
राहुल गांधी की आडवाणी के प्रति ये नई-नई सहानुभूति कुछ और नहीं सिर्फ वोट बटोरने की राजनीति है.
क्या बोला राहुल ने राहुल गांधी महाराष्ट्र के चंद्रपुर में थे. इस लोकसभा सीट में जनसभा को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने अपने घोषणा पत्र की बातें की. अपनी न्याय स्कीम की बातें की. भाजपा नेताओं को बंटवारा करने वाला बताया. लेकिन फिर खुद हिंदू-मुसलमान पर उतर आए. यहां तक रुक जाते तो भी ठीक था. लेकिन रुके नहीं. रुकते भी कैसे? बदज़ुबानी में एक दूसरे से कंपीटिशन जो चल रहा है. नीचे गिरने का कंपीटिशन. और राहुल जो कि प्रमुख विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष हैं, कैसे पीछे रहते? बोले -
''हिंदू धर्म में सबसे ज्यादा जरूरी होता है गुरु. और मोदी जी के गुरु कौन हैं? आडवाणी जी. शिष्य गुरु के सामने हाथ भी नहीं जोड़ता. स्टेज से उठाकर फेंक दिया गुरु को. जूता मार के आडवाणी जी को उतारा है स्टेज से. और फिर हिंदू धर्म की बात करते हैं. हिंदू धर्म में कहां लिखा है कि लोगों को मारना चाहिए. कहां लिखा है कि हिंसा करनी चाहिए. कहीं नहीं लिखा है.''राहुल का ये बयान इस बात पर तो मुहर लगा ही देता है कि देश में गटर लेवल की पॉलिटिक्स हो रही है. और इसमें कोई कम नहीं है. वे भी नहीं. उन्होंने हिंदू धर्म की श्रेष्ठता पर जोर दिया. क्या वे कहना चाह रहे हैं कि हिंदू धर्म के अलावा बाकी धर्म हिंसा की ही बात करते हैं? क्या दूसरे धर्मों में गुरु का सम्मान करना नहीं सिखाया जाता? क्या बाकी धर्म गुरु का अपमान करना सिखाते हैं? क्या उनकी पार्टी ने अपने नेताओं के साथ हमेशा आदर्श व्यवहार किया है? जिस बांटने की राजनीति का राहुल विरोध कर रहे हैं, वे खुद भी तो अब वही कर रहे हैं.
भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी को इस बार लोकसभा टिकट नहीं दिया है. आडवाणी भाजपा और जनसंघ के संस्थापक रहे हैं. यह पहली बार है जब भाजपा उन्हें चुनाव नहीं लड़ा रही है. भाजपा के इस फैसले के बाद से विपक्षी दलों में आडवाणी के प्रति जबरदस्त सहानुभूति उमड़ पड़ी है. विपक्षी नेता के प्रति सहानुभूति जताना ठीक है. राहुल गांधी भी यही कर रहे थे. आडवाणी के टिकट न मिलने को उनकी अनदेखी बता रहे थे. आडवाणी को किनारे किए जाने की बात से सियासी फायदा उठाना चाह रहे थे. लेकिन फायदा उठाने के चक्कर में ओछी बात कह गए.

मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के आरंभ से ही आडवाणी को किनारे कर दिया था, जिसका इस्तेमाल विपक्ष आज भी कर पा रहा है.
कांग्रेस को नरसिम्हा राव याद हैं? ये समस्या राहुल की ही नहीं है, अधिकतर नेताओं के साथ यही दिक्कत है. उनको समझ नहीं आता कि वो भले सलेक्टिव मैमोरी रखते हों, लेकिन लोगों को सब याद रहता है. जैसे, नरसिम्हा राव के साथ गांधी परिवार का बर्ताव. 23 दिसंबर, 2004 को नरसिम्हा राव गुजर गए. दिल्ली में ही उनकी मौत हुई. कांग्रेस में परंपरा रही है कि पार्टी अध्यक्ष का शव कांग्रेस मुख्यालय में सबके दर्शन के लिए रखा जाता है.

सोनिया गांधी के साथ नरसिम्हा राव.
मगर राव के साथ ये रस्म नहीं निभाई गई. उनका शव लेकर जा रहा जुलूस कांग्रेस हेडक्वॉर्टर के बाहर फुटपाथ पर रोका गया. कहते हैं कि सोनिया घर से निकलकर एक बार शव देखने भी नहीं आईं. रस्म निभाने की खातिर भी नहीं. सोनिया गांधी राव को पसंद नहीं करती थीं. अपने अंतिम दिनों में राव एकदम अलग-थलग कर दिए गए. राहुल को वो इतिहास भी याद रखना चाहिए. और उनके नेताओं को भी.
वीडियो देखें: AIIMS में आखिरी मुलाकात के दौरान नरसिम्हा राव और सोनिया गांधी के बीच क्या बात हुई!














