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किराया आसमान पर, सीटें जमीन पर, मिडिल क्लास के लिए रेलवे का सफर सबसे बड़ी टेंशन

Indian Railways: होली बीत चुकी है और अब गर्मी की छुट्टियों (Summer Vacations) के लिए मारामारी शुरू हो गई है. रेलवे ने कई 'समर स्पेशल' ट्रेनों का ऐलान किया है, लेकिन क्या ये वाकई काफी हैं? या फिर वही पुरानी कहानी- तत्काल में हाथ खाली और प्रीमियम तत्काल के दाम हवाई जहाज जैसे?

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रेलवे का 'नया टाइमटेबल' और मिडिल क्लास की 'पुरानी वेटिंग'

अभी तो मार्च का महीना ही चल रहा है. सूरज ने अभी ठीक से अपनी तपिश दिखाना शुरू भी नहीं किया है. लेकिन अगर आप IRCTC की वेबसाइट या ऐप खोलकर मई या जून की किसी ट्रेन में टिकट ढूंढने निकलेंगे, तो आपको वहां 'गर्मी' का अहसास अभी से हो जाएगा. स्क्रीन पर लाल अक्षरों में चमकता 'No Room' या 'Regret' देखकर ऐसा लगता है जैसे रेलवे आपसे कह रहा हो- "भाई साहब, घर पर ही रहिए, बाहर बहुत भीड़ है."

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मिडिल क्लास आदमी के लिए पहाड़ की वादियों में जाने या नानी के घर पहुंचने का सपना, रेलवे की इस 'हॉट' वेटिंग लिस्ट की वजह से 'अग्निपरीक्षा' बन गया है. रेल मंत्रालय के दस्तावेजों में भारत सरकार कह रही है कि हम हजारों समर स्पेशल ट्रेनें चला रहे हैं, पटरियां बिछा रहे हैं, स्टेशन चमक रहे हैं, लेकिन आम आदमी आज भी अपनी बर्थ के पास खड़े होकर टीटीई से यही गुहार लगा रहा है- “भइया, कुछ जुगाड़ हो सकता है क्या?

मार्च में ही 'मई-जून' का हाउसफुल: ये खेल क्या है?

भारतीय रेलवे में एक नियम है 'एडवांस रिजर्वेशन पीरियड' (ARP), जो फिलहाल 120 दिन का है. यानी आप अपनी यात्रा से चार महीने पहले टिकट बुक कर सकते हैं. अब गणित ये है कि जिन लोगों को जून में छुट्टियां मनानी हैं, उन्होंने फरवरी के ठंडे दिनों में ही अपनी सीटें पक्की करने की कोशिश की थी. नतीजा? दिल्ली-पटना, मुंबई-वाराणसी, हावड़ा-बेंगलुरु और चेन्नई-दिल्ली जैसे मलाईदार रूट्स पर होली खत्म होते ही वेटिंग लिस्ट 400 के पार पहुंच गई.

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एनडीटीवी’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे का इंटरनल डेटा बताता है कि गर्मी के मौसम में पैसेंजर लोड सामान्य दिनों के मुकाबले 30% से 35% तक बढ़ जाता है. लेकिन क्या ट्रेनों की संख्या भी इसी अनुपात में बढ़ती है? जवाब है- नहीं. पटरियों की अपनी क्षमता है और उस पर मालगाड़ियों से लेकर वंदे भारत जैसी प्रीमियम ट्रेनों का दबाव इतना है कि आम आदमी की स्लीपर या थर्ड एसी वाली ट्रेनें कहीं पीछे छूट जाती हैं.

'समर स्पेशल' ट्रेनें: राहत या सिर्फ आंखों का धोखा?

हर साल अप्रैल की शुरुआत में रेल मंत्रालय बड़े-बड़े विज्ञापनों के साथ 'समर स्पेशल' ट्रेनों की झड़ी लगा देता है. दावा किया जाता है कि लाखों अतिरिक्त सीटें पैदा की गई हैं. लेकिन ज़मीनी हकीकत थोड़ी कड़वी है. इन स्पेशल ट्रेनों का टाइमटेबल अक्सर 'अनाथ' जैसा होता है. इन्हें किसी भी मुख्य ट्रेन के पीछे-पीछे चलाया जाता है, जिससे ये घंटों लेट होती हैं.

दूसरी बड़ी समस्या है इनका ओरिजिनेटिंग स्टेशन. दिल्ली में रहने वाले को कहा जाता है कि ट्रेन नई दिल्ली या पुरानी दिल्ली के बजाय 'आनंद विहार टर्मिनल' के किसी सुदूर प्लेटफॉर्म से या फिर सराय रोहिल्ला से मिलेगी. 

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सबसे बड़ा झटका लगता है जेब पर. इन ट्रेनों को 'स्पेशल फेयर' कैटेगरी में रखा जाता है. जिसका किराया सामान्य मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों से 10 फीसदी से 30 फीसदी तक ज्यादा होता है. यानी आपको सुविधा वही पुरानी मिलेगी. खटारा कोच मिल सकते हैं, लेकिन किराया 'स्पेशल' देना होगा.

तत्काल और प्रीमियम तत्काल: जब किस्मत और इंटरनेट दोनों साथ छोड़ दें

जब नॉर्मल वेटिंग लिस्ट 'रिग्रेट' में बदल जाती है, तो मिडिल क्लास का आखिरी सहारा बचता है- 'तत्काल'. सुबह 10:00 बजे एसी और 11:00 बजे स्लीपर के लिए शुरू होने वाली यह जंग किसी 'ई-स्पोर्ट्स' से कम नहीं है.

10:00 बजकर 1 मिनट होते ही IRCTC की वेबसाइट ऐसी सुस्त पड़ती है जैसे पुराने जमाने की एंबेसडर कार पहाड़ पर चढ़ रही हो. पलक झपकते ही 'अवेलेबल' सीटें 'वेटिंग' में तब्दील हो जाती हैं. इसके बाद नंबर आता है 'प्रीमियम तत्काल' का. यह रेलवे का अपना 'शेयर बाजार' है. जैसे-जैसे डिमांड बढ़ती है और सीटें कम होती हैं, किराया रॉकेट की तरह ऊपर भागता है.

कई बार तो दिल्ली से मुंबई या कोलकाता का प्रीमियम तत्काल किराया इंडिगो या एयर इंडिया के हवाई जहाज के टिकट के बराबर या उससे भी महंगा हो जाता है. ऐसे में आदमी सोचता है कि ट्रेन की मिडिल बर्थ पर धक्के खाने से अच्छा है, दो घंटे की फ्लाइट ले ली जाए.

वीआईपी कोटा और चार्ट का 'चमत्कार': आम आदमी कहां खड़ा है?

आपने अक्सर देखा होगा कि चार्ट बनने से पहले आपकी वेटिंग 60 थी, लेकिन जैसे ही चार्ट निकला, आपकी सीट कन्फर्म हो गई. इसे लोग चमत्कार मानते हैं, लेकिन इसके पीछे 'कोटा सिस्टम' का पेचीदा गणित है. 

टाइम्स ऑफ इंडिया’ के मुताबिक भारतीय रेलवे में इमरजेंसी कोटा (EQ), ड्यूटी पास कोटा, और वीआईपी कोटा (HO) जैसी श्रेणियां होती हैं. ये सीटें बड़े अधिकारियों, मंत्रियों और रसूखदारों के लिए रिजर्व रखी जाती हैं. चार्ट बनने से कुछ घंटे पहले जब इन कोटो से डिमांड नहीं आती, तब ये सीटें सामान्य वेटिंग लिस्ट में डाल दी जाती हैं. 

लेकिन ये पूरी तरह 'किस्मत' का खेल है. अगर उस दिन किसी बड़े नेता के समर्थकों का जत्था निकल रहा हो, तो आपकी 10 वेटिंग भी कन्फर्म नहीं होगी. यह सिस्टम दिखाता है कि आज भी रेलवे की प्राथमिकता में 'आम आदमी' से ऊपर 'खास आदमी' बैठा है.

ये भी पढ़ें: रेलवे का वेटिंग लिस्ट का खेल, क्यों WL 10 अटकता है और WL 100 कंफर्म हो जाता है?

क्लोन ट्रेनों का कॉन्सेप्ट: कागज़ पर हिट, पटरी पर फ्लॉप?

रेलवे ने भीड़ कम करने के लिए 'क्लोन ट्रेन' (Clone Train) का आइडिया पेश किया था. मतलब, अगर श्रमजीवी एक्सप्रेस में 500 की वेटिंग है, तो ठीक उसके आधे घंटे बाद वैसी ही एक और ट्रेन उसी रूट पर चलाई जाए. सुनने में यह विचार क्रांतिकारी है, लेकिन भारत के रेल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए यह किसी सिरदर्द से कम नहीं है. 

‘बिजनेस स्टैडर्ड’ की एक रिपोर्ट बताती है कि हमारी पटरियां पहले से ही अपनी क्षमता से 150% ज्यादा बोझ ढो रही हैं. एक ही ट्रैक पर दो ट्रेनों के बीच जो 'सेफ्टी गैप' होना चाहिए, वह खत्म होने लगता है. इसके अलावा, हमारे पास इतने एक्स्ट्रा कोच और लोकोमोटिव (इंजन) भी नहीं हैं कि हर बिजी रूट पर क्लोन ट्रेन उतारी जा सके. यही वजह है कि ये योजनाएं केवल कुछ ही रूट्स तक सिमट कर रह गई हैं.

क्या आम आदमी की अनदेखी हो रही है?

‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ के मुताबिक पिछले कुछ सालों में रेलवे का फोकस 'प्रीमियम' सेगमेंट पर बढ़ा है. वंदे भारत, अमृत भारत और तेजस जैसी ट्रेनों ने यात्रा का अनुभव तो बदला है. लेकिन इन्होंने सामान्य मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों के स्लॉट्स (समय) और प्राथमिकता को कम कर दिया है. अक्सर देखा जाता है कि एक वंदे भारत को रास्ता देने के लिए तीन स्लीपर क्लास वाली ट्रेनों को आउटर पर खड़ा कर दिया जाता है.

मिडिल क्लास आदमी जो 500-700 रुपये में सफर करना चाहता है, उसके लिए सीटें कम होती जा रही हैं और उसे मजबूरन महंगे विकल्पों की ओर धकेला जा रहा है. रेलवे का 'नया टाइमटेबल' नई ट्रेनों की बात तो करता है, लेकिन पुरानी ट्रेनों में कोच की संख्या बढ़ाने पर चुप्पी साध लेता है.

जेब पर तत्काल और स्पेशल ट्रेनों की मार

क्या आपको पता है कि 'प्रीमियम तत्काल' का किराया कई बार फ्लाइट के टिकट को टक्कर देता नजर आता है? इस अंतर को टेबल के जरिए समझने की कोशिश करते हैं. 

कैटेगरीऔसत किराया (स्लीपर)औसत किराया (3AC)कन्फर्म होने के चांससुविधा/स्पीड
नॉर्मल मेल/एक्सप्रेस500 रुपये - 600 रुपये1400 रुपये - 1600 रुपयेबहुत कम (अगर वेटिंग है)औसत, समय पर पहुंचने की गारंटी नहीं
समर स्पेशल ट्रेन650 रुपये - 750 रुपये1700 रुपये - 2000 रुपयेमध्यम (बुकिंग खुलते ही)औसत से कम, अक्सर लेट-लतीफ
 तत्काल (Tatkal)650 रुपये - 775 रुपये 1800 रुपये - 2100 रुपयेलक (Luck) पर निर्भरनॉर्मल जैसी
प्रीमियम तत्काल1200 रुपये - 2500 रुपये 3500 रुपये - 6000 रुपयेज्यादा (अगर पैसे हैं)नॉर्मल जैसी, पर दाम 'हवाई'
हवाई जहाज (Advance)N/A 4500 रुपये - 7000 रुपये 100%सुपरफास्ट और प्रीमियम

यहां ये बात जान लेनी जरूरी है कि प्रीमियम तत्काल का किराया डिमांड के हिसाब से बदलता रहता है. कई बार यह फ्लाइट के आखिरी समय के टिकट से भी महंगा हो जाता है.

'नो रूम' के दौर में कैसे पाएं कन्फर्म सीट?

अगर आप इस गर्मी में वाकई घर पहुंचना चाहते हैं, तो कुछ 'स्मार्ट' तरीके अपनाने होंगे.

विकल्प (Vikalp) स्कीम: फॉर्म भरते समय इसे टिक करना न भूलें. अगर आपकी ट्रेन में सीट नहीं मिली, तो रेलवे आपको उसी रूट की दूसरी ट्रेन में (भले ही वो किसी दूसरे स्टेशन से हो) कन्फर्म सीट दे सकता है.

कनेक्टिंग जर्नी: सीधे दिल्ली से पटना का टिकट न ढूंढें. मुरादाबाद या लखनऊ तक का अलग टिकट लें और वहां से आगे का अलग. कई बार टुकड़ों में सीटें मिल जाती हैं.

प्रेडिक्शन ऐप्स: 'ConfirmTkt' या 'Ixigo' जैसे ऐप्स का सहारा लें जो ऐतिहासिक डेटा के आधार पर बताते हैं कि आपकी वेटिंग क्लियर होने के कितने प्रतिशत चांस हैं. अगर चांस 50% से कम है, तो रिस्क न लें.

बोर्डिंग पॉइंट बदलना: अगर मुख्य स्टेशन से वेटिंग है, तो उसके पिछले स्टेशन से टिकट बुक करें और बोर्डिंग पॉइंट अपना शहर डाल दें.

सोर्स: IRCTC Official Guide - Vikalp Scheme Details 

आगे क्या बदल सकता है?

अब लाख टके का सवाल ये है कि भारतीय रेल के हालात ऐसे ही रहेंगे या फिर भविष्य में कुछ सुधार की गुंजाइश है. जवाब है हां, हालात बदल भी सकते हैं और सुधर भी सकते हैं. बशर्तें कि कुछ ढांचागत सुधार किए जाएं. मिसाल के तौरपर,

  • हाई स्पीड ट्रेन नेटवर्क
  • ज्यादा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर
  • स्मार्ट टिकटिंग सिस्टम
  • AI आधारित सीट मैनेजमेंट

अगर ये सुधार लागू होते हैं, तो रेलवे की हालत में यकीनन सुधार देखने को मिलेगा. 

ये भी पढ़ें: जनरल डिब्बों की 'भीड़' और स्लीपर का 'सत्यानाश', भारतीय रेल सिर्फ अमीरों की सवारी बन गई है?

वेटिंग सिर्फ नंबर नहीं, सिस्टम की कहानी है

रेलवे की वेटिंग लिस्ट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है. ये बताती है कि देश में यात्रा की मांग कितनी तेजी से बढ़ रही है और सिस्टम उसे पकड़ नहीं पा रहा.
हर ‘WL 200’ के पीछे एक परिवार है, एक प्लान है, एक उम्मीद है. और हर बार सवाल वही रहता है- “भइया, सीट कन्फर्म होगी क्या?” 

वीडियो: रेलवे ने बदला टिकट कैंसिल का नियम, अश्विनी वैष्णव ने क्या बताया?

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