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कॉपर के भाव ने महंगाई के सारे रिकॉर्ड तोड़े, दामों में उछाल की वजह AI भी

सालभर में कॉपर की कीमतों में करीब 45% की तेजी आई है. जानकारों का कहना है कि आगे भी कीमतें बढ़ सकती हैं.

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यह साल 1994 के बाद से पहला मौका है जब कॉपर के दाम लगातार इतने समय तक बढ़े हैं (फोटो क्रेडिट: Business Today)

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  • लंदन मेटल एक्सचेंज पर बेंचमार्क कॉपर का दाम 14,533 डॉलर प्रति टन के ऑल टाइम हाई स्तर पर पहुंच गया है, जो इस साल जनवरी के 14,527.50 डॉलर प्रति टन रिकॉर्ड को पार करता है।
  • कॉपर की कीमतों में वृद्धि के पीछे तेजी से बढ़ती मांग है, जो इलेक्ट्रिफिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिफेंस खर्च और शहरीकरण जैसे कारकों से प्रेरित है, जबकि सप्लाई सीमित बनी हुई है।
  • कॉपर की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण भविष्य में कीमतें 15,000 से 17,000 डॉलर प्रति टन तक पहुंचने की संभावना है, खासकर यदि मैन्युफैक्चरिंग सुधारता है या सोलर एनर्जी और डेटा सेंटर्स की मांग बढ़ती है।

लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर बेंचमार्क कॉपर का दाम 14,533 डॉलर प्रति टन के ऑल टाइम हाई पर पहुंच गया है. इकोनॉमिक टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है. इस रिपोर्ट में बताया गया कि इससे पहले इसी साल जनवरी में कॉपर ने 14,527.50 डॉलर टन का स्तर छुआ था. वहीं, पिछले एक साल में कॉपर की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल आया है. पिछले साल भर में इंटरनेशनल मार्केट में कॉपर के दाम करीब 45% उछले हैं.

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क्यों उछल रहा भाव?

रिपोर्ट में बताया गया कि कॉपर की मांग तेजी से बढ़ी है. इसके कई कारण हैं. मसलन इलेक्ट्रिफिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिफेंस पर बढ़ता खर्च और उभरते शहरों में शहरीकरण वगैरा. इस तरह से देखें तो लंबे समय से कॉपर की मांग बढ़ रही है लेकिन इसकी सप्लाई सीमित बनी हुई है.

इतना ही नहीं, कॉपर की सप्लाई अभी भी कम है. वहीं इसकी मांग लगातार मजबूत बनी हुई है. मांग और सप्लाई के इस अंतर के चलते आने वाले दिनों में कॉपर की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं. रिपोर्ट बताती है कि कॉपर के मार्केट में अभी जो हालात हैं, वे उस दौर की शुरुआत जैसे दिख रहे हैं जब पहले कई साल तक कमोडिटी की कीमतों में तेजी आई थी. आसान शब्दों में कहें तो कॉपर में लंबी अवधि की तेजी की गुंजाइश बन सकती है. 

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इसके अलावा ईरान युद्ध ने पहले से ही तंग कॉपर की सप्लाई की स्थिति को और भी खराब कर दिया है. कॉपर की कीमतों में हालिया उछाल के पीछे एक और कारण है जिसकी कम चर्चा की जा रही है. दरअसल सल्फ्यूरिक एसिड की सप्लाई में कमी भी कॉपर के दाम बढ़ने का बड़ा कारण है. यह सल्फ्यूरिक एसिड कॉपर निकालने और इसकी रिफाइनिंग में जरूरी है. दुनिया की समुद्री मार्ग से होने वाली सल्फर सप्लाई का लगभग आधा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा के चलते सल्फ्यूरिक एसिड की सप्लाई ठीक से नहीं हो पा रही है.

दुनिया के सबसे बड़े कॉपर पैदा करने वाले देश चिली में सप्लाई कम रही है. चिली में कम से कम 19 साल में सबसे कमजोर उत्पादन दर्ज किया गया है. चिली ने लगातार दूसरी तिमाही में अपने पूरे साल के उत्पादन के पूर्वानुमान में कटौती की है.  चिली में अब कॉपर उत्पादन में 2.6% की गिरावट की उम्मीद है. ब्रोकरेज फर्म जेफरीज के विश्लेषकों ने कहा कि खदानों से उत्पादन अभी भी काफी सीमित है. 

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आगे भाव कैसा रहेगा?

बेंचमार्क लंदन मेटल एक्सचेंज पर कॉपर की कीमतें लगातार दसवें हफ्ते तेजी की तरफ बढ़ रही हैं. यह साल 1994 के बाद से पहला मौका है जब कॉपर के दाम लगातार इतने समय तक बढ़े हैं. सिटीग्रुप इंक के एनालिस्ट टॉम मुलक्वीन का अनुमान है कि साल के अंत तक कॉपर की कीमतें 15,000 डॉलर प्रति टन तक पहुंच जाएगी. अगर मैन्युफैक्चरिंग में सुधार हुआ या सोलर एनर्जी और  डेटा सेंटर्स की तरफ से मांग बढ़ी तो कॉपर के दाम करीब 17,000 डॉलर प्रति टन तक भी पहुंच सकते हैं.

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