साल 2016. असम में विधानसभा चुनाव होने थे. राज्य में कांग्रेस की सरकार थी. मुख्यमंत्री थे तरुण गोगोई. पार्टी की स्टेट यूनिट में उनके खिलाफ जबरदस्त नाराजगी थी. अधिकतर नेता उनको हटाए जाने के पक्ष में थे. कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी इसके लिए राजी हो गया. लेकिन बीच में आ गए राहुल गांधी. तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई की राहुल से दोस्ती ने उनकी कुर्सी बचा दी. लेकिन इससे नाराज पार्टी के नंबर दो हिमंता बिस्वा सरमा ने पार्टी छोड़ दी.
असम में खुद से हार रही कांग्रेस? BJP ने अभी से चुनाव एकतरफा कर दिया?
असम में 9 अप्रैल को चुनाव होना है. राज्य में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है. बीजेपी असम में जीत की हैट्रिक लगाना चाहेगी. वहीं कांग्रेस पिछले एक दशक का सत्ता का सूखा दूर करने की कोशिशों में जुटी है. लेकिन एक के बाद एक सीनियर नेताओं के पार्टी छोड़ने से कांग्रेस के अभियान को बड़ा झटका लगा है.
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कट टू 2026. फिर से राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं. तब नेपथ्य की राजनीति कर रहे गौरव गोगोई अब फ्रंट रनर हैं. केंद्रीय नेतृत्व की कमान तब सोनिया गांधी के पास थी. अब राहुल गांधी बड़े फैसले लेते हैं. उन्होंने पार्टी के कई सीनियर नेताओं को दरकिनार करके गौरव गोगोई को प्रदेश कांग्रेस कमिटी की जिम्मेदारी दे दी.
नतीजा फिर वही. पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने अपने रास्ते अलग कर लिए. पहले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा और अब प्रद्युत बोरदोलोई. वे दो बार से नोगांव से सांसद है. तरुण गोगोई सरकार में कई मंत्रालय भी संभाल चुके हैं.
इस बीच कई और नेता कांग्रेस छोड़ चुके हैं. 22 फरवरी को भूपेन बोरा ने पार्टी छोड़ी. 5 मार्च को 3 विधायक कांग्रेस छोड़ बीजेपी में गए. इससे पहले कांग्रेस के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष राणा गोस्वामी ने 'कमल' थामा था. असम यूथ कांग्रस के पूर्व अध्यक्ष अंकिता दास और संयुक्त महासचिव परबा दास कलिता ने भी पार्टी छोड़ दी है.
बीजेपी के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा बेहद गर्मजोशी के साथ अपने पुराने साथियों को अपनी नई पार्टी में स्वागत कर रहे हैं. हिमंता से लेकर बोरा और बोरदोलोई तक नेताओं के पार्टी छोड़ने का मोडस ऑपरेंडी सेम है. सबने ‘राहुल गांधी के नेतृत्व वाले आलाकमान द्वारा अपमानित’ किए जाने की बात कही है. और गोगोई को निशाने पर लिया है.
कांग्रेस अपने नेताओं को रोक क्यों नहीं पार रही?
असम में कांग्रेस नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला हैरान करने वाला नहीं है. यह एक पैटर्न का हिस्सा है. बीजेपी चुपके से कांग्रेस के कद्दावर नेताओं को अपने पाले में करने में कामयाब रही है. थोड़ी छूट लें तो कह सकते हैं कि बीजेपी ने बेहद आसानी से इस काम को अंजाम दिया है.
इस पूरे प्रसंग में कांग्रेस की मुश्किल ये है कि पहले से संघर्ष कर रही पार्टी इन झटकों से और कमजोर हो गई है. दूसरी तरफ असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की माहिर रणनीतिकार और चतुर नेता की इमेज को और ज्यादा मजबूती मिली है. असम में कांग्रेस की अंदरुनी मामलों की खबर रखने वाले एक नेता ने बताया,
हमें पहले से ही पता था कि कांग्रेस के जीतने की कोई गुंजाइश नहीं है. हमारी स्थिति काफी कमजोर है. यह एकतरफा मुकाबला है. हिमंता ग्राउंड लेवल के कार्यकर्ताओं को भी नाम से जानते हैं. इनमें विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ता भी शामिल हैं. असल में उनमें से कई तो उन्हीं के नियुक्त किए गए लोग हैं. उनके जरिए ही वो विरोधी गुटों पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं.
सिर मुड़ाते ही ओले पड़ गए
3 जनवरी को प्रियंका गांधी वाड्रा को असम में उम्मीदवारों की चयन करने वाली स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया. उम्मीद जताई गई कि असम में फैसले लेने की प्रक्रिया में प्रियंका गांधी की एंट्री सत्ता समीकरणों को बदल सकती है. और पार्टी को ब्रह्मपुत्र की उफनती लहरों से सुरक्षित बाहर निकालने में पतवार का काम कर सकती है. लेकिन गुवाहाटी की उनकी पहली ही यात्रा में खेल हो गया. जब असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा के इस्तीफे की खबर आई. उन्होंने पार्टी के साथ 32 साल के सिलसिले को खत्म कर बीजेपी का हमराह होना चुन लिया.
जिस तरह से भूपेन बोरा का एग्जिट हुआ. ऑप्टिक्स के लिहाज से इससे अच्छा मैसेज नहीं गया. बोरा पार्टी छोड़ने के एक दिन पहले तक खाने की मेज पर प्रियंका गांधी के साथ थे. इस रात्रिभोज में उनके साथ असम के प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और गौरव गोगोई भी मौजूद थे. लेकिन बोरा ने किसी को अपनी मंशा की भनक तक नहीं लगने दी. अगले दिन वो असम के मुख्यमंत्री के साथ खड़े थे.
पार्टी छोड़ने के बाद भूपेन बोरा ने बताया,
मैं 32 साल तक पार्टी के साथ रहा. जब प्रदेश अध्यक्ष था तब भी मुझे दिल्ली से फोन आते थे कि फैसले गौरव ही लेंगे. मैं चुप्पी साध लेता था. मैंने राज्य के प्रभारी को 22 चिट्टियां लिखीं. इसमें गौरव के इशारे पर मुझे अपमानित किए जाने का जिक्र था. ये सभी चिट्ठियां कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को भी भेजी थीं. लेकिन किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया. मैं और क्या करता?
गौरव को कमान मिलने के बाद से भगदड़
26 मई 2025 को असम कांग्रेस की कमान गौरव गोगोई को मिली. दिल्ली में इसको लेकर काफी उत्साह था. कई लोगों की राय थी कि वे एक युवा और तेजतर्रार नेता हैं जिनमें राज्य में पार्टी को फिर से खड़ा करने का माद्दा है. सबसे जरूरी बात, उन्हें एक ऐसे नेता के तौर पर देखा जा रहा था, जो आगे बढ़कर हिमंता की राजनीतिक चालों का मुकाबला करेगा. हिमंता कभी उनके पिता के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार हुआ करते थे.
ये भी माना जा रहा था कि गौरव ऊपरी असम (राज्य के पूर्वी हिस्से) में वोटर्स को कांग्रेस के पाले में ला सकते हैं. और अहोम समुदाय के बड़े चेहरे के तौर पर खुद को स्थापित कर पाएंगे. इस समुदाय की आबादी 13 से 20 लाख तक बताई जाती है. इनकी बड़ी बसावट शिवसागर, डिब्रूगढ़, जोरहाट, गोलाघाट और लखीमपुर जैसे जिलों में है.
लेकिन बीजेपी ने कांग्रेस के दांव से ही उनको मात दे दी. गौरव एक अच्छे वक्ता हैं और पार्टी हाईकमान के भरोसेमंद हैं. प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार से आते हैं. लेकिन ये भी सच है कि वो भूपेन बोरा और बोरदोलोई समेत कई कांग्रेसी नेताओं से काफी जूनियर हैं. 44 साल की उम्र में गोगोई कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और लोकसभा में पार्टी के उपनेता की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं.
बीजेपी ने कांग्रेस के अंदरूनी कलह का फायदा उठाया. पार्टी ने उन नाराज सीनियर नेताओं की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया, जो राजनीतिक तजुर्बे में अपने से कमतर गौरव गोगोई को आगे बढ़ाने के केंद्रीय हाईकमान के फैसले से अपमानित महसूस कर रहे थे. इनमें से कई नेता तो गौरव के पिता के मंत्रिमंडल में काम कर चुके थे.
दिल्ली में कांग्रेस के एक सांसद ने असम के मौजूदा घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा,
जब कोई सिटिंग सांसद पार्टी छोड़ता है, इसका मतलब है कि पार्टी के भीतर कोई गंभीर समस्या है. पार्टी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि सीनियर नेता अपमानित क्यों महसूस कर रहे हैं? आपसी बातचीत में इतना बड़ा कम्युनिकेशन गैप क्यों है? अनुभवी नेताओं की बात क्यों नहीं सुनी जा रही है?
बहरहाल, प्रद्युत बोरदोलोई के पार्टी छोड़ने के बाद कांग्रेस राज्य में ही नहीं दिल्ली में भी बेनकाब हो गई है. यह सब कुछ गांधी परिवार के नाक के नीचे से हुआ. वो भी तब जब सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी संसद में मौजूद थे. बोरदोलोई अपना साढ़े तीन साल का कार्यकाल छोड़ कर दूसरी पार्टी में चले गए.
ये पार्टी नेतृत्व की अपने सदस्यों को एकजुट रख पाने की क्षमता पर गंभीर प्रश्न चिह्न खड़े करता है. इसके उलट बीजेपी ने किस तेजी और रणनीतिक चतुराई से यह कदम उठाया, उसकी बानगी संसद में दिख रही थी. पार्टी में शामिल होने के बाद प्रद्युत बोरदोलोई सत्ता के गलियारों में घूमते हुए गृह मंत्री अमित शाह के साथ कदमताल करते देखे गए.
इस बीच कांग्रेस में दल-बदल के सूत्रधार हिमंता बिस्वा सरमा भी संसद में चहलकदमी करते नजर आए. उन्होंने असम में जीत का पूरा भरोसा जताया. मीडिया से बातचीत में दावा किया कि कांग्रेस में अब गिनती के हिंदू नेता बचे हैं और जो बचे हैं वो भी बीजेपी में आने की कतार में हैं. उनके इस बयान ने असम की सियासत की गर्मी फिर से बढ़ा दी है. अब सवाल उठने लगे हैं, अगला नंबर किसका है?
वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: CM हिमंता ने चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ क्या खेल कर दिया?













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