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775 अरब डॉलर के इंपोर्ट बिल को घटाने की तैयारी, इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर दवाओं तक ये चीजें होंगी महंगी?

India's Import Cut: चीन से आने वाले सामान पर निर्भरता कम होगी? मोदी सरकार 100 से ज्यादा इंपोर्टेड प्रोडक्ट्स को भारत में बनाने की तैयारी में है. जानिए कैसे बदलेगी सप्लाई चेन, क्यों जरूरी है आत्मनिर्भर भारत का ये नया प्लान और इसका आपकी जेब पर क्या असर पड़ेगा.

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इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप, खाद से लेकर दवाओं तक बदलेगा खेल (फोटो- My Gov)

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  • मोदी सरकार ने 100 से ज्यादा जरूरी सामानों की पहचान के लिए टास्क फोर्स बनाई है ताकि भारत में उत्पादन बढ़ाकर विदेशी निर्भरता कम की जा सके और सप्लाई चेन मजबूत हो सके।
  • कोरोना महामारी और वैश्विक तनाव के कारण चीन समेत विदेशों पर भारत की इंपोर्ट निर्भरता ने व्यापार घाटा और सप्लाई चेन में जोखिम की गंभीरता दिखायी।
  • सरकार उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना लागू कर विदेशी कंपनियों को निवेश और टेक्नोलॉजी लाने के लिए प्रोत्साहित करेगी जिससे आयात पर निर्भरता में कमी आएगी।

क्या आपके स्मार्टफोन की कीमत, खेत में डाली जाने वाली खाद या कार में लगने वाले किसी छोटे से पार्ट का रिश्ता ईरान-इजरायल तनाव, चीन की सप्लाई चेन और ग्लोबल मार्केट की हलचल से हो सकता है? सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन आज की दुनिया में किसी एक कोने में शुरू हुआ संकट कुछ ही दिनों में दूसरे देशों की जेब पर असर डाल देता है. कभी कच्चे तेल के दाम बढ़ जाते हैं, कभी डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव आता है और कभी जरूरी सामानों की सप्लाई प्रभावित हो जाती है.

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इसी वैश्विक अनिश्चितता से निपटने के लिए मोदी सरकार अब एक बड़े आर्थिक प्लान पर काम कर रही है. सरकार उन 100 से ज्यादा जरूरी सामानों की पहचान कर रही है, जिनके लिए भारत अभी बड़े पैमाने पर दूसरे देशों पर निर्भर है. लक्ष्य साफ है, इन चीजों का उत्पादन भारत में बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और देश की सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत बनाना.

क्यों पड़ी इस कदम की जरूरत?

ये सिर्फ 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देने की कोशिश नहीं है, बल्कि बदलती दुनिया में भारत की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी रणनीति है. कोरोना महामारी के दौरान जब ग्लोबल सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई थी, तब दुनिया के कई देशों को एहसास हुआ कि किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता कितना बड़ा जोखिम बन सकती है.

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भारत ने भी देखा कि चीन से आने वाले कच्चे माल, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और जरूरी औद्योगिक सामानों की सप्लाई में थोड़ी सी रुकावट का असर ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ सकता है. यही वजह है कि सरकार अब उन सेक्टरों को मजबूत करना चाहती है, जहां भारत की इंपोर्ट डिपेंडेंसी सबसे ज्यादा है.

‘मनी कंट्रोल’ की रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोदी सरकार ने इसे अपने आर्थिक एजेंडे में शामिल कर लिया है. इसका मकसद सिर्फ आयात कम करना नहीं, बल्कि ट्रेड डेफिसिट यानी व्यापार घाटे को घटाना, विदेशी मुद्रा की बचत करना और भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में तैयार करना है.

100 से ज्यादा प्रोडक्ट्स पर नजर, बनेगा नया रोडमैप

इस योजना के लिए सरकार ने एक टास्क फोर्स तैयार की है, जो उन प्रोडक्ट्स की पहचान कर रही है जिन्हें भारत में बनाने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है. इस टीम की अगुवाई शक्तिकांत दास कर रहे हैं, जो भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रह चुके हैं और वर्तमान में प्रधानमंत्री कार्यालय में अहम जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.

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टास्क फोर्स में आर्थिक मामलों से जुड़े विशेषज्ञ भी शामिल हैं. टीम का काम सिर्फ लिस्ट तैयार करना नहीं है, बल्कि यह तय करना भी है कि किन सेक्टरों में निवेश, नीतिगत बदलाव और सरकारी मदद के जरिए घरेलू उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जा सकता है.

किन चीजों का आयात घटाना चाहती है सरकार?

‘ब्लूमबर्ग’ की रिपोर्ट के मुताबिक, कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री फिलहाल उन सामानों की पहचान कर रही है, जिनके लिए भारत की विदेशी निर्भरता ज्यादा है. इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, केमिकल्स, दवाएं, फर्टिलाइजर, ऑटोमोबाइल पार्ट्स और भारी मशीनरी जैसे सेक्टर शामिल हैं.

खास फोकस सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग पर है, क्योंकि स्मार्टफोन से लेकर ऑटोमोबाइल तक लगभग हर आधुनिक इंडस्ट्री चिप सप्लाई पर निर्भर है. हाल के वर्षों में चिप संकट ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन कितनी अहम है.

इसी तरह खाद के मामले में भी सरकार आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है. अंतरराष्ट्रीय तनाव और शिपिंग रूट में आई परेशानियों ने दिखाया कि जरूरी कृषि इनपुट की सप्लाई सुरक्षित रखना कितना जरूरी है.

भारत का इंपोर्ट बिल और चीन की बड़ी हिस्सेदारी

भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ आयात का आंकड़ा भी बड़ा है. मार्च में खत्म हुए पिछले वित्त वर्ष में भारत ने करीब 775 अरब डॉलर का सामान विदेशों से खरीदा. इसमें चीन की हिस्सेदारी लगभग 20 फीसदी के आसपास है.

यानी भारत का लक्ष्य सिर्फ कुछ सामानों का उत्पादन देश में बढ़ाना नहीं है, बल्कि आने वाले वर्षों में ऐसी सप्लाई चेन तैयार करना है जो किसी भी वैश्विक संकट के समय देश की अर्थव्यवस्था को झटका लगने से बचा सके.

भारत के टॉप इम्पोर्ट पार्टनर  

इम्पोर्ट बिल कम करने, स्वदेशी को बढ़ाने और डॉलर की बचत के इस प्लान के जरूरी पहलू क्या-क्या हैं, इस इंफोग्राफिक्स से सब साफ हो जाएगा.

ग्राफिक्स- AI
ग्राफिक्स-AI

PS: डेटा ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के हवाले से है. ये दर्शाता है कि हमारी निर्भरता चीन और मिडिल ईस्ट देशों पर सबसे ज्यादा है.

कैसे बदलेगी तस्वीर? इंसेंटिव्स से लेकर निवेश तक का प्लान

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सिर्फ आयात कम करने की बात करने से क्या भारत में उत्पादन बढ़ जाएगा? इसका जवाब है, नहीं. किसी भी सेक्टर में नई फैक्ट्रियां लगाने, टेक्नोलॉजी लाने और ग्लोबल कंपनियों को भारत में निवेश के लिए तैयार करने के लिए सरकार को मजबूत प्रोत्साहन नीति बनानी होगी.

इसी वजह से सरकार मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव्स और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसे मॉडल पर जोर दे रही है. इसका सीधा मतलब है कि जो कंपनियां भारत में उत्पादन बढ़ाएंगी, उन्हें वित्तीय मदद और नीतिगत समर्थन दिया जाएगा. कोशिश ये है कि विदेशी कंपनियां सिर्फ भारत में अपना बाजार न देखें, बल्कि यहां उत्पादन केंद्र भी बनाएं. इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में सरकारी कंपनियां भी निजी कंपनियों के साथ साझेदारी यानी जॉइंट वेंचर के जरिए अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा सकती हैं.

कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने भी राज्यों और इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से कहा है कि ऐसे प्रोडक्ट्स की पहचान की जाए, जिन्हें भारत वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कीमत और गुणवत्ता के साथ बना सकता है. सरकार एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए 'एडवांस ऑथराइजेशन प्रोग्राम' में बदलाव पर भी विचार कर रही है. इस योजना के तहत अभी एक्सपोर्टर्स को तैयार माल विदेश भेजने की शर्त पर बिना कस्टम ड्यूटी के कच्चा माल आयात करने की सुविधा मिलती है. अब सरकार चाहती है कि इसमें ऐसे बदलाव किए जाएं, जिससे कंपनियां भारत में बने इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स और कंपोनेंट्स का ज्यादा इस्तेमाल करें.

रूस, तेल और ग्लोबल राजनीति की चुनौती

भारत के इस मिशन के पीछे सिर्फ चीन पर निर्भरता कम करने की सोच नहीं है, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति भी एक बड़ी वजह है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है और ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस और मिडिल ईस्ट पर काफी हद तक निर्भर है.

अगर रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से नए प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था और आयात बिल पर पड़ सकता है. कच्चे तेल के अलावा जरूरी खनिज, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और दूसरी रणनीतिक चीजों की सप्लाई को सुरक्षित रखना भी सरकार की प्राथमिकता बन गया है.

यही वजह है कि सरकार अब उन क्षेत्रों में तेजी से क्षमता बढ़ाना चाहती है, जहां बाहरी निर्भरता भविष्य में जोखिम पैदा कर सकती है. मकसद सिर्फ आज की समस्या का समाधान नहीं, बल्कि आने वाले वैश्विक संकटों के लिए भारत को ज्यादा मजबूत बनाना है.

लेकिन राह आसान नहीं है

आयात निर्भरता खत्म करना इतना आसान नहीं होगा. कुछ सेक्टर ऐसे हैं जहां चीन की पकड़ बेहद मजबूत है और तुरंत कोई विकल्प तैयार करना मुश्किल है. इलेक्ट्रिक व्हीकल इंडस्ट्री के लिए जरूरी बैटरी कंपोनेंट्स, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स और कई इंडस्ट्रियल पार्ट्स ऐसे ही उदाहरण हैं.

इन क्षेत्रों में सरकार को लंबी अवधि की रणनीति अपनानी होगी. बंद पड़े सरकारी फर्टिलाइजर प्लांट्स को दोबारा शुरू करना, नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के लिए नियम आसान बनाना और विदेशी कंपनियों को भारत में अपना प्रोडक्शन बेस बनाने के लिए आकर्षित करना इसी बड़े प्लान का हिस्सा है.

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कुल मिलाकर, मोदी सरकार की रणनीति साफ है. भारत सिर्फ दुनिया का बड़ा बाजार बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि एक ऐसा मैन्युफैक्चरिंग हब बनना चाहता है, जहां से दुनिया को जरूरी सामान की सप्लाई हो सके. अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि 100 से ज्यादा जरूरी सामानों की ये लिस्ट सिर्फ सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रहती है या जमीन पर नए कारखानों, नए निवेश और मजबूत सप्लाई चेन में बदल पाती है.

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