राहुल गांधी 12 अक्टूबर को हजारों पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ चुनाव आयोग के खिलाफ अपनी याचिका दाखिल करने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. उनके इस कदम पर अब सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के करीब 200 मेंबर्स ने सवाल उठाए हैं. उन्होंने एसोसिएशन के सचिव और कार्यकारी समिति को एक लेटर लिखा है. इसमें राहुल गांधी के मार्च की निंदा करने और एक प्रस्ताव पास करने की मांग की गई है.
‘SC ताकत दिखाने की जगह नहीं’, राहुल के फैसले से नाराज बार एसोसिएशन के 200 मेंबर
राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने 12 अक्टूबर को चुनाव आयोग के खिलाफ याचिका दाखिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया था. अब सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के करीब 200 सदस्यों ने इसके खिलाफ एसोसिएशन के सचिव और कार्यकारी समिति को एक पत्र लिखा है.

बार एंड बेंच के मुताबिक, लेटर में कहा गया है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों के साथ पहुंचना राजनीतिक ताकत दिखाने जैसा है. इससे जजों पर अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है. सदस्यों ने इसे कानून के राज के खिलाफ बताया है. लेटर में ये भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक ताकत दिखाने की जगह नहीं है. यहां पैसे या भीड़ की ताकत का प्रदर्शन भी नहीं होना चाहिए. बार एसोसिएशन के मेंबर्स ने चेतावनी दी है कि अगर ऐसा हुआ, तो इसका असर हाईकोर्ट और जिला अदालतों पर भी पड़ सकता है. उन्होंने मांग की है कि ये नियम सभी लोगों और राजनीतिक पार्टियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए.
Law Street Journal की रिपोर्ट के मुताबिक, लेटर में ये भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट न्याय देने वाली संवैधानिक संस्था है.अदालत में याचिका दाखिल करना एक कानूनी प्रक्रिया है. इसका फैसला संविधान, तय नियमों और मामले के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए. सदस्यों ने संविधान के अनुच्छेद 14 का भी हवाला दिया है. ये कानून के सामने समानता की बात करता है. उन्होंने कहा है कि किसी व्यक्ति के साथ उसके राजनीतिक पद, सार्वजनिक पहचान, आर्थिक स्थिति या समर्थकों की संख्या के आधार पर अलग व्यवहार नहीं होना चाहिए. कानून की नजर में सभी को समान माना जाना चाहिए.
लेटर में चेतावनी दी गई है कि अगर ऐसी घटनाओं को नहीं रोका गया, तो भविष्य में प्रभावशाली लोग गाड़ियों के काफिले और सैकड़ों या हजारों समर्थकों के साथ अदालत पहुंच सकते हैं. वे अपनी ताकत दिखाकर जजों पर इनडायरेक्ट दबाव डाल सकते हैं. बार एसोसिएशन के मेंबर्स ने ये भी कहा है कि देश की सबसे बड़ी अदालत में याचिका दाखिल करना कभी भी चुनावी नामांकन जैसा नहीं दिखना चाहिए. यानी याचिका दाखिल करने के लिए राजनीतिक जुलूस निकालने जैसी स्थिति नहीं होनी चाहिए.
मेंबर्स की दलील है कि अगर शुरुआत में ही ऐसी घटनाओं की निंदा नहीं की गई, तो ये चलन हाई कोर्ट और जिला अदालतों तक भी पहुंच सकता है. वहां भीड़ जुटाकर जजों को डराने और अदालती कार्यवाही को इन्फ्लुएंस करने की कोशिश हो सकती है. सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से एक प्रस्ताव पास करने की मांग की है. इसमें राजनीतिक रसूख, पैसे या भीड़ के दम पर अदालत पर दबाव बनाने की कोशिशों की निंदा करने की बात कही गई है. उनका कहना है कि ऐसे किसी भी एक्शन को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए, जिससे जुडिशरी की गरिमा, आजादी और निष्पक्षता पर सवाल उठे.
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उन्होंने कहा है कि ये प्रस्ताव किसी एक व्यक्ति या पार्टी तक सीमित नहीं होना चाहिए. इसे सभी व्यक्तियों, राजनीतिक दलों और संगठनों पर एक बराबर लागू किया जाना चाहिए. लेटर के आखिर में सदस्यों ने कहा है कि समय पर और सिद्धांतों के आधार पर लिया गया फैसला न्यायपालिका में लोगों का भरोसा मजबूत करेगा. इससे ये मैसेज भी जाएगा कि कोई व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है. कोई राजनीतिक दल संविधान से बड़ा नहीं है. भीड़ या पैसे की ताकत न्याय से बड़ी नहीं हो सकती.
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