साल 2026 खत्म होने में करीब 3 महीने बाकी हैं. ऐसा लग रहा है कि ये NIFTY इंडेक्स के लिए पिछले 15 वर्षों में सबसे खराब प्रदर्शन वाला साल रहने वाला है. इस साल की शुरुआत से अब तक NIFTY इंडेक्स करीब 13% गिर चुका है. इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक अगर यह गिरावट इस साल के आखिर यानी दिसंबर तक जारी रहती है, तो यह NIFTY का साल 2011 के बाद से सबसे कमजोर साल साबित होगा. साल 2011 में NIFTY 50 इंडेक्स 24.6% गिर गया था.
शेयर बाजार को इन सबने 'लूटा', अगले 3 महीने वापसी की कितनी उम्मीद?
पिछले दो साल में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने करीब 5.37 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए हैं. इससे पिछले 8 साल में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में जितना पैसा लगाया था वह करीब-करीब खत्म हो गया.

NIFTY की गिरावट साल की शुरुआत से ही दिखाई दी. साल 2026 की शुरुआती दिन महीनों में NIFTY 15% तक गिर गया. हालांकि, पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में 7% की अच्छी रिकवरी आई. लेकिन दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में फिर से NIFTY इंडेक्स लगभग 5% लुढ़क गया.
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NIFTY में इस साल आई भारी गिरावट की कई वजहें हैं. शुरुआत में भारतीय शेयरों की वैल्यूएशन काफी ज्यादा थी. ऊपर से विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से जमकर पैसा निकाला. ईरान-अमेरिका की लड़ाई ने बाजार की गिरावट में आग में घी का काम किया.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और कंपनियों की कमाई बढ़ने को लेकर जारी चिंता ने धीरे-धीरे उस प्रीमियम को खत्म कर दिया है जो निवेशक भारतीय शेयरों के लिए भुगतान करने को तैयार थे. NIFTY की इस गिरावट में विदेशी निवेश सबसे बड़ा प्रेशर पॉइंट रहा है.
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अगस्त 2026 तक भारतीय शेयरों में रिकॉर्ड 24.6 अरब डॉलर (2.36 लाख करोड़ रुपये) कीमत के शेयर बेचे. अगस्त की शुरुआत में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में निवेश करना चालू कर दिया था, लेकिन बाद में वे शेयर बेचने लगे.
विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पैसा निकलकर ताइवान और दक्षिण कोरिया के शेयर बाजारों में चला गया. विदेशों निवेशकों ने एआई से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में खूब पैसा लगाया. जाहिर है इन विदेशी निवेशकों को सेमीकंडक्टर और टेक शेयरों ने कहीं अधिक मजबूत रिटर्न दिया था.
सितंबर में बिकवाली फिर से शुरू हो गई. कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड और डॉलर में बढ़ोतरी के चलते महीने के पहले पखवाड़े (1 सिंतबर से 15 सितंबर) में विदेशी निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयरों से 13,138 करोड़ रुपये निकाल लिए. इस तरह से साल 2026 की शुरुआत से लेकर अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से 2.37 लाख करोड़ रुपये निकाले.
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…तो हाल और भी बुरा होतामोतीलाल ओसवाल का अनुमान है कि विदेशी निवेशकों ने पिछले दो साल में लगभग 56 अरब डॉलर ( करीब 5.37 लाख करोड़ रुपये) निकाल लिए हैं. इससे पिछले 8 साल में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में जितना पैसा लगाया था वह करीब-करीब खत्म हो गया.
हालांकि, भारतीय संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने इस कमी को काफी हद तक पूरा किया है. इसी अवधि में भारतीय निवेशकों ने शेयर बाजार में रिकॉर्ड 177 अरब डॉलर (करीब 17 लाख करोड़ रुपये) का निवेश किया है. इसके अलावा म्यूचुअल फंड एसआईपी से भी सपोर्ट मिला. अगर भारतीय निवेशकों ने पैसा निकाला होता तो बाजार में गिरावट और भी गंभीर हो सकती थी.
आईटी शेयरों ने खूब रुलायाभारतीय शेयर बाजार को दूसरा झटका ईरान युद्ध से लगा. मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण इस साल की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से इजाफा हुआ. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने मुद्रास्फीति, चालू खाता और कंपनियों के मार्जिन पर खतरा पैदा कर दिया, साथ ही रुपये और बॉन्ड यील्ड पर भी दबाव डाला.
सितंबर में भी ब्रेंट क्रूड लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, जबकि रुपया डॉलर के मुकाबले 95-96 के आसपास कारोबार कर रहा है. तेल की ऊंची कीमतों ने मुद्रास्फीति और ब्याज दरों को लेकर चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं, ठीक उसी समय जब निवेशक इनकम में बेहतर सुधार की उम्मीद कर रहे थे.
भारत के आईटी क्षेत्र ने भी इसमें और खलल डाल दिया. इस साल की शुरुआत में टेक शेयरों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक NIFTY आईटी इंडेक्स इस साल अब तक 21% से अधिक गिर चुका है.
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क्या NIFTY में तेजी लौटने की संभावना है?मोतीलाल ओसवाल का मानना है कि शेयरों की वैल्यूएशन काफी सस्ती हो गई है. कंपनियों की कमाई में सुधार, मजबूत घरेलू निवेश और आर्थिक ग्रोथ बढ़िया रहने से शेयर बाजार का रिस्क प्रॉफिट रेश्यो बेहतर हुआ है. NIFTY में शामिल 50 कंपनियों के फायदे में जून तिमाही में औसतन 18% का इजाफा हुआ है. यह पिछले 10 तिमाहियों में सबसे तेज बढ़ोतरी है. ब्रोकरेज फर्मों ने आगे भी कमाई बढ़ने की बात कही है.
जेफरीज ने भी पाया है कि भारत में कम निवेश करने के बावजूद विदेशी निवेशकों का रुझान धीरे-धीरे सुधर रहा है. ब्रोकरेज फर्म वित्तीय क्षेत्र, बड़ी पूंजी वाली कंपनियों (लार्ज कैप) में निवेश को आकर्षक मानती है. निवेशकों की रुचि पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर, नए जमाने की मैन्युफैक्चरिंग और उपभोक्ता इंटरनेट कंपनियों की ओर बढ़ रही है.
वहीं, इस मामले में कोटक इक्विटीज का नजरिया थोड़ा सतर्क है. इस ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि दुनिया के शेयर बाजारों की कीमतें पहले ही काफी ऊंची हैं. ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतें या बॉन्ड यील्ड फिर बढ़ती हैं, तो भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का जोखिम बढ़ सकता है. इसका असर कंपनियों की कमाई में सुधार पर भी भारी पड़ सकता है.
कहने का मतलब ये है कि साल 2026 के आखिरी तीन महीनों में शेयर बाजार के सामने कुछ सकारात्मक संकेत हैं, जैसे कि कंपनियों की कमाई में सुधार और घरेलू निवेशकों से मिलने वाला पैसा. लेकिन दूसरी तरफ विदेशी निवेशक अभी मजबूती से वापस नहीं लौटे हैं, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें चिंता बनी हुई हैं और रुपया दबाव में है.
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