दिल्ली-देहरादून यात्रा के दौरान एक यात्री का गहने, कपड़े और दवाइयों से भरा सूटकेस खो गया. मामला उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के पास पहुंचा. कंज्यूमर कोर्ट ने इस मामले में उत्तराखंड परिवहन निगम को नुकसान के लिए जिम्मेदार मानते हुए यात्री को 43,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है. यात्री ने अपना सूटकेस बस के सामान रखने वाले डिब्बे में कंडक्टर को सौंपा था. लेकिन बाद में सामान गायब मिला.
बस में गुम हुआ था सूटकेस, कंज्यूमर कोर्ट से 10 साल बाद फैसला, कितना मिला मुआवजा?
दिल्ली-देहरादून यात्रा के दौरान एक यात्री का बस में रखा सूटकेस गायब हो गया. इसके बाद मामला कंज्यूमर कोर्ट पहुंच गया. अब कोर्ट ने यात्री को 43,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है. समझें पूरा मामला क्या है.

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 8 नवंबर, 2015 को चंद्रशेखर बिष्ट अपनी पत्नी के साथ दिल्ली से देहरादून के लिए यूके07-पीए-1567 रजिस्ट्रेशन नंबर वाली एक डीलक्स बस में यात्रा कर रहे थे. उन्होंने 318-318 रुपये कीमत के दो टिकट खरीदे और रात लगभग 10 बजे अपनी यात्रा शुरू की. यात्रा के दौरान कंडक्टर धर्मवीर सिंह के अनुरोध पर बिष्ट ने अपना सूटकेस बस के सामान रखने वाले डिब्बे में रख दिया.
हालांकि, जब बिष्ट खतौली पहुंचे तो उन्होंने पाया कि उनका सूटकेस गायब था. सूटकेस में कपड़े, गहने, दवाइयां और अन्य सामान थे. बिष्ट ने कंडक्टर पर लापरवाही का आरोप लगाया था. उन्होंने सूटकेस और सामान के लिए 57,500 रुपये के मुआवजे के साथ-साथ मानसिक पीड़ा और मुकदमेबाजी के खर्चों की भी मांग की.
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उत्तराखंड परिवहन निगम में दर्ज कराई शिकायतइस यात्री ने अधिकारियों से संपर्क किया और उत्तराखंड परिवहन निगम में शिकायत दर्ज कराई. राज्य आयोग ने कई दस्तावेजों की जांच की. इसमें देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ पत्राचार, निगम के डिपो को प्रस्तुत रिपोर्ट और सहायक महाप्रबंधक पी के भारती द्वारा 30 जनवरी, 2016 को पारित एक आंतरिक आदेश शामिल थे. विभागीय जांच में सिंह को सूटकेस और उसके अंदर रखी चीजें वापस नहीं लौटाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. जांच में कंडक्टर के खिलाफ भी प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज की गई.
कंडक्टर को माना गया दोषीकंडक्टर धर्मवीर सिंह ने तर्क दिया कि यात्रियों को अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करनी चाहिए. उन्होंने बस पर लिखी चेतावनी का हवाला दिया, जिसमें यात्रियों से अपने सामान का ध्यान रखने का निर्देश दिया जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि वे उत्तराखंड परिवहन निगम के कर्मचारी हैं और उसके निर्देशों के तहत काम करते हैं.
वहीं, उत्तराखंड परिवहन निगम ने तर्क दिया कि उसने यात्रियों से किराया लिया है, सामान से नहीं. लेकिन जिला उपभोक्ता विवाद निवारण मंच, देहरादून ने 15 नवंबर, 2018 को बिष्ट की शिकायत स्वीकार कर ली. उसने कंडक्टर धर्मवीर सिंह को गुम हुए सामान के लिए 57,500 रुपये, मानसिक पीड़ा के लिए 15,000 रुपये और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 3,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया.
निर्धारित अवधि के भीतर भुगतान नहीं करने पर, शिकायत दर्ज करने की तिथि 11 मार्च, 2016 से 9% साधारण ब्याज लगाने का आदेश दिया गया था. कंडक्टर ने इस फैसले को राज्य आयोग के समक्ष चुनौती दी. राज्य आयोग ने यात्रा टिकटों, पत्राचार और निगम की आंतरिक जांच रिपोर्ट की जांच की. आयोग ने कंडक्टर धर्मवीर सिंह को गंभीर लापरवाही का दोषी पाया.
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यात्री को कितना मुआवजा मिलेगा?3 अक्टूबर, 2026 को सुनाए गए अपने आदेश में, राज्य आयोग ने कंडक्टर की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया. आयोग ने उत्तराखंड परिवहन निगम को दो महीने के भीतर गायब हुए सामान के लिए 25,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया. मानसिक पीड़ा के लिए 15,000 रुपये और मुकदमेबाजी खर्च के लिए 3,000 रुपये रोक लिए गए. कुल मुआवजा 43,000 रुपये है.
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