उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी जमीन तैयार होने लगी है. खासकर दलित राजनीति में. एक तरफ बहुजन समाज पार्टी का पुराना प्रभाव लगातार कमजोर हुआ है, दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के जरिए अपने सामाजिक आधार का विस्तार करने की कोशिश की है. बीजेपी के सामने चुनौती ये है कि उसका वो सामाजिक गठजोड़, जिसमें गैर-जाटव दलित और गैर-यादव पिछड़े अहम हिस्से रहे हैं, 2024 के लोकसभा चुनाव में पहले जैसा मजबूत नहीं रहा.
अयोध्या में झटका, 2027 की सुगबुगाहट: गैर-जाटव दलितों को साधने के लिए बीजेपी का 'ब्रह्मास्त्र' बनेंगे चिराग पासवान?
UP Assembly Elections: उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद गैर-जाटव दलित वोट की राजनीति क्यों बदल गई? अयोध्या की फैजाबाद सीट पर समाजवादी पार्टी की जीत, मिल्कीपुर में बीजेपी के चंद्रभानु पासवान की जीत और 2027 में चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास की एंट्री से यूपी की दलित राजनीति में क्या नए समीकरण बन सकते हैं,.

इसी बीच चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास ने उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है. 28 सितंबर 2026 को प्रयागराज में चिराग पासवान ने साफ कहा कि उनकी पार्टी 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ेगी. इससे पहले जुलाई में पार्टी ने प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संगठन खड़ा करने की तैयारी की बात कही थी. अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चिराग कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. बड़ा सवाल ये है कि उनके आने से दलित वोट की उस सामाजिक परत पर क्या असर पड़ सकता है, जिसे बीजेपी पिछले एक दशक में अपने साथ जोड़ने में काफी हद तक सफल रही थी.
उत्तर प्रदेश में दलित वोट इतना बड़ा क्यों है?
2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश की आबादी में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी 20.7 प्रतिशत थी. संख्या के लिहाज से ये देश के सबसे बड़े अनुसूचित जाति समूहों में से एक है. जनगणना के आधिकारिक दस्तावेजों में उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जाति आबादी करीब 4.14 करोड़ दर्ज की गई थी.
लेकिन चुनावी राजनीति में दलित कोई एकसमान वोट बैंक नहीं है. जाटव, पासी, वाल्मीकि, कोरी, खटीक, धोबी, दुसाध समेत कई समुदाय हैं, जिनकी सामाजिक स्थिति, भौगोलिक मौजूदगी और राजनीतिक पसंद एक जैसी नहीं रही है. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति को सिर्फ बसपा और जाटव वोट के चश्मे से देखने पर तस्वीर अधूरी रह जाती है.
जाटव लंबे समय से बसपा के सबसे मजबूत सामाजिक आधार माने जाते रहे हैं. लेकिन गैर-जाटव दलितों में कई समुदायों ने अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों का साथ दिया है. बीजेपी ने 2014 के बाद इसी सामाजिक विविधता को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया. गैर-जाटव दलितों और गैर-यादव पिछड़ी जातियों के साथ ऊंची जातियों का गठजोड़ बीजेपी की उत्तर प्रदेश की चुनावी सफलता की अहम वजहों में गिना गया है.
2024 में आखिर हुआ क्या?
2024 का लोकसभा चुनाव इस कहानी का सबसे अहम पड़ाव है. लोकनीति-सीएसडीएस के चुनाव बाद सर्वे के मुताबिक 2019 में उत्तर प्रदेश में एनडीए को करीब 48 प्रतिशत गैर-जाटव दलित वोट मिला था. 2024 में ये आंकड़ा घटकर 29 प्रतिशत रह गया. यानी करीब 19 प्रतिशत अंक की गिरावट.
दूसरी तरफ इंडिया गठबंधन को 2024 में गैर-जाटव दलितों का 56 प्रतिशत समर्थन मिला. जाटवों की तस्वीर थोड़ी अलग रही. लोकनीति-सीएसडीएस के मुताबिक 2024 में 44 प्रतिशत जाटवों ने बसपा को वोट दिया, जबकि एनडीए को जाटव वोट में 24 प्रतिशत समर्थन मिला. यानी बसपा का आधार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, लेकिन उसका प्रभाव काफी कमजोर हुआ.
यही वो आंकड़ा है जो बीजेपी के लिए 2027 की राजनीति को दिलचस्प बनाता है. क्योंकि 2024 में नुकसान सिर्फ किसी एक सीट या किसी एक उम्मीदवार का मामला नहीं था. ये उस सामाजिक गठजोड़ में आई दरार का संकेत था, जिस पर बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपनी चुनावी ताकत खड़ी की थी.
अयोध्या ने खतरे की घंटी कैसे बजाई?
2024 में फैजाबाद लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के लल्लू सिंह को 54,567 वोटों से हराया. अवधेश प्रसाद पासी समुदाय से आते हैं. फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र में अयोध्या भी शामिल है. राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के कुछ ही महीनों बाद बीजेपी के लिए इस सीट पर हार राजनीतिक तौर पर खास तौर पर चर्चा में रही.
इस चुनाव में पासी वोट की चर्चा खूब हुई. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में एक बीजेपी नेता के हवाले से कहा गया कि फैजाबाद में तीन लाख से ज्यादा पासी मतदाता हैं और 2024 में उनके एक हिस्से ने बीजेपी से दूरी बनाकर समाजवादी पार्टी का साथ दिया. ये दावा एक राजनीतिक नेता का आकलन था, कोई आधिकारिक जातिवार मतदान आंकड़ा नहीं. इसलिए इसे पूरे पासी समुदाय के मतदान व्यवहार का प्रमाण नहीं माना जा सकता.
लेकिन चुनाव के बाद की कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.
मिल्कीपुर ने दिखाई दूसरी तस्वीर
फैजाबाद लोकसभा सीट के तहत आने वाली मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर फरवरी 2025 में उपचुनाव हुआ. बीजेपी ने चंद्रभानु पासवान को उम्मीदवार बनाया, जो पासी समुदाय से आते हैं. समाजवादी पार्टी ने अवधेश प्रसाद के बेटे अजीत प्रसाद को मैदान में उतारा.
नतीजा बीजेपी के पक्ष में गया. चंद्रभानु पासवान ने अजीत प्रसाद को 61,710 वोटों से हराया. उन्हें 1,46,397 वोट मिले, जबकि अजीत प्रसाद को 84,687 वोट मिले.
मिल्कीपुर का नतीजा 2024 की फैजाबाद हार के बाद बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण था, लेकिन इसे सीधे पूरे उत्तर प्रदेश के दलित वोट के रुझान का प्रमाण मानना भी सही नहीं होगा. उपचुनाव में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार, संगठन और मतदान का संदर्भ अलग होता है.
फिर भी एक राजनीतिक संदेश जरूर निकला. पासी समुदाय से आने वाला उम्मीदवार बीजेपी के टिकट पर उसी इलाके में जीत सकता है, जहां कुछ महीने पहले पासी नेता अवधेश प्रसाद ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हराया था.
यानी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति स्थिर नहीं है. उम्मीदवार और स्थानीय समीकरण काफी कुछ बदल सकते हैं.
फिर चिराग पासवान की जरूरत क्यों?
यहीं से चिराग पासवान की भूमिका पर चर्चा शुरू होती है. चिराग का राजनीतिक आधार मुख्य रूप से बिहार में है. लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास का पारंपरिक सामाजिक आधार पासवान यानी दुसाध समुदाय में रहा है. उत्तर प्रदेश में पासवान समुदाय की संख्या बिहार जैसी बड़ी नहीं है. इसलिए सिर्फ पासवान वोट के आधार पर उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा चुनावी बदलाव मान लेना आंकड़ों से साबित नहीं होता.
लेकिन राजनीति सिर्फ संख्या का खेल नहीं होती. पहचान, नेतृत्व और संदेश भी मायने रखते हैं.
चिराग पासवान युवा चेहरे हैं. वो राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाते हैं और फिलहाल केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री हैं. उनकी पार्टी भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में उनकी मौजूदगी बीजेपी के लिए सीधे वोट ट्रांसफर की गारंटी नहीं है, लेकिन गैर-जाटव दलितों तक एक अलग राजनीतिक संदेश पहुंचाने का माध्यम जरूर बन सकती है.
इंडियन एक्सप्रेस ने फरवरी 2026 में रिपोर्ट किया था कि चिराग पासवान की पार्टी के अलावा आजाद समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया और वंचित बहुजन आघाड़ी जैसी दलित केंद्रित पार्टियां भी 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर सक्रिय हो रही हैं. यानी बसपा के कमजोर पड़ने से पैदा हुए राजनीतिक खाली स्थान को भरने की कोशिश सिर्फ एक पार्टी नहीं कर रही.
‘लल्लनटॉप’ के पॉलिटिकल एडिटर पंकज झा भी इसे पासी/पासवान समुदाय में सपा के बढ़ते असर का नतीजा मानते हैं. पंकज झा कहते हैं,
अयोध्या में पासी वोट बीजेपी की हार का बड़ा कारण रहे. यही वजह कि योगी मंत्रिमंडल में एक पासवान को जगह दी गई. दो महीने पहले लोजपा (रामविलास) का राष्ट्रीय अधिवेशन भी लखनऊ में हुआ. और अब चिराग का ये ऐलान…साफ है कि सपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश हो रही है.
बीजेपी के लिए असली चुनौती क्या है?
बीजेपी के सामने चुनौती सिर्फ ये नहीं है कि गैर-जाटव दलित वोट किस पार्टी को जाएगा. असली सवाल ये है कि इस वोट का बंटवारा किस तरह होगा.
अगर गैर-जाटव दलित वोट का बड़ा हिस्सा किसी एक विपक्षी गठजोड़ के साथ जाता है, तो उसका असर अलग होगा. अगर ये वोट अलग-अलग दलों में बंटता है, तो चुनावी असर अलग हो सकता है. और अगर स्थानीय उम्मीदवारों के आधार पर समुदाय अलग-अलग सीटों पर अलग फैसला करता है, तो तस्वीर और जटिल हो जाएगी.
2024 में इंडिया गठबंधन को गैर-जाटव दलितों का 56 प्रतिशत समर्थन मिलने का आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है. समाजवादी पार्टी ने पीडीए की राजनीति में दलितों को एक प्रमुख हिस्से के रूप में रखा. अवधेश प्रसाद को फैजाबाद जैसी सामान्य सीट से उम्मीदवार बनाना इसी रणनीति का एक उदाहरण था.
बीजेपी के लिए इसका जवाब सिर्फ एक दलित चेहरा नहीं हो सकता. संगठन, स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार चयन, सरकारी योजनाओं का लाभ, सामाजिक प्रतिनिधित्व और विपक्ष के साथ वोटों के संभावित ध्रुवीकरण जैसे कई कारक साथ काम करेंगे.
क्या चिराग पासवान बन सकते हैं 'ब्रह्मास्त्र'?
ब्रह्मास्त्र शब्द यहां राजनीतिक रणनीति के रूपक के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े अभी इतने नहीं हैं कि चिराग पासवान की भूमिका को किसी निर्णायक चुनावी हथियार के रूप में स्थापित कर दिया जाए. वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह कहते हैं,
एक तरफ पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सक्रियता बढ़ाई है. जुलाई 2026 में चिराग पासवान ने उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार और 403 सीटों तक पहुंच बनाने की बात कही थी. सितंबर में उन्होंने चुनाव लड़ने की बात फिर स्पष्ट की. लेकिन कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारे जाएंगे, किन सीटों पर गठबंधन होगा और बीजेपी के साथ सीट बंटवारे का अंतिम स्वरूप क्या होगा, ये अलग सवाल हैं.
दूसरी तरफ एलजेपी रामविलास का उत्तर प्रदेश में संगठन अभी बीजेपी या समाजवादी पार्टी जैसे बड़े दलों के बराबर नहीं है. इसलिए चिराग के सामने पहला काम चुनावी वोट को प्रभावित करने से पहले संगठन खड़ा करने का होगा.
पासवान नाम से कितना बदल सकता है समीकरण?
ये सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या बिहार का पासवान राजनीतिक ब्रैंड उत्तर प्रदेश में उसी तरह काम करेगा? इसका जवाब अभी साफ नहीं है. उत्तर प्रदेश में पासी और पासवान अलग सामाजिक समुदाय हैं. दोनों को सिर्फ नाम की समानता के आधार पर एक ही राजनीतिक समूह मानना सही नहीं होगा. हालांकि दोनों व्यापक अनुसूचित जाति राजनीति की अलग-अलग धाराओं का हिस्सा हैं.
यही कारण है कि चिराग की राजनीति का संभावित असर केवल पासवान मतदाताओं तक सीमित मानना भी जल्दबाजी होगी. अगर उनकी पार्टी युवा, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर व्यापक दलित और युवा संपर्क बनाती है, तो उसका असर जातीय सीमा से आगे भी जा सकता है. प्रयागराज के सितंबर 2026 के कार्यक्रम में चिराग ने युवाओं, शिक्षा, रोजगार और कौशल से जुड़े मुद्दों पर बात की और राष्ट्रीय युवा आयोग बनाने की योजना बताई.
2027 की असली तस्वीर उम्मीदवारों और गठबंधनों से बनेगी
उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव अभी भविष्य की बात है. इसलिए आज ये कहना कि चिराग पासवान बीजेपी के लिए निर्णायक साबित होंगे या समाजवादी पार्टी की पीडीए रणनीति को रोक देंगे, उपलब्ध आंकड़ों से आगे निकल जाना होगा.
फिलहाल तीन तथ्य साफ दिखाई देते हैं. पहला, उत्तर प्रदेश की 20.7 प्रतिशत अनुसूचित जाति आबादी चुनावी राजनीति में बहुत बड़ा सामाजिक समूह है. दूसरा, 2024 में गैर-जाटव दलित वोट में बीजेपी और उसके सहयोगियों की पकड़ 2019 के मुकाबले कमजोर हुई. तीसरा, बसपा के कमजोर होने से इस सामाजिक समूह में नए राजनीतिक दावेदारों के लिए जगह बनी है.
चिराग पासवान उसी खाली जगह में प्रवेश की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन उनकी पार्टी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वो सिर्फ पासवान पहचान के सहारे आगे बढ़ती है या उत्तर प्रदेश की अलग-अलग दलित और युवा सामाजिक परतों के लिए स्थानीय नेतृत्व और संगठन तैयार कर पाती है.
अयोध्या की हार ने बीजेपी को एक संकेत दिया था. मिल्कीपुर ने दूसरा संकेत दिया. 2027 तक सवाल ये रहेगा कि इन संकेतों से कौन क्या सीखता है. चिराग पासवान उस कहानी का एक नया किरदार जरूर बन चुके हैं, लेकिन उनकी एंट्री को अभी 'ब्रह्मास्त्र' कहना राजनीतिक विश्लेषण से ज्यादा दावा होगा. असली तस्वीर तब बनेगी, जब सीटों का बंटवारा, उम्मीदवारों की सूची और जमीन पर संगठन की ताकत सामने आएगी.
वीडियो: चिराग की पार्टी की सांसद शांभवी ने दो बार वोट डाला? वीडियो की सच्चाई पता चल गई









