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भवानीपुर तो सेफ सीट थी, फिर कैसे हार गईं ममता बनर्जी?

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने टीएमसी को हराकर सत्ता से बेदखल कर दिया. लेकिन पार्टी के लिए सबसे बड़ा दुख यही नहीं है. भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी भी सुवेंदु अधिकारी से चुनाव हार गईं.

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ममता बनर्जी अपनी सेफ सीट भी हार गईं. (फोटो- India Today)

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने ममता बनर्जी को दोहरा झटका दिया है. उनसे बंगाल की सत्ता तो छीन ही ली. भवानीपुर सीट से भी ‘दीदी’ का पत्ता साफ कर दिया. भवानीपुर वही सीट है, जिसने पिछले चुनाव में नंदीग्राम से हारीं ममता बनर्जी को ‘शरण’ दी थी. यहां हुए उपचुनाव में विधायक बनकर ही ममता मुख्यमंत्री बनीं. 

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भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र ममता बनर्जी का गढ़ था. ये उनकी अपनी विधानसभा सीट थी, जिसके अंदर आने वाले कालीघाट इलाके में उनका घर भी है. यहीं से वह यूथ कांग्रेस के नेता के तौर पर उभरीं और अपनी राजनीति को ऐसा मजबूत किया कि तीन बार पश्चिम बंगाल की सीएम बनीं. 

लेकिन ममता बनर्जी वही भवानीपुर हार गईं. हारीं भी किससे? सुवेंदु अधिकारी से. वह जो कभी उनके पक्के साथी हुआ करते थे. 2021 के चुनाव से पहले वो उनका साथ छोड़ गए. गुस्साई दीदी ने सबक सिखाने के लिए नंदीग्राम की उनकी सीट से पर्चा भर दिया, लेकिन हार गईं. इस बार थोड़ी सावधानी रखी गई. ममता बनर्जी सिर्फ भवानीपुर से मैदान में उतरीं. लेकिन अधिकारी उनका पीछा करते हुए यहां भी आ गए. 

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सोमवार, 4 मई को जब नतीजे आए तब ममता बनर्जी को ऐसा झटका लगा कि शायद ही इस टीस से वह उबर पाएं. 15 हजार 105 वोटों से सुवेंदु अधिकारी ने उन्हें चुनाव हरा दिया. वो नंदीग्राम से भी जीत गए. 

भवानीपुर में दिन भर मुकाबला काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा. शुरुआत में पोस्टल बैलेट की गिनती में सुवेंदु अधिकारी ममता से आगे निकल गए थे. फिर ममता ने वापसी की और 7वें राउंड के आसपास बढ़त बना ली. एक समय तो वे 19 हजार से ज्यादा वोटों से आगे थीं लेकिन शाम 6:30 बजे तक उनकी बढ़त घटकर सिर्फ 2,900 वोट रह गई. रात 9 बजे तक 20 में से 18 राउंड की गिनती पूरी होने पर सुवेंदु अधिकारी 11 हजार से ज्यादा वोटों से आगे हो गए. आखिरकार, अंतिम नतीजों में अधिकारी ने ममता बनर्जी को करीब 15,000 वोटों से हरा दिया.

अपने गढ़ में ममता की इस हार के पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं.

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दक्षिण कोलकाता की भवानीपुर सीट पर हर समुदाय के लोग रहते हैं. करीब 42 फीसदी वोटर बंगाली और लगभग 34 फीसदी गैर-बंगाली हिंदू हैं. करीब एक चौथाई आबादी मुस्लिम वोटरों की होगी. इसके अलावा बिहार, ओडिशा और झारखंड से आए प्रवासियों की भी अच्छी-खासी मौजूदगी यहां है. इंडिया टुडे से जुड़े सुशीम मुकुल की रिपोर्ट के अनुसार, यहां इस बार सिर्फ गैर-बंगाली व्यापारी समुदाय ही नहीं, बल्कि बंगाली हिंदू वोटरों का भी एक हिस्सा सुवेंदु अधिकारी के पक्ष में जाता दिखा, जिसने मुकाबले का रुख बदल दिया.

रिपोर्ट के मुताबिक, ममता की हार में शहरी मिडिल क्लास के लोगों को बड़ा रोल है. वह तृणमूल सरकार के कामकाज को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे. इसके अलावा, अपार्टमेंट कल्चर के बढ़ते चलन और गैर-बंगाली वोटरों की संख्या बढ़ने से ममता का वो पारंपरिक ‘मोहल्ला नेटवर्क’ भी कमजोर पड़ा, जो कभी उन्हें ‘घर की बेटी’ मानता था.

इसी बीच आया SIR. यानी Special Intensive Revision. यानी वोटर लिस्ट की स्पेशल टेस्टिंग. ये भवानीपुर के सबसे विवादित मुद्दों में से एक बन गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रक्रिया में 47 हजार से 51 हजार नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए. इनमें बड़ी संख्या मुस्लिम वोटरों की बताई गई. ये टीएमसी का कोर वोट बैंक माने जाते हैं. 

TMC ने आरोप लगाया कि एसआईआर ने उनके कोर वोटर्स को निशाना बनाया है. उन्हें वोट देने से वंचित किया गया है. चुनाव आयोग का कहना था कि यह प्रक्रिया डुप्लीकेट और अयोग्य नाम हटाने के लिए की गई थी. बहस अपनी जगह है, लेकिन इसका असर जमीन पर दिखा. भवानीपुर में भी. 

इसके अलावा, बीजेपी ने भवानीपुर को नाक की लड़ाई बना लिया. इस सीट से अक्सर बीजेपी हल्के उम्मीदवार उतारती थी. लेकिन इस बार अपने ट्रंप कार्ड सुवेंदु अधिकारी को ही उतार दिया. वो नेता जो नंदीग्राम में एक बार ममता को शिकस्त दे चुका है. महीनों तक पार्टी ने सीट की बारीकी से रणनीति तैयार की. बंगाली हिंदू और हिंदी बोलने वाले व्यापारी समुदाय को साधने पर खास फोकस किया. गैर-मुस्लिम वोटों का एकजुट किया. अधिकारी के कद का भी फायदा उठाया. नतीजा सामने है. ममता अपना गढ़ खो बैठीं.

ममता बनर्जी इसलिए भी हारीं क्योंकि उनका कैंपेन पुराने फॉर्मूले पर टिका रहा. वेलफेयर योजनाएं गिनाना. लोगों से सीधा संपर्क और ‘घर की बेटी’ वाली भावनात्मक अपील, लेकिन प्रचार के दौरान एक दिलचस्प घटना भी हुई. अपनी सीट पर ममता एक रैली में भाषण बीच में छोड़कर मंच से उतर गईं. उन्होंने आरोप लगाया कि पास में BJP की रैली में शोर की वजह से उनका कार्यक्रम बाधित हो रहा है. उन्होंने मंच से ही कहा कि अगर हो सके तो मुझे वोट देना. मुझे मीटिंग तक नहीं करने दी जा रही है. इसके बाद वो मंच छोड़कर चली गईं.

उनके इस ‘अगर हो सके’ वाले बयान और अचानक मंच छोड़ने से कई सवाल उठे. एक तो ये कि क्या ममता को अपनी सीट पर भरोसा नहीं रहा था? या वो खुद को पीड़ित दिखाकर सहानुभूति बटोरना चाहती थीं? सोमवार, 4 मई के नतीजों ने बता दिया कि अनुभवी नेता ममता बनर्जी शायद आने वाले हालात को भांप चुकी थीं. 

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