The Lallantop

'खुद को भगवान समझते हैं मुख्य चुनाव आयुक्त', महुआ मोइत्रा ने ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की असली वजह बताई

Mahua Moitra ने Gyanesh Kumar पर ‘घमंड’ होने का आरोप लगाते हुए कहा कि Chief Election Commissioner खुद को सबसे ऊपर समझते हैं. TMC सांसद मानती हैं कि CEC के खिलाफ लाया हुा विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव संसद में पास नहीं होगा. मगर उनका कहना है कि इसी बहाने सरकार को इस मुद्दे पर जवाब देना पड़ेगा. जिससे वो बचती आई है.

Advertisement
post-main-image
महुआ मोइत्रा ने चुनाव आयुक्त पर साधा निशाना

“ज्ञानेश कुमार सोच रहे हैं कि वो ब्रह्मा-विष्णु-महेश हो गए हैं. वो सोचते हैं कि कोई उन्हें छू भी नहीं सकता." भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोपों के इस तीखे तीर से वार किया है तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) ने. सिर्फ इतना ही नहीं में बोलते हुए महुआ ने पूरे के पूरे चुनाव आयोग को ही मोदी सरकार की कठपुतली करार दे दिया. 

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा की जुबान से जब भी कोई बात निकलती है तो सिर्फ ‘दूर’ नहीं बल्कि ‘बहुत दूर’ तलक जाती है. ऐसे में लल्लनटॉप ने जब महुआ से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने की वजह पूछ ली तो जाहिर है, बात ही बात में बहुत सारे मुद्दे तो उठने ही थे. महुआ ने जब सीईसी को घेरना शुरू किया तो आरोपों की झड़ी लगा दी.

महुआ ने ज्ञानेश कुमार पर ‘घमंड’ होने का आरोप लगाते हुए कहा कि सीईसी खुद को सबसे ऊपर समझते हैं.  2023 में जब सभी विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया था, उसी वक्त एक प्रस्ताव पारित करवा कर केंद्र सरकार ने ये सुनिश्चित कर दिया था कि चुनाव आयुक्त के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती. 

Advertisement

ममता ने ज्ञानेश कुमार के कथित निरंकुशता के लिए उसी प्रस्ताव को दोषी ठहराते हुए कहा,

“वो समझते हैं कि उन्हें कोई छू नहीं सकता और आज के कानून ऐसे हो गए हैं कि उन्हें सच में कोई छू नहीं सकता. अगर हम यह समझ लें कि मेरी कोई जवाबदेही नहीं है, तो हम जो चाहें कर सकते हैं.”

दरअसल महुआ के इल्जामों की ये कहानी सीधी-सादी नहीं है. इसमें महाभियोग का दांव है, चुनाव आयोग की भूमिका है, बंगाल की राजनीति है, और उससे भी आगे जाकर वोटर के अधिकार का सवाल है. चलिए इस पूरे मामले को तफसील से, परत-दर-परत समझते हैं.

Advertisement
महाभियोग का दांव: क्या है पूरा मामला?

सबसे पहले समझिए कि महाभियोग का मतलब क्या होता है. यह कोई रोजमर्रा की राजनीतिक चाल नहीं है. यह एक बेहद गंभीर संसदीय प्रक्रिया है, जिसका इस्तेमाल तब होता है जब किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आरोप हों.

महुआ मोइत्रा साफ कहती हैं:

 "यह पहली बार है कि किसी मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाया गया है. मैंने इसे नहीं लाया है, हमारी पार्टी को इसे लाने के लिए विवश होना पड़ा."

यहां वो जिम्मेदारी को व्यक्तिगत नहीं बल्कि पार्टी और विपक्ष के सामूहिक फैसले के रूप में पेश करती हैं. उनका दावा है कि इस प्रस्ताव को 193 सांसदों का समर्थन मिला, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों के सदस्य शामिल हैं.

इसका सीधा मतलब है कि यह सिर्फ TMC का मुद्दा नहीं, बल्कि व्यापक विपक्षी एकजुटता का संकेत है.

चुनाव आयोग: भरोसे की नींव या कठपुतली?

भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India) एक बेहद अहम संस्था है. संविधान ने इसे इसलिए बनाया ताकि चुनाव निष्पक्ष और स्वतंत्र हों.

महुआ इस पर एक बड़ा आरोप लगाती हैं:

 "हम पहली बार देख रहे हैं कि चुनाव आयोग एक संस्था के रूप में कार्यपालिका और सरकार की कठपुतली बन गया है."

यह आरोप नया नहीं है, लेकिन इस बार इसकी तीव्रता ज्यादा है क्योंकि इसे महाभियोग जैसे कदम से जोड़ा गया है.

वो इतिहास का हवाला देती हैं-पहले चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता, और खासकर पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन (T. N. Seshan) का जिक्र करते हुए बताती हैं कि कैसे इस पद की गरिमा कभी बहुत ऊंची मानी जाती थी.

‘घमंड’ और जवाबदेही का सवाल

महुआ का एक और तीखा आरोप है- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के व्यक्तिगत व्यवहार पर. महुआ के शब्दों में,

 "पहली बार किसी संवैधानिक प्राधिकरण को निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ ऐसा बर्ताव करते देखा गया है."

यहां मुद्दा सिर्फ नीति या प्रक्रिया का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है. उनका कहना है कि जब किसी संस्था को लगे कि उसके ऊपर कोई नियंत्रण नहीं है, तो वह मनमानी कर सकती है.

बंगाल का मामला: SIR और वोटर लिस्ट का विवाद

अब आते हैं उस मुद्दे पर जहां से असली विवाद खड़ा हुआ. पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट और SIR (Special Intensive Revision) , महुआ और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस इसे लेकर सवाल उठाती आई है.  

लल्लनटॉप को दिए गए इंटरव्यू में महुआ का दावा करती हैं कि,

  • बंगाल की SIR लिस्ट में 58 लाख नाम हटा दिए गए
  • जिन्हें हटाया गया, उन्हें मृत, डुप्लिकेट या स्थानांतरित करार दे दिया गया
  • फिर 7.06 करोड़ की ड्राफ्ट लिस्ट जारी हुई
  • ड्राफ्ट में से 1.36 करोड़ लोगों को "संदिग्ध मतदाता" बना दिया गया

इस आधार पर महुआ आरोप लगाती हैं कि,

"1.36 करोड़ मतदाताओं को, जिनका 2002 से मिलान हो चुका था, उन्हें मनमाने ढंग से संदिग्ध घोषित कर दिया गया."

अब यहां सवाल उठता है-क्या यह सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया है या इसके पीछे कोई राजनीतिक मंशा?

क्या सिर्फ बंगाल टारगेट?

महुआ का कहना है कि यह प्रक्रिया सिर्फ बंगाल में आक्रामक तरीके से लागू की गई. वो कहती हैं,

 "12 राज्यों में SIR हो रहे थे. ऐसा कहीं और नहीं हुआ... यह सब केवल बंगाल में हो रहा है."

अगर महुआ का ये दावा सही है, तो बात बेहद गंभीर है क्योंकि देश का संविधान कहता है कि चुनाव प्रक्रिया पूरे देश में एक समान होनी चाहिए.

‘सांप्रदायिक छंटनी’ का आरोप

लल्लनटॉप को दिए गए अपने इंटरव्यू में महुआ मोइत्रा एक और गंभीर आरोप लगाती हैं. उनका सबसे बड़ा और संवेदनशील आरोप यही है कि धर्म के आधार पर वोटर टारगेटिंग की जा रही है.

महुआ कहती हैं,

 "उनका चयन केवल धर्म के आधार पर किया गया था... 99.9% अल्पसंख्यक मतदाता थे."

यह आरोप सीधे-सीधे लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट करता है. अगर वोटर लिस्ट से नाम हटाने का आधार धर्म बनता है, तो यह चुनाव की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल है.

60 लाख मतदाता और अधर में लोकतंत्र

महुआ के मुताबिक SIR की गड़बड़ी के बाद करीब 60 लाख लोग न्यायिक प्रक्रिया में गए. लेकिन सिर्फ 10 लाख मामलों का ही निपटारा हुआ था कि तभी पश्चिम बंगाल के चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया. 

ऐसे में महुआ सवाल उठाती हैं कि,

 "बाकी 50 लाख का क्या होगा? क्या यह लोकतंत्र का तमाशा है?"

राजनीतिक विश्लेषक ये मानते हैं कि यह सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी है. अगर इतने बड़े पैमाने पर लोग वोट नहीं डाल पाए, तो चुनाव की वैधता पर असर पड़ेगा.

घुसपैठिया बनाम वोटर: असली कहानी क्या?

बंगाल की राजनीति में "घुसपैठिया" शब्द नया नहीं है. लेकिन महुआ इसे एक "नैरेटिव" बताती हैं. उनका दावा है कि SIR की गड़बड़ी को सही ठहराने के लिए कथित घुसपैठियों का नैरेटिव गढ़ा जा रहा है. 

महुआ कहती हैं,

“यह घुसपैठिए की कहानी बंगाल से शुरू हुई. पिछले 10 सालों में, गृह मंत्रालय ने राज्यसभा में कहा, पिछले 10 सालों में सिर्फ 3,300 भारतीय नागरिकों को बांग्लादेश वापस भेजा गया है। तो यह कहानी झूठी है.”

बिहार का उदाहरण देते हुए महुआ कहती हैं कि 

“उन्होंने बिहार में भी घुसपैठिए कहा, क्या आपको पता है? बिहार में घुसपैठिए किसे मिले? बिहार में 200 या 250 नेपाली-हिंदू महिलाएं सीमा पार करके आईं और बिहार के लोगों से शादी कर ली. इसके अलावा बिहार में कोई घुसपैठिया नहीं मिला.”

बांग्लादेश के आजादी की लड़ाई (Bangladesh Liberation War) का उदाहरण देते हुए महुआ कहती हैं कि असली प्रवासन 1971 के बाद हिंदुओं का हुआ. सिर्फ इतना ही नहीं महुआ कहती हैं कि जो लोग आए, उनमें बड़ी संख्या हिंदुओं की थी, खासकर मतुआ समुदाय के लोगों की.

मतुआ फैक्टर: राजनीति का नया समीकरण

मतुआ समुदाय बंगाल की राजनीति में बड़ा फैक्टर है. महुआ कहती हैं कि,

“32 लाख मतुआ लोग मैप ही नहीं किए गए, उनमें से 20 लाख का भविष्य अनिश्चित है.”

यह सीधे-सीधे चुनावी समीकरण को प्रभावित करता है.

महाभियोग: जीत नहीं, बहस का हथियार

अब सबसे दिलचस्प हिस्सा कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पास होगा या नहीं? महुआ खुद मानती हैं कि यह प्रस्ताव पास नहीं होगा. वो कहती हैं, 

 "हमें पता है कि हमारे पास बहुमत नहीं है. लेकिन बहस महत्वपूर्ण है."

महुआ यहां पर इंडिया गठबंधन (INDIA Alliance) की रणनीति समझाती हैं. उनका तर्क है कि संसद में ऐसे मुद्दे उठाने नहीं दिए जाते. मगर महाभियोग बहस का जरिया बनता है.

अब जब मुख्य चुनाव आयुक्त का मुद्दा सदन में उठेगा तो उनके व्यवहार पर चर्चा होकर रहेगी.

असली लड़ाई: संस्था बनाम सत्ता?

लल्लनटॉप को दिए गये महुआ मोइत्रा के पूरे इंटरव्यू का सार अगर एक लाइन में निकालें तो ये है कि लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि संस्थाओं की स्वतंत्रता की है.

महुआ का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अगर चुनाव आयोग जैसी संस्था पर भरोसा डगमगाता है, तो लोकतंत्र की पूरी इमारत हिल सकती है.

ये भी पढ़ें: संसद में विपक्ष से अलग तेवर दिखाती TMC, क्या दिल्ली में लिख रही है बंगाल चुनावों की स्क्रिप्ट?

सवाल अभी बाकी हैं

इस पूरे विवाद में कई सवाल हैं जिनके जवाब अभी साफ नहीं हैं, 

  • क्या वाकई वोटर लिस्ट में इतनी बड़ी गड़बड़ी हुई?
  • क्या यह सिर्फ प्रशासनिक गलती है या सुनियोजित रणनीति?
  • क्या महाभियोग सिर्फ राजनीतिक दबाव का हथियार है?

मगर एक बात तो तय है कि यह मामला जल्दी खत्म होने वाला नहीं है. और जैसा महुआ ने कहा,

 "अगर हम संसद में खड़े होकर कुछ कहते हैं, तो वे कुछ नहीं कहते... इसलिए महाभियोग ही एकमात्र रास्ता बचता है."

यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संकेत है कि बहस अभी शुरू हुई है, खत्म नहीं.

वीडियो: जमघट: महुआ मोइत्रा ने एप्सटीन कांड, ईरान-अमेरिका जंग पर क्या कहा?

Advertisement