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ममता बनर्जी के लिए कोई रास्ता था ही नहीं? बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के पीछे की गजब रणनीति

बीजेपी ने बंगाल में TMC के 15 साल के शासन का अंत कर दिया है. इस जीत के पीछे कई कारण हैं. बीजेपी ने ममता बनर्जी के खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी का फायदा उठाया. वहीं बाहरी वाले नैरेटिव को सफलतापूर्वक पंक्चर किया. इसके अलावा बीजेपी ने भ्रष्टाचार और रोजगार के मुद्दे पर ममता बनर्जी की घेराबंदी करके उनका अभेद्य सा लगने वाला किला ढहा दिया है.

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बीजेपी ने ममता बनर्जी के शासनकाल का अंत कर दिया है. (एक्स)

गंगा जी यहां बिहार से बहती हुई बंगाल तक पहुंचती हैं. बिहार ने बंगाल में भाजपा की विजय का रास्ता भी बना दिया है. मैं बंगाल के भाइयों-बहनों को भी आश्वस्त करता हूं कि बीजेपी आपके साथ मिलकर पश्चिम बंगाल से जंगल राज को उखाड़ फेंकेंगी: नरेंद्र मोदी. 14 नवंबर, 2025.

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कट टू, 4 मई, 2026. बंगाल के चुनावी नतीजों का दिन. मैंने बीजेपी मुख्यालय से आपको कहा था गंगाजी बिहार से आते हुए गंगा सागर तक जाती हैं. आज बंगाल की जीत के साथ गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक कमल ही कमल खिला हुआ है: नरेंद्र मोदी.

तृणमूल कांग्रेस सिर्फ बंगाल में चुनाव नहीं हारी है, सिटिंग सीएम ममता बनर्जी अपनी सीट भवानीपुर सीट भी हार चुकी हैं. सुवेंदु अधिकारी जिन्होंने पिछले चुनाव में ममता को नंदीग्राम से हराकर भवानीपुर भेजा था, उन्होंने ही इस बार ममता को भवानीपुर से भी हरा दिया है. ममता के भविष्य का आकलन बाद में करेंगे. फिलहाल वर्तमान में झांकते हैं.

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ममता के खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी को भुनाया

ममता बनर्जी 15 सालों से राज्य की सत्ता पर काबिज थीं. उनके शासन के खिलाफ लोगों में नाराजगी थी. खासकर स्थानीय विधायकों के खिलाफ. कई इलाकों में सड़क और पानी जैसी बेसिक जरूरतें पूरी नहीं हुई थीं. बीजेपी ने हर विधानसभा में ऐसे मुद्दों को पकड़ा और टीएमसी की घेराबंदी की. ममता बनर्जी ने कई विधायकों के टिकट काट कर लोगों की नाराजगी कम करने की कोशिश की. लेकिन उनका ये प्रयास नाकाफी रहा.

टीएमसी के भ्रष्टाचार को बनाया मुद्दा 

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ममता बनर्जी का उभार कम्युनिस्ट शासन के विरोध में हुआ था. उन्होंने TMC को एक आंदोलन के तौर पर प्रस्तुत किया था. लेकिन धीरे-धीरे पार्टी उसी व्यवस्था की तरह दिखने लगी, जिसे उसने हराया था. जमीनी कार्यकर्ता की जगह स्थानीय बाहुबली ताकतवर हो गए. सरकार में शामिल लोग मनमानी करने लगे. बदलाव की मशाल लेकर आई सरकार घोटालों में घिरती गई. नारदा और शारदा जैसे चिटफंड घोटालों में सरकार के मंत्रियों के नाम आने लगे. इन घोटालों के बावजूद कमोबेश जनता का भरोसा ममता सरकार पर बना रहा.

लेकिन स्कूल भर्ती घोटाले ने ममता सरकार की नींव हिला दी. ममता सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी के यहां से भारी मात्रा में नोटों के बंडल मिले. पिछले साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती निरस्त कर दी. इस फैसले ने बंगाली मिडिल क्लास खासकर भद्र लोक में पार्टी को बहुत डेंट पहुंचाया. टीएमसी ने बाद में पार्थ चटर्जी को हटाया भी. लेकिन बीजेपी ने इस मुद्दे को लपक लिया. पार्टी के नेताओं ने मंच से और मीडिया सेल ने वॉटसऐप ग्रुपों के माध्यम से टीएमसी के भ्रष्टाचार के खिलाफ कैंपेन चलाया.

सरकारी कर्मचारी, बहाली और नौकरी का मुद्दा

सिंगूर आंदोलन ने ममता बनर्जी के लिए सत्ता में आने की राह बनाई थी. इस आंदोलन में उन्होंने टाटा के प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलन किया था. जिसमें किसानों की जमीन जा रही थी. लेकिन 15 साल बाद उनकी विदाई में ये भी एक फैक्टर रहा है. इस आंदोलन के चलते बंगाल की छवि एंटी इंडस्ट्री स्टेट की बनी. उद्योग धंधे वहां जाने से कतराने लगे. इसका नुकसान ममता बनर्जी को हुआ. राज्य के युवाओं को नौकरी के लिए पलायन करना पड़ा. राज्य में कोई भी ढंग का औद्योगिक केंद्र डेवलप नहीं हो सका. बीजेपी ने इसको भी अपने मैनिफेस्टों और रैलियों में मुद्दा बनाया. सत्ता आने पर राज्य में इंडस्ट्री लाने और युवाओं को रोजगार देने का वादा उनके हर नेता और हर रैली का एक अहम मुद्दा रहा.

इसके अलावा बंगाल के सरकारी कर्मचारियों में सातवें वेतन आयोग के नहीं लागू होने से काफी नाराजगी थी. बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया. इसके अलावा सरकार भर्ती में खाली पदों को लेकर युवा वोटर्स में काफी नाराजगी थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने परिवर्तन यात्रा की शुरुआत के दौरान, सत्ता में आने पर 45 दिनों में सातवें वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने और सरकारी नौकरियों में खाली पोस्ट भरने का वादा दिया.

हिंदुत्व का नैरेटिव चल निकला 

बीजेपी ने बंगाल चुनाव में बड़ी चतुराई से हिंदुत्व का कार्ड खेला. 2021 के चुनाव में बीजेपी ने आक्रमक ढंग से ध्रुवीकरण की कोशिश की, लेकिन असफल रही. इस बार पार्टी ने रणनीति बदल दी. सीनियर राजनीतिक विश्लेषक मनोज मुकुल के मुताबिक, “इस चुनाव के लिए आरएसएस ने करीब दो लाख बैठकें कीं. इसके लिए ग्रामीण इलाकों को फोकस में रखा. सरकारी कर्मचारी और लेफ्ट की विचारधारा से प्रभावित परिवारों को हिंदूवादी विचार से जोड़ने की कोशिश की. बीजेपी ने चुनाव के लिए 1 लाख 30 हजार से ज्यादा वॉटसऐप ग्रुप बनाए थे. इन ग्रुपों में बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रही हिंसा से जुड़ी पुष्ट और अपुष्ट घटनाओं के इर्द-गिर्द वीडियो छोटे-छोटे वीडियो सर्कुलेट हुए. इसमें मुस्लिम घुसपैठियों को निशाना बनाने वाले वीडियोज शामिल थे.”

आम तौर पर माना जाता है कि बंगाल में जाति की राजनीति का ज्यादा असर नहीं होता. लेकिन बीजेपी ने हिंदुत्व के फोल्ड में ओबीसी और दलित जातियों को जोड़ने की कवायद शुरू की. पार्टी ने मतुआ, राजवंशी, यादव, गोप और सदगोप जैसी पार्टियों के बीच आउटरीच किया. जंगलमहल इलाके में कुर्मी वोटर्स का ठीक-ठाक प्रभाव है. इनको अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी ने उनकी भाषा 'कुड़माली' को आठवीं अनुसूची में जोड़ने का वादा कर दिया. चुनाव नतीजों में इसका असर भी होता दिखा है.

बाहरी वर्सेज बंगाली नैरेटिव को ध्वस्त किया

ममता बनर्जी के बंगाली नैरेटिव को ध्वस्त करने के लिए बीजेपी ने इस बार अलग रणनीति अपनाई. उन मुद्दों को बिल्कुल हवा नहीं दी जिससे दीदी को अस्मिता सवाल उठाने का मौका मिलता. मैनिफेस्टो जारी करने से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करने तक बीजेपी ने हर जगह बंगाली लीडरशिप को आगे किया. उनसे ही एजेंडा सेट करवाया. फुटबॉल क्लब से युवाओं को जोड़ने से लेकर झालमुरी और मछली हर तस्वीर में संदेश था. ममता बनर्जी ने खानपान में हस्तक्षेप का आरोप लगाया तो पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य से लेकर केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को मछली खिलवा दी. वहीं पीएम मोदी खुद कोलकाता के थंथानिया कालीबाड़ी मंदिर पहुंच गए. जहां प्रसाद के तौर पर मछली चढ़ाने की परंपरा रही है.

सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव का माइक्रो मैनेजमेंट 

साल 2021 में बीजेपी बंगाल हारी तो कहा गया पार्टी के पास जमीन पर मजबूत संगठन नहीं था. बीजेपी ने संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी सुनील बंसल को दी. अगस्त 2022 में उनको बंगाल का प्रभारी बनाया गया. प्रभारी बनने के बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल में जमीन पर पार्टी को खड़ा किया है. बंसल सभी 294 विधानसभाओं में गए. वहां मंडल लेवल पर मीटिंग की. पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात की. और बहुत से इलाकों में मंडल नहीं बूथ लेवल पर बैठकें कीं. 

इंडिया टुडे मैग्जीन के जनर्लिस्ट आर्कमॉय दत्ता बताते हैं,

बंसल ने करीब 60 हजार बूथों पर ये सुनिश्चित किया कि बूथ लेवल पर बीजेपी की कमेटी रहे. उसमें कार्यकर्ता रहें. क्योंकि यही कार्यकर्ता चुनाव के समय पार्टी के पोलिंग एजेंट, बूथ एजेंट बनते हैं.

सीनियर पत्रकार मनोज मुकुल के मुताबिक,

बीजेपी ने देश के  अलग-अलग हिस्सों से करीब दस हजार कार्यकर्ताओं को बंगाल की ड्यूटी पर लगाया. एक विधानसभा में करीब 30 से 40 दूसरे राज्यों के वर्कर की टीम. इसमें संगठन के पदाधिकारी से लेकर सांसद, विधायक सब लगे. करीब 45 से 50 दिनों का टास्क पूरा किया. इसके लिए भाषा या क्षेत्र का बाउंडेशन नहीं किया. हर टीम में एक दो बांग्ला भाषी को रखा. बिहार, झारखंड, असम, पूर्वोत्तर के रहने वाले सीमावर्ती कार्यकर्ताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में ड्यूटी दी.

इस फेहरिस्त में एक और नाम पार्टी के चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव का है. हिंदू वोट को एकुजट करने का काम उन्होंने अपने जिम्मे संभाला. यादव ने ही अलग-अलग जातियों के हिंदू वोटर्स को कनेक्ट किया. यादव, गोप, सदगोप, कुर्मी...अलग-अलग जातियों के लोगों तक पहुंचे. इसके अलावा एक और बेहद मजेदार चीज. उन्होंने बूथ लेवल पर पार्टी के नेटवर्क को मजबूत करने का अभियान चलाया. बूथ एजेंट बनाने के लिए उन्होंने मौखिक और लिखित परीक्षाएं भी लीं. यादव ने पार्टी का नेटवर्क तो मजबूत किया ही लोगों से टीएमसी का डर भी निकाला. बीजेपी ने वोटर्स को पोलिंग स्टेशन तक आने के लिए आश्वस्त किया.

अमित शाह का नेतृत्व 

पार्टी का दूसरा सबसे बड़ा और संगठन का सबसे बड़ा नेता चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं के बीच रहे इससे बड़ा हौसला और क्या होगा. अमित शाह ने ऐसा ही किया. वे 15 दिन तक बंगाल में डटे रहे. और वॉर रूम में बैठकर कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर पार्टी को जिताने की रणनीति बनाते रहे. अमित शाह के बारे में लोकल पत्रकार बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के दिमाग में इस बात को बैठा दिया कि बीजेपी चुनाव जीत रही है. इससे बीजेपी को बड़ा फायदा मिला. एक तो टीएमसी की गुंडई का डर निकल गया. दूसरा वोटर्स को बूथ तक लाने का बूस्ट अप डोज मिला.

महिला वोटर्स में सेंध लगाई

महिला वोटर्स ममता बनर्जी की सफलता के पीछे का सबसे बड़ा कारण मानी जाती रही हैं. लेकिन बीजेपी ने इस वोट में भी सेंधमारी की. दीदी ने पिछले दस सालों में महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर वाली कई योजनाएं लाईं. इसमें लक्ष्मी भंडार और कन्या श्री जैसी योजनाएं शामिल हैं. लेकिन बीजेपी ने महिलाओं की सुरक्षा को बड़ा मुद्दा बनाया. 

आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए रेप और हत्या का मुद्दा उठाया और पीड़िता की मां को चुनाव में टिकट भी दे दिया. इसके अलावा महिलाओं के लिए कई योजनाओं की घोषणा की. अपने घोषणापत्र में महिलाओं के लिए मासिक  3 हजार रुपये की नकद सहायता, मुफ्त बस यात्रा, सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत आरक्षण और महिला सुरक्षा के लिए दुर्गा सुरक्षा दस्ता बनाने का वादा  किया.

बीजेपी ने ममता बनर्जी के लिए कोई मोर्चा खुला नहीं छोड़ा.

वीडियो: पश्चिम बंगाल चुनाव में BJP के किन नारों ने TMC को हराया?

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