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थाली से मटन-चिकन गायब, चाय भी हुई महंगी, कैसे बेहाल हुई पाकिस्तान की इकोनॉमी?

पाकिस्तान में पिछले 6 साल में करीब सभी प्रमुख फूड कैटेगरी की खपत घटी है. वहां के लोग गेहूं, चावल, मांस, दूध और चाय का कम इस्तेमाल कर रहे हैं. पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में बेरोजगारी और महंगाई भी बड़ी समस्या है.

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पाकिस्तान में चाय और दूध का भी इस्तेमाल घटा है (फोटो क्रेडिट: India Today)

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  • पाकिस्तान में खाद्य संकट गहराने के कारण घरेलू बजट प्रभावित हुआ है, जिससे मांस, दूध, गेहूं, चावल और चाय जैसी जरूरी खाने की वस्तुओं की खपत में गिरावट आई है।
  • पिछले छह वर्षों में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि और आर्थिक असुरक्षा के कारण पाकिस्तानी परिवारों की खपत में कमी आई है, जिससे मध्यम से गंभीर खाद्य असुरक्षा 24.35% हो गई है।
  • शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में खाद्य सामग्री की कम खपत के कारण परिवार वनस्पति घी जैसी वस्तुओं की खपत बढ़ा रहे हैं, जबकि कुल मिलाकर खाद्य असुरक्षा की स्थिति और गंभीर होती जा रही है।

पाकिस्तान का खाद्य संकट गहराता जा रहा है. इंडिया टुडे में छपी एक खबर में पाकिस्तान टुडे के हवाले से बताया गया है कि अब यह संकट पड़ोसी देश के लोगों की थाली पर साफ दिखने लगा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने से घरेलू बजट बिगड़ा है. इसके चलते लोग मांस, दूध और दूसरी रोज की जरूरत वाली चीजों में कटौती कर रहे हैं.

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पाकिस्तान सांख्यिकी ब्यूरो (PBS) के आंकड़ों का हवाला देते हुए इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले 6 साल में करीब सभी प्रमुख फूड कैटेगरी की खपत घटी है. पाकिस्तान के लोग गेहूं, चावल, मांस, दूध और चाय का कम इस्तेमाल कर रहे हैं.

रिपोर्ट में बताया गया है कि वित्त वर्ष 2024-25 में मध्यम से गंभीर खाद्य असुरक्षा की कैटेगरी में आने वाले परिवारों की संख्या 24.35% हो गई है. वित्त वर्ष 2018-19 में यह आंकड़ा 15.92% था. इसी दौरान गंभीर खाद्य असुरक्षा दोगुने से भी अधिक बढ़कर 2.37% से 5.04% हो गई. इन आंकड़ों से पता चलता है कि पाकिस्तान के नागरिकों के लिए अब खाना-पीना भी मुश्किल होता जा रहा है. उन्हें अपने रोजमर्रा के खाने तक में कटौती करनी पड़ रही है. 

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गेहूं, चावल और मांस का कम इस्तेमाल

पाकिस्तान टुडे की तरफ बताए गए आंकड़ों के मुताबिक परिवार गेहूं और चावल कम खा रहे हैं. मांस भी कम पका रहे हैं. इसके अलावा, दूध और चाय तक का कम इस्तेमाल कर रहे हैं . इसके चलते इन चीजों की खपत में भी गिरावट आई है.

वहीं, वनस्पति घी की मासिक खपत में 81% का इजाफा हुआ है. पहले परिवारों में 690 ग्राम वनस्पति घी इस्तेमाल होता था लेकिन अब बढ़कर 1.25 किलोग्राम हो गया है. हालांकि, केवल खपत के आंकड़ों से यह साफ नहीं होता कि परिवार अधिक घी क्यों खरीद रहे हैं.

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शहर भी संकट से जूझ रहे हैं

ग्रामीण क्षेत्रों में खाने-पीने में गिरावट साफ दिखाई देती है, लेकिन यह बिगड़ती स्थिति केवल गांवों तक ही सीमित नहीं है. शहरी परिवारों द्वारा कई खाद्य श्रेणियों में कम खपत की भी जानकारी सामने आ रही है. इससे पता चलता है कि बढ़ती खाद्य लागत और घरेलू बजट शहरी परिवारों को प्रभावित कर रहा है.

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