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ईरान युद्ध से दुनिया का बेड़ा गर्क होना तय? गीता गोपीनाथ ने 'सूरमा' देशों का सच खोल दिया

इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ का कहना है कि ईरान युद्ध के चलते तेल की कीमतें बढ़ने से इस साल दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं को मंदी का सामना करना पड़ रहा है.

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IMF Gita Gopinath
कच्चे तेल में तेजी से कई देशों की इकोनॉमीज पर खतरा मंडरा रहा है (फोटो क्रेडिट: Business Today)
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प्रदीप यादव
11 मार्च 2026 (पब्लिश्ड: 04:35 PM IST)
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दुनिया भर की सरकारों की माली हालत ऐसी नहीं बची है कि वे इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध के चलते तेल की कीमतों में आई तेजी से आसानी से निपट सकें. यह चेतावनी इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ दी है. गीता गोपीनाथ फिलहाल हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं.

न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में गीता गोपीनाथ ने कहा कि अभी तो युद्ध शुरू हुए दो हफ्ते से भी कम वक्त बीता है, लेकिन इसका असर पूरी दुनिया में दिख रहा है. उनका कहना है कि ईरान युद्ध के चलते तेल की कीमतें बढ़ने से इस साल विश्व की कई अर्थव्यवस्थाओं को मंदी का सामना करना पड़ रहा है. 

उन्होंने कहा कि अब इस साल कच्चे तेल का औसत भाव 75 डॉलर प्रति बैरल रहने की ज्यादा संभावना है. इससे पहले कई अनुमानों में इस साल कच्चे तेल का औसत भाव 65 डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान लगाया गया था. गोपीनाथ ने कहा कि कच्चे तेल के भाव में तेजी के चलते दुनिया भर में महंगाई आधा पर्सेंट बढ़ाने के लिए पर्याप्त है.

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उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की आर्थिक हालत कई जानकारों के अनुमान से भी ज्यादा नाजुक है. साल 2025 में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कई देशों पर भारी टैरिफ लगाने का ऐलान किया था. ये देश टैरिफ के झटकों को झेल रहे हैं. अब मामला गंभीर नजर आ रहा है. गीता गोपीनाथ ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं. मंगलवार को कच्चे तेल का भाव 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था. 

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जनवरी में आईएमएफ ने दुनिया की आर्थिक विकास दर के अपने अनुमान को बढ़ाकर 3.3 पर्सेंट कर दिया. अक्टूबर में आईएमएफ ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट 3.1 पर्सेंट रहने का अनुमान जताया था. अगले महीने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए आर्थिक विकास दर का ताजा अनुमान जारी करेगा.

इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल फाइनेंस (Institute of International Finance) की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल दुनियाभर के देशों पर कर्ज का बोझ 348 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया. यह कोरोना संकट के बाद से सबसे तेज सालाना बढ़ोतरी है. कर्ज बढ़ने की वजह ये है कि ज्यादातर विकसित और विकासशील देश खूब उधार ले रहे हैं.

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