The Lallantop
Advertisement
  • Home
  • Lallankhas
  • Delhi Optics, Bengal Politics: How Mamata Banerjee's TMC Is Positioning for the West Bengal Election Battle with BJP

संसद में विपक्ष से अलग तेवर दिखाती TMC, क्या दिल्ली में लिख रही है बंगाल चुनावों की स्क्रिप्ट?

West Bengal Election 2026 से पहले Mamata Banerjee की TMC ने संसद में अपना अलग रुख अपनाया है, जिसे BJP के खिलाफ सीधी राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. इस रिपोर्ट में 2021 बंगाल चुनाव के वोट प्रतिशत, TMC बनाम BJP मुकाबले और INDIA ब्लॉक के समीकरण के बीच 2026 की तैयारी को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं.

Advertisement
West Bengal Assembly Elections 2026
ममता दीदी की निगाह विधानसभा चुनावों पर
pic
दिग्विजय सिंह
16 फ़रवरी 2026 (पब्लिश्ड: 01:57 PM IST)
font-size
Small
Medium
Large
font-size
Small
Medium
Large
whatsapp share

संसद में जब ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (All India Trinamool Congress) के सांसद लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव जैसे बड़े मुद्दे पर विपक्ष से थोड़ा अलग सुर में दिखते हैं, तो कई सवाल उठते हैं. सवाल कि क्या यह INDIA ब्लॉक से दूरी है. सवाल कि क्या टीएमसी (TMC) और कांग्रेस (Congress) के बीच कोई दरार है.

सवालों के दायरे में टीएमसी और लेफ्ट पार्टियों के बीच रिश्ते भी आते हैं. लेकिन बंगाल की सियासत को समझने वाले जानते हैं कि यहां हर बयान का सीधा रिश्ता वोट से होता है. दिल्ली में जो कहा जाता है, उसकी गूंज कोलकाता से कूचबिहार तक जाती है.

और यही इस पूरी सियासी उतार चढ़ाव से भरी तिलस्मी की चाबी भी है.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 दूर जरूर है, लेकिन राजनीति में ये दूरी पलक झपकते नजदीकियों में तब्दील हो जाती है. तृणमूल कोई जोखिम नहीं लेना चाहती. दिल्ली उसके लिए सिर्फ कानून बनाने की जगह नहीं है. यह एक मंच है, जहां से बंगाल के मतदाताओं को सीधा संदेश भेजा जा सकता है.

अभी क्या हुआ है संसद में

हाल के संसद सत्र में लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला के खिलाफ कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. इस दौरान विपक्षी दलों के बीच रणनीति को लेकर कई दौर की बैठकें हुईं. मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी सामने आया कि कुछ मुद्दों पर तृणमूल ने अपना अलग रुख रखा.

द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि तृणमूल “issue-based coordination” यानी मुद्दों पर आधारित सहयोग की बात करती है और हर कदम पर सामूहिक लाइन अपनाना जरूरी नहीं मानती. मतलब इंडिया ब्लॉक के साथ तो हैं, मगर आंख मूंदकर हां में हां नहीं मिलाएंगे.

वहीं दूसरी तरफ द हिंदू ने भी अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि टीएमसी, संसद में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहती है. खासकर उन मुद्दों पर जो सीधे राज्यों के अधिकार से जुड़े हैं. 

यानी टीएमसी का संदेश साफ है. इंडिया ब्लॉक के साथ भी हैं और अलग भी हैं.

रणनीति की पहली परत: 2026 की तैयारी

2021 के चुनाव ने बंगाल की राजनीति को बदल दिया. उस चुनाव में मुकाबला सीधा-सीधा था. एक तरफ थीं ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और दूसरी तरफ पूरी ताकत से उतरी भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party).

बीजेपी ने 2019 लोकसभा चुनाव में बंगाल में 18 सीटें जीती थीं और लगभग 40 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था. इससे साफ हो गया था कि मुकाबला अब दो ध्रुवों के बीच है.

मगर जब 2021 विधानसभा चुनावों के नतीजे आए तो तस्वीर और साफ हुई.

बंगाल चुनाव 2021: आंकड़ों की दिलचस्प जंग

294 सीटों वाली विधानसभा में, तृणमूल को 47.9 प्रतिशत वोट और 213 सीटें मिलीं. बीजेपी को 38.1 प्रतिशत वोट और 77 सीटें मिलीं. लेफ्ट और कांग्रेस मिलकर करीब 9 से 10 प्रतिशत वोट पर सिमट गए और एक भी सीट नहीं जीत पाए.

यानी बंगाल की राजनीति दो ध्रुवों में सिमट चुकी थी. बीजेपी ने वोट शेयर में जबरदस्त उछाल लिया, लेकिन सीटों में वह पीछे रह गई. तृणमूल ने अपने वोट को सीटों में बदलने की रणनीति बेहतर ढंग से लागू की. जिसका फायदा उन्हें नतीजों में मिला भी.

लेफ्ट और कांग्रेस: किसका नुकसान

कभी बंगाल पर तीन दशक से ज्यादा राज करने वाला लेफ्ट 2021 में शून्य पर आ गया. कांग्रेस भी सीमित रह गई.

दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा, उम्मीद थी कि तृणमूल को चुनौती देंगे. लेकिन असल में उनका पारंपरिक वोट पहले ही 2019 के बाद बीजेपी की ओर खिसक चुका था.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर लेफ्ट थोड़ा मजबूत रहता, तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता था. इससे एंटी तृणमूल वोट बंटता. लेकिन जब लड़ाई सीधी तृणमूल बनाम बीजेपी हो गई, तो ध्रुवीकरण तेज हो गया.

कुछ सीटों पर लेफ्ट और कांग्रेस की मौजूदगी से तृणमूल को हल्का नुकसान जरूर हुआ, लेकिन सत्ता पर कोई असर नहीं पड़ा. असल नुकसान लेफ्ट का हुआ. बीजेपी मुख्य विपक्ष बन गई.

राष्ट्रीयता की दरकार, मगर राष्ट्रीय भीड़ में खोना नहीं

अब 2026 की ओर देखिए. पिछले विधानसभा चुनाव नतीजों के हिसाब से बीजेपी 38 प्रतिशत वोट वाली पार्टी है. दीदी जानती हैं कि अबकी बार भी भाजपा चुप नहीं बैठेगी. उसके पास मजबूत संगठन, संसाधन और केंद्र की ताकत है.

ऐसे में तृणमूल यह नहीं चाहती कि बंगाल का वोटर उसे सिर्फ INDIA ब्लॉक का एक हिस्सा समझे. 

वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार का मानना है कि ममता को बंगाल में मुस्लिम वोट बैंक एकजुट रखने के लिए इंडिया ब्लॉक का साथ चाहिए. मगर उसकी भी एक सीमा है.

साथ-साथ, मगर दूर-दूर की इस तृणमूल नीति को समझाते हुए प्रेम कुमार कहते हैं,

Image embed

कभी हां, कभी ना की इस रणनीति के पीछे भी यही वजह नजर आती है. अगर पार्टी हर मुद्दे पर विपक्ष की सामूहिक लाइन में घुल-मिल जाती है, तो उसकी अलग पहचान कमजोर हो सकती है. इसलिए संसद में अलग तेवर दिखाना एक संदेश है.

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भी कुछ-कुछ यही किया था. मगर कहीं ज्यादा बड़ा दायरे और तीखे अंदाज़ में.

कुल मिलाकर कहें तो दीदी का संदेश ये है कि “हम बीजेपी के खिलाफ हैं, लेकिन हमारी अपनी जमीन और अपनी पहचान है.”

बांग्ला अस्मिता का कार्ड

बंगाल की राजनीति में भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय गौरव बड़ा मुद्दा है. तृणमूल संसद में बार-बार राज्य के अधिकार, केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, फंड के बंटवारे जैसे मुद्दे उठाती है.

यह सिर्फ संसदीय बहस नहीं है. यह बंगाल के मतदाता को बताया जा रहा है कि दिल्ली में भी बंगाल की आवाज अलग और मजबूत है. जब केंद्र और राज्य के बीच टकराव की खबरें आती हैं, तो तृणमूल उसे बंगाल बनाम केंद्र की लड़ाई के रूप में पेश करती है.

वरिष्ठ पत्रकार प्रेम कुमार का मानना है,

Image embed

प्रेम कुमार का मानना है कि उनके बांग्ला राष्ट्रवाद के दोहरे फायदे हैं,

Image embed

यह वही रणनीति है जो 2021 में “बंगाल बनाम बाहरी” के नैरेटिव में दिखी थी. इस पूरे मुद्दे पर ‘द लल्लनटॉप’ के राजनीतिक संपादक पंकज झा, थोड़ी अलग राय रखते हैं. उनका कहना है,

Image embed

पंकज झा कहते हैं कि दीदी, आपदा को अवसर में बदल देती हैं. वो कहते हैं,

Image embed

इस बार भी SIR के मुद्दे को टीएमसी बंगाल से लेकर दिल्ली तक अपने पक्ष में भुनाने की पुरजोर कोशिश कर रही है.

हाल की घटनाएं: दिल्ली और कोलकाता का कनेक्शन

हाल के महीनों में केंद्र और राज्य के बीच फंड, केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर बयानबाजी तेज रही है. द टेलीग्राफ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि तृणमूल नेतृत्व दिल्ली में भी इस टकराव को राजनीतिक संदेश में बदलने की कोशिश कर रहा है.

दूसरी ओर हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2026 से पहले तृणमूल का फोकस स्पष्ट है, बीजेपी को मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनाकर सीधा मुकाबला रखना.
 यानी संसद की हर बहस दरअसल बंगाल की जमीन पर गूंजने के लिए है.

INDIA ब्लॉक से दूरी या रणनीतिक संतुलन

अब बड़ा सवाल. क्या यह रणनीति भविष्य में विपक्षी एकता को कमजोर करेगी? तृणमूल ऑफिशियली INDIA ब्लॉक का हिस्सा है. लेकिन वह हर मुद्दे पर सामूहिक बयान देने से बचती है.

इसे दो तरह से देखा जा सकता है.

  • पहला, ये चुनावी पोजिशनिंग है.
  • दूसरा, ये भविष्य में क्षेत्रीय दलों की स्वतंत्र भूमिका का संकेत है.

राजनीति में गठबंधन स्थायी नहीं होते. राज्य और केंद्र की राजनीति अलग-अलग धरातल पर चलती है. तृणमूल शायद यही संतुलन साधने की कोशिश कर रही है.

ये भी पढ़ें: 2026 में NDA-INDIA ब्लॉक के लिए साख की लड़ाई! 5 राज्यों के चुनावों में सरकार बचाने की कवायद

ममता की राजनीति: कल्याण और पहचान

2021 में ममता बनर्जी ने अपने सरकारी की कल्याणकारी योजनाओं का चुनावों में जोर-शोर से प्रचार किया. लक्ष्मी भंडार, छात्रवृत्ति योजनाएं, ग्रामीण लाभ योजनाएं. इनसे महिला और ग्रामीण वोटरों में दीदी की मजबूत पकड़ बनी.

47.9 प्रतिशत वोट यूं ही नहीं आते. यह एक व्यापक सामाजिक गठबंधन का नतीजा था. अब वही गठबंधन 2026 में भी बनाए रखना टीएमसी की जरूरत भी है और मजबूरी भी. 

इसलिए संसद में भी संदेश यही है कि “हम बंगाल की पार्टी हैं, दिल्ली की नहीं.”

संसद बनी चुनावी रैली

आज जो संसद में दिखता है, वह दरअसल 2026 के पश्चिम बंगाल चुनावों की रिहर्सल है. हर बयान, हर विरोध, हर वॉकआउट का लक्ष्य कोलकाता की गलियों तक पहुंचना है.

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव हो या किसी केंद्रीय एजेंसी का मुद्दा, तृणमूल यह देख रही है कि बंगाल का मतदाता इसे किस नजरिए से देखेगा.

दूसरे शब्दों में कहें तो दिल्ली का मंच अब चुनावी मैदान में तब्दील हो चुका है.

बंगाल में अब क्या होगा?

2021 के विधानसभा चुनावों ने दिखाया कि बंगाल की लड़ाई सीधी है. तृणमूल बनाम बीजेपी. लेफ्ट और कांग्रेस फिलहाल हाशिए पर हैं, लेकिन राजनीति में वापसी नामुमकिन नहीं होती.

ऐसे में तृणमूल की ये “अकेली चाल” क्या उसे और मजबूत करेगी? या फिर विपक्षी एकता की तस्वीर में हल्की दरार डाल देगी? 

सवाल खुला है. दिल्ली में बहस जारी है. लेकिन असली फैसला पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में बंगाल की जनता सुनाएगी. तब तक- हम इंतजार करेंगे… 

वीडियो: सुप्रीम कोर्ट पहुंची ममता बनर्जी, सुनवाई के बाद क्या बोले CJI?

Advertisement

Advertisement

()