्थक कह रहे हैं कि राहुल वायनाड से तो जीतेंगे ही; रायबरेली में भी परचम लहराएंगे. आलोचकों का कहना कि अमेठी के बाद अब कांग्रेस के हाथ से रायबरेली भी निकल जाएगा.

Advertisement
post-main-image
राहुल गांधी ने दो जगहों से पर्चा भरा है: वायनाड और राय बरेली. (तस्वीर - PTI)

राहुल गांधी ने अपना पर्चा भर दिया है. पिछले लोकसभा चुनाव में अमेठी हारने के बाद से कई दिनों से ये सस्पेंस बना हुआ था कि क्या कांग्रेस अपने गढ़ को वापस जीतने का जतन करेगी. बीच में ख़बरें चलीं कि राहुल अमेठी से लड़ेंगे और प्रियंका गांधी रायबरेली से. फिर ख़बरें आईं कि प्रियंका चुनाव नहीं लड़ेंगी और सोनिया गांधी के राज्यसभा के लिए चयनित होने के बाद, गांधी परिवार उन्हीं की सीट (रायबरेली) अपने साथ रखेगा. ये उड़ती हुई ख़बर सच में तब्दील हो गई. राहुल गांधी ने अपना नामांकन रायबरेली की सीट से भर दिया और पार्टी ने अमेठी से किशोरी लाल शर्मा को टिकट दे दिया है. इसके बाद समर्थकों ने कहा कि राहुल वायनाड से तो जीतेंगे ही; रायबरेली में भी परचम लहराएंगे, तो आलोचकों ने कहा कि अमेठी के बाद अब कांग्रेस के हाथ से रायबरेली भी निकल जाएगा. इन दो दावों के बीच, सत्य कहां है?

Advertisement
कांग्रेस का 'गढ़'

उत्तर प्रदेश में रायबरेली संसदीय क्षेत्र चुनावों के इतिहास में सबसे ऐतिहासिक सीटों में से एक रहा है और इसके ‘कांग्रेस का गढ़’ कहलाने की पर्याप्त वजहें हैं. साल 1952 से यहां चुनाव हो रहे हैं और तीन उपचुनाव मिला दें, तो यहां कुल 20 बार चुनाव हुए हैं. इसमें से 17 कांग्रेस जीती है. केवल तीन बार हारी है. '77 में इंदिरा गांधी एक ऐतिहासिक मुक़ाबले में हार गई थीं. फिर '96 में विक्रम कौल और '98 में दीपा कौल हारे थे.

कांग्रेस से ज़्यादा इसे 'गांधी परिवार का गढ़' कहा जाना चाहिए. इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, फ़िरोज़ गांधी यहीं से चुनकर संसद गए. पूर्व-प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क़रीब एक दशक तक इसी सीट से चुनी गईं. मगर उनसे भी सफल नेता हुईं उनकी बहू और पूर्व कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी. उन्होंने एक के बाद एक इस सीट से पिछले पांच लोकसभा चुनाव जीते हैं.

Advertisement
अमेठी क्यों छोड़ा?

एक तरफ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी पर तंज़ कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल की एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री ने कह दिया,

मैंने संसद में पहले ही कहा था कि उनकी (कांग्रेस) सबसे बड़ी नेता चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं करेंगी. वो राजस्थान भाग गईं और राज्यसभा में आ गईं. मैंने पहले ही कहा था कि शहज़ादा वायनाड में हारने वाले हैं, जैसे ही वायनाड में मतदान पूरा हो जाएगा, दूसरी सीट की तलाश शुरू कर देंगे. वो अमेठी से इतने डरे हुए हैं कि रायबरेली की ओर भाग रहे हैं.

उधर, कांग्रेस के संचार महासचिव जयराम रमेश ने रायबरेली के चयन पर ढेरों कारण गिना दिए. राहुल गांधी को ‘मास्टरमाइंड’ कहते हुए लिखा,

Advertisement

- रायबरेली केवल सोनिया जी की नहीं, बल्कि ख़ुद इंदिरा गांधी की भी सीट रही है. ये कोई विरासत नहीं है; एक ज़िम्मेदारी है.

- प्रियंका देश भर में ज़ोर-शोर से प्रचार कर रही हैं और अकेले ही नरेंद्र मोदी के झूठ का पर्दा फ़ाश कर रही हैं. इसलिए उन्हें सिर्फ़ एक निर्वाचन क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए.

- स्मृति ईरानी की इकलौती पहचान यही है कि वो राहुल गांधी के ख़िलाफ़ अमेठी से चुनाव लड़ती हैं. अब उनकी प्रासंगिकता ख़त्म. अब उन्हें बेमानी बयानबाज़ी के बजाय स्थानीय विकास से जुड़े सवालों का जवाब देना होगा.

बीते 25 सालों में ये पहला मौक़ा है जब गांधी परिवार का कोई सदस्य अमेठी से नहीं लड़ रहा है. इसीलिए इस मौक़े पर वजह खोजी जानी चाहिए, कि राहुल ने अपनी पुरानी सीट अमेठी के ऊपर रायबरेली को क्यों चुना?

दी लल्लनटॉप के साप्ताहिक पॉलिटिकल शो 'नेतानगरी' में कांग्रेस को लंबे समय से कवर कर रहे पत्रकार आदेश रावल ने बताया था कि कांग्रेस नहीं चाहती कि प्रियंका और राहुल दोनों चुनाव लड़ें, क्योंकि सोनिया पहले से ही राज्यसभा सदस्य हैं. अगर तीनों गांधी संसद में होंगे, तो कांग्रेस पर लगने वाले परिवारवाद के आरोपों को और हवा मिल जाएगी. पार्टी के लिहाज़ से संदेश अच्छा नहीं जाएगा और ख़ुद को डिफ़ेंड करना मुश्किल हो जाएगा.

ये भी पढ़ें - स्मृति ईरानी को टक्कर देने वाले केएल शर्मा की पूरी कहानी

पार्टी में मौजूद सूत्रों के हवाले से एक और वजह सामने आई है. 2019 चुनाव की हार के बाद अमेठी गांधी परिवार की सीट नहीं रही. अगर राहुल वायनाड और रायबरेली दोनों से जीत जाते हैं, तो रायबरेली के साथ और लंबे समय से संबंध का हवाला देते हुए वायनाड छोड़ना आसान होगा.

एक और तीसरी दलील भी है, जो कांग्रेस नेताओं के बयान से ही निकाली जा रही है. सुप्रिया श्रीनेत ने अपने पोस्ट में लिखा है, "...प्रियंका जी तो कोई भी उपचुनाव लड़ कर सदन पहुंच जाएंगी." दो और दो जोड़ चार करने वालों ने यहीं से संकेत निकाला, कि अगर राहुल दोनों सीट जीत जाएं तो मुमकिन है वायनाड को न छोड़ें, क्योंकि कांग्रेस का ध्यान 2026 के केरल विधानसभा चुनाव पर भी है. माहौल भांपते हुए रायबरेली से तो प्रियंका को भी लड़ाया जा सकता है.

वैसे तो ये बहुत दूर की कौड़ी मालूम पड़ती है, मगर इससे जुड़ा एक ट्रिविया है. साल 1980 में इंदिरा गांधी ने भी दो सीटों से चुनाव लड़ा था. रायबरेली और अविभाजित आंध्र प्रदेश की मेडक. दोनों जीतने के बावजूद उन्होंने मेडक सीट नहीं छोड़ी. रायबरेली छोड़ी, जिस पर गांधी परिवार के क़रीबी अरुण नेहरु ने चुनाव लड़ा था.

'गढ़' बचा पाएंगे राहुल?

राहुल के ख़िलाफ़ भाजपा ने दिनेश प्रताप सिंह को मैदान में उतारा है. तीन बार के विधायक और पूर्व-कांग्रेसी. तीन में से दो बार (2010 और '16) में तो कांग्रेस के टिकट पर ही चुनाव लड़े थे. बतौर ब्लॉक प्रमुख अपना राजनीतिक करियर शुरू किया था, सो इलाक़े में ठीक-ठाक पकड़ है. आज की तारीख़ में योगी आदित्यनाथ सरकार में स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री हैं. वहीं, बहुजन समाज पार्टी ने ठाकुर प्रसाद यादव को टिकट दिया है. वो दो बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, हार चुके हैं. लोकसभा में ये उनका पहला प्रयास है.

ये भी पढ़ें - वायनाड में किस स्थिति में हैं राहुल गांधी? 

रायबरेली में कांग्रेस कार्यकर्ता किसे चाहते थे? जनता कांग्रेस के इस फ़ैसले को कैसे रिसीव कर रही है? इन सवालों के जवाब के लिए हमने बात की रायबरेली के पत्रकार शैलेंद्र प्रताप सिंह से. उन्होंने हमें बताया कि जब सोनिया गांधी का ये फ़ैसला आया था कि वो रायबरेली से नहीं लड़ेंगी, तो लोगों में कुछ निराशा आई थी. मगर अब जब से 'भईया' ने चुनाव लड़ने की घोषणा की है, जोश हाई है. उनके मुताबिक जनता ने इस फ़ैसले के ‘सहर्ष स्वीकारा है’ और फ़ैमिली लेगसी के चलते इस रेस में राहुल गांधी अव्वल लग रहे हैं.

रायबरेली और अमेठी छठवें चरण में हैं. 20 मई को यहां वोट पड़ने हैं. 4 जून को नतीजे आने हैं. तब ये दावे-प्रतिदावे स्पष्ट हो जाएंगे.

(ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे नवनीत के इनपुट्स के साथ लिखी गई है.)

वीडियो: राहुल गांधी के तंज पर PM मोदी ने क्या जवाब दिया?

Advertisement