अमेरिका-इजरायल और ईरान की लड़ाई का असर कच्चे तेल या गैस तक सीमित नहीं रहा है. अब इसकी आंच आम आदमी से लेकर किसान-कारोबारी सब महसूस कर रहे हैं. इसका असर खाद्य तेल (Edible oil) से लेकर खाद (Fertilizers) और रोजाना की जरूरत वाली दूसरी चीजों पर साफ दिखने लगा है. जानकारों और कई मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि खाने का तेल, चीनी (Sugar), खाद, चिकित्सा उपकरण और एल्यूमीनियम समेत कई दूसरी चीजों की कीमतें बढ़ी हैं. आगे भी इनके दाम उछलने का अनुमान है. इस बारे में हमने भी एक्सपर्ट्स से बात की है. आइए जानते हैं कि ईरान में जारी लड़ाई किस तरह से हमारी रोजाना की जिदंगी पर असर डाल रही है.
ईरान युद्ध का असर आपकी थाली तक पहुंच ही गया, खाने के तेल, चीनी और खाद सब पर खतरा
ईरान जंग की आंच अब आम आदमी से लेकर किसान-कारोबारी सब पर दिखने लगी है. इसका असर खाद्य तेल (Edible oil) से लेकर खाद (Fertilizers) और रोजाना की जरूरत वाली दूसरी चीजों पर साफ दिखने लगा है.
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पश्चिम एशिया में जारी यु्द्ध से खाद्य तेल की कीमतें चढ़ रही हैं. सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के कार्यकारी निदेशक डीएन पाठक ने लल्लनटॉप से कहा कि वैसे तो पाम तेल का ज्यादातर आयात तेल इंडोनेशिया और मलेशिया से आता है. इस वजह से यह तेल मंगाने के लिए हमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज रूट का इस्तेमाल नहीं करना पड़ता है. इसी तरह से हम ब्राजील और अर्जेटीना से सोया तेल मंगाते है. ये तेल लाने वाले जहाज भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते से नहीं गुजरते हैं. लेकिन जियो पॉलिटिकल टेंशन की वजह से इंटरनेशनल मार्केट में खाद्य तेल महंगा हुआ है. इसका असर भारत में कीमतों पर दिख रहा है. भारत अपनी जरूरत का करीब 60 परसेंट खाने का तेल विदेशों से खरीदता है. इसमें सबसे ज्यादा पाम तेल की हिस्सेदारी होती है. इसके बाद सोयाबीन और सूरजमुखी के तेल का नंबर आता है. भारत हर साल लगभग 1.6 करोड़ टन खाद्य तेल आयात करता है.
फॉर्च्यून इंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इमामी एग्रोटेक लिमिटेड के सीईओ और इंडियन वेजिटेबल ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के चेयरमैन सुधाकर देसाई ने फॉर्च्यून इंडिया से बातचीत में कहा कि कच्चे तेल और माल-भाड़ा बढ़ने से बढ़ती लागत के चलते खाद्य तेल महंगा हुआ है. उनका कहना है कि क्रूड महंगा होने और ढुलाई में देरी के चलते पाम तेल, सोया तेल का दाम 4-5 परसेंट बढ़ चुका है.
साथ ही सूरजमुखी तेल (सन फ्लावर ऑयल) का दाम बढ़ने का ज्यादा खतरा है क्योंकि भारत में यह तेल काला सागर (Black Sea) के रास्ते आयात होता है. उन्होंने आगे कहा कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरते हैं तो खाद्य तेल की कीमतें और बढ़ेंगी. खाने का तेल महंगा होने की एक और बड़ी वजह ये है कि कच्चे तेल की कीमतों और बायोडीजल की मांग के बीच आपसी रिश्ता है. जब कच्चा तेल महंगा हो जाता है, तो बायोडीजल की मांग बढ़ती है. बायो डीजल का उत्पादन पाम और सोयाबीन तेल जैसे वनस्पति तेलों का इस्तेमाल करके किया जाता है.
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एथेनॉल का भाव चढ़ा, चीनी महंगी होगी?दुनिया में सबसे ज्यादा गन्ने की पैदावार ब्राजील में होती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर बताती है कि जब एथेनॉल की कीमतें चढ़ती हैं तो गन्ना मिलें चीनी की जगह फायदा कमाने के लिए एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने पर अपना ध्यान क्रेंदित करने लगती हैं. ऐसा फिर से देखने को मिल सकता है. इस वजह से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीनी के भाव में तेजी का अनुमान है. रिपोर्ट बताती है कि कच्चा तेल महंगा होने से एथेनाल की मांग बढ़ी है. इस वजह से हाल में एथेनॉल की कीमतों में 10 परसेंट का उछाल आया है.
तेल और गैस की रिफाइनिंग के दौरान बड़ी मात्रा में सल्फर पैदा होती है. यह सल्फर फर्टिलाइजर (उर्वरक) उत्पादन और फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होती है. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के सल्फर भंडार का लगभग आधा हिस्सा फिलहाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ( फारस की खाड़ी वाले हिस्से) में फंसा हुआ है. दुनिया में बिकने वाली करीब एक तिहाई यूरिया स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते से गुजरती है. इसका उत्पादन मिडिल ईस्ट में होता है क्योंकि प्राकृतिक गैस फर्टिलाइजर बनाने में सबसे जरूरी रॉ मैटेरियल है. इसी वजह से ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से यूरिया की कीमतों में 35% तक का इजाफा हो चुका है.
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एल्यूमीनियम की कीमतें 4 साल में सबसे ज्यादाकतर और बहरीन के प्रमुख एल्युमीनियम गलाने वाले प्लांट्स से सप्लाई ठप पड़ने के बाद से एल्युमीनियम की कीमतें लगभग चार साल की ऊंचाई पर पहुंच गई हैं. कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता कहना है कि मिडिल ईस्ट में लड़ाई एल्यूमीनियम समेत कई दूसरी कमोडिटीज पर भारी पड़ रही है. पिछले कुछ दिनों में एल्यूमीनियम के दाम चढ़े हैं. इसकी वजह ये है कि मिडिल ईस्ट एल्यूमीनियम उत्पादन में काफी योगदान देता है. इंटरनेशनल एल्युमिनियम इंस्टीट्यूट के मुताबिक पिछले साल मिडिल ईस्ट की मेटल कंपनियों की ग्लोबल एल्यूमीनियम सप्लाई में करीब 8 परसेंट की हिस्सेदारी रही है.
इलाज कराना महंगापश्चिम एशिया का तनाव इलाज कराने वाले लोगों पर भी असर डाल रहा है. इलाज में काम आने वाले कई जरूरत के सामान महंगे हुए हैं. इस इलाके में लड़ाई की वजह से कई चीजों की सप्लाई पर असर पड़ा है. इस वजह से मेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियां अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली ज़रूरी चीज़ों की कमी की आशंका जता रही हैं.
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि ज़्यादातर कंपनियों के पास रॉ मैटेरियल का स्टॉक केवल 15-20 दिनों का ही है. इससे अस्पतालों में जरूरी डिस्पोजेबल चीजों का उत्पादन और सप्लाई जल्द ही ठप पड़ सकती है. इलाज में इस्तेमाल आने वाली प्लास्टिक की कीमतों में तेजी से मेडिकल उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर दबाव बढ़ रहा है. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर बताती है कि मार्च की शुरुआत से अब तक इलाज में काम आने वाले पॉलिमर की कीमत लगभग 140 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर लगभग 190 रुपये हो गई है. पॉलीकार्बोनेट की कीमत लगभग 240 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है. इससे बड़ी संख्या में डिस्पोजेबल उत्पाद बनाए जाते हैं. इसकी कीमत लगभग 103 रुपये से बढ़कर 147 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई है. टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्ट के मुताबिक होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट और मध्य पूर्व में तनाव से प्लास्टिक से बने चिकित्सा उपकरणों की लागत लगभग 50% बढ़ी है.
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भड़क सकती है महंगाई?मिडिल ईस्ट में जारी लड़ाई की वजह से भारत में महंगाई और भड़क सकती है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की तरफ से 12 मार्च को जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में रिटेल महंगाई दर फरवरी में बढ़कर 3.21% हो गई. जनवरी में रिटेल महंगाई दर 2.74% थी.
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनाविस ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि फरवरी के आंकड़ों में पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के असर को शामिल नहीं किया गया है. मार्च महीने की महंगाई दर खासतौर से तेल और गैस के दाम बढ़ने से और बढ़ सकती है. उनका कहना है कि मार्च में रिटेल महंगाई दर 3.2-3.5 परसेंट के दायरे में रहने की उम्मीद है.
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