बारिश का मौसम कैलेंडर में सितंबर तक चलता है, लेकिन इस बार मानसून की कहानी थोड़ी अलग है. अगस्त में देशभर में सामान्य से करीब 16% कम बारिश हुई और अब भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD ने सितंबर में भी बारिश सामान्य से कम रहने का अनुमान दिया है. सितंबर मानसून का आखिरी महीना होता है, इसलिए अब चिंता सिर्फ खेत तक सीमित नहीं है. सवाल खरीफ की पैदावार, रबी की बुवाई, ग्रामीण कमाई और आने वाले महीनों में खाने-पीने की चीजों की कीमतों का भी है.
अगस्त में 16% कम बारिश, सितंबर भी सूखा! किसान की फसल से आपकी थाली तक कितना असर पड़ेगा?
India September Rainfall 2026: अगस्त में देश में सामान्य से 16% कम बारिश और सितंबर में भी सामान्य से कम बारिश के IMD अनुमान ने खरीफ फसलों, रबी की बुवाई, किसानों की लागत, ग्रामीण आय और खाद्य महंगाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि कम बारिश का कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों से लेकर आपकी रसोई तक क्या असर हो सकता है.

IMD के मुताबिक सितंबर में देशभर में बारिश लंबी अवधि का औसत (Long Period Average) यानी LPA के 91% से कम रहने की संभावना है. इसका मतलब ये नहीं है कि पूरे देश में हर जगह सूखा पड़ेगा. मौसम विभाग के मुताबिक कुछ इलाकों, खासकर उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, पूर्व, पूर्व-मध्य और दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय हिस्सों में सामान्य या सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है. यानी असली कहानी बारिश की कमी के साथ-साथ उसके असमान बंटवारे की भी है.
अगस्त में कितना पानी कम बरसा?
31 अगस्त तक देश में जून से अगस्त के दौरान कुल बारिश सामान्य से करीब 14% कम रही. अगस्त अकेले में बारिश की कमी (rainfall deficit) 16% से ज्यादा रहा. जून में कमी करीब 35% तक पहुंच गई थी, हालांकि जुलाई में बारिश सामान्य रही. IMD के आंकड़ों के मुताबिक 741 जिलों में से 312 जिलों में अगस्त के अंत तक बारिश सामान्य से कम रही, जबकि 38 जिलों में बड़ी कमी दर्ज की गई.
इसका एक और महत्वपूर्ण पहलू है. देश में बारिश का औसत आंकड़ा देखकर पूरी तस्वीर समझ में नहीं आती. एक जगह बहुत ज्यादा बारिश हो सकती है और दूसरी जगह खेत पानी के लिए तरस सकते हैं. किसान के लिए खेत के ऊपर बादल का गुजरना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना सही समय पर सही मात्रा में पानी मिलना.
सितंबर की बारिश खरीफ के लिए इतनी जरूरी क्यों है?
कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी कई खरीफ फसलें सितंबर में अपने महत्वपूर्ण विकास चरण में होती हैं. Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक इन फसलों में से कई अब फली बनने (pod formation) और फसल पकने (development) जैसे अहम चरणों में प्रवेश कर रही हैं. इस दौरान बारिश कम हुई तो पैदावार प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है.
यानी किसान के लिए समस्या सिर्फ इतनी नहीं है कि फसल बो दी गई या नहीं. असली सवाल ये है कि खेत में खड़ी फसल को अब कितना पानी मिलेगा. बारिश कम होने पर जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है, वो कुछ हद तक इसकी भरपाई कर सकते हैं. लेकिन जहां सिंचाई की सुविधा सीमित है, वहां अतिरिक्त बारिश की जरूरत ज्यादा महसूस होगी.
यहीं से किसान की लागत भी बढ़ सकती है. Times of India ने IMD के हवाले से बताया है कि सितंबर में कम बारिश का मतलब खड़ी फसलों की सिंचाई पर किसानों का खर्च बढ़ना हो सकता है.
फिर रबी की फसल का क्या होगा?
सितंबर की बारिश का एक दूसरा काम भी है. ये मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करती है. यही soil moisture आगे चलकर रबी की फसलों की बुवाई के लिए महत्वपूर्ण होती है.
गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों की बुवाई के समय अगर खेत में पर्याप्त नमी नहीं हुई तो किसान को सिंचाई पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है. Reuters से बातचीत में फिलिप कैपिटल इंडिया (Phillip Capital India) की कमोडिटी रिसर्च विशेषज्ञ अश्विनी बंसोड ने भी कहा कि,
सितंबर की बारिश गेहूं, चना और रेपसीड जैसी रबी फसलों की बुवाई के लिए महत्वपूर्ण है. यानी कमजोर सितंबर का असर सिर्फ खरीफ की फसल काटने तक नहीं रहेगा. इसका असर अगली फसल के खेत में उतरने तक जा सकता है.
अब आपकी थाली तक कैसे पहुंचेगी कम बारिश?
अब आते हैं उस सवाल पर जो शहर में बैठे आदमी के लिए सबसे ज्यादा मायने रखता है. सब्जी, दाल और खाने के तेल की कीमत का बारिश से क्या रिश्ता है?
सीधा रिश्ता है, लेकिन इसे तुरंत कीमत बढ़ने की गारंटी नहीं समझना चाहिए. अगर बारिश की कमी से किसी फसल की पैदावार घटती है और बाजार में उस फसल की उपलब्धता कम होती है, तो कीमतों पर ऊपर की तरफ दबाव बन सकता है. खासकर दालों, तिलहनों और कुछ सब्जियों में मौसम का असर अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दे सकता है.
अगर किसान की लागत सिंचाई और दूसरे इनपुट पर बढ़ती है और पैदावार भी कमजोर रहती है, तो ग्रामीण आय पर दोहरा दबाव पड़ सकता है. कम उत्पादन का मतलब कम बिक्री और ज्यादा लागत का मतलब कम मार्जिन. इसका असर ग्रामीण बाजार में खर्च करने की क्षमता पर भी पड़ सकता है.
अल नीनो कितना बड़ा विलेन है?
इस बार मौसम की कहानी में अल नीनो भी मौजूद है. IMD के मुताबिक फिलहाल equatorial Pacific में मजबूत अल नीनो जैसी परिस्थितियां बनी हुई हैं और समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा है. IMD प्रमुख मृत्युंजय महापात्रा के मुताबिक,
ये परिस्थितियां आने वाले महीनों में और मजबूत हो सकती हैं.
अल नीनो का मतलब हर बार भारत में सूखा पड़ेगा, ऐसा नहीं है. लेकिन ऐतिहासिक रूप से इसका संबंध भारत में कमजोर मानसून की परिस्थितियों से रहा है. इस बार भी IMD ने इसे सितंबर की कमजोर बारिश के पीछे मौजूद महत्वपूर्ण मौसम संबंधी कारकों में गिना है.
कौन से इलाके ज्यादा चिंता में हैं?
पूरे देश को एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता. उदाहरण के लिए पंजाब में 31 अगस्त तक मानसून की कुल वर्षा (cumulative rainfall) सामान्य से 36% कम थी. हरियाणा में कमी 19% और हिमाचल प्रदेश में 9% थी. अगस्त में पंजाब में बारिश 39% कम रही.
दूसरी तरफ IMD ने सितंबर में देश के कुछ हिस्सों में सामान्य से ज्यादा बारिश की संभावना भी जताई है. इसलिए किसी एक राज्य को पूरे देश की तस्वीर मान लेना सही नहीं होगा.
किसान अभी क्या कर सकता है?
ऐसे समय में किसान के लिए सबसे जरूरी है कि स्थानीय मौसम पूर्वानुमान और कृषि विभाग की सलाह को देखकर सिंचाई और खेत प्रबंधन के फैसले लिए जाएं. जहां सिंचाई उपलब्ध है, वहां पानी का इस्तेमाल फसल की जरूरत और मिट्टी की नमी देखकर करना ज्यादा जरूरी होगा. किसान को बिना स्थानीय सलाह के सिर्फ राष्ट्रीय स्तर के पूर्वानुमान के आधार पर कोई बड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए.
सरकार की तरफ से भी चुनौती दोहरी है. एक तरफ खड़ी फसल और ग्रामीण आय को बचाना है, दूसरी तरफ अगर उत्पादन प्रभावित होता है तो खाद्य कीमतों को काबू में रखना है. जरूरत पड़ने पर सिंचाई, फसल बीमा, कृषि इनपुट सहायता, भंडारण और बाजार में पर्याप्त उपलब्धता जैसे उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन कौन सा कदम कब लिया जाएगा, ये फसल, राज्य और स्थानीय नुकसान की स्थिति पर निर्भर करेगा.
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असली चिंता बारिश की कमी से ज्यादा उसके असर की है
अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि सितंबर की कम बारिश से देश में खाद्य महंगाई जरूर बढ़ेगी या किसी खास फसल की पैदावार कितनी गिरेगी. लेकिन जोखिम साफ दिखाई दे रहा है. कमजोर सितंबर खरीफ फसलों की अंतिम बढ़वार को प्रभावित कर सकता है, मिट्टी की नमी कम कर सकता है और रबी की बुवाई को महंगा बना सकता है.
और अगर इसका असर उत्पादन पर पड़ता है, तो किसान से लेकर मंडी, मंडी से लेकर थोक बाजार और वहां से आपकी रसोई तक इसकी एक पूरी चेन रिएक्शन बन सकती है. इसलिए इस समय सवाल सिर्फ ये नहीं है कि सितंबर में बादल कितने आएंगे. सवाल ये है कि जो बारिश आएगी, वो कहां होगी, कब होगी और कितनी होगी.
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