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बैंक कस्टमर्स का बड़ा सिरदर्द खत्म, RBI ने मनमाने इंश्योरेंस का 'हिसाब' कर दिया

बैंक की तरफ से मिस-सेलिंग पर रोक लगाने के लिए RBI ने तगड़ा इंतजाम कर दिया है. एक जनवरी 2027 से नए नियम लागू होंगे. अब आपको बैंक चाहकर भी ऐसे प्रोडक्ट नहीं बेच पाएंगे, जो आपके लिए उपयोगी नहीं हैं.

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आपके घर पर सामान बेचने वाले एजेंट भी अब आरबीआई की निगरानी में हैं (फोटो क्रेडिट: India Today)

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  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 1 जनवरी 2027 से सभी कमर्शियल बैंकों सहित स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों पर मिस-सेलिंग रोकने के नए निर्देश जारी किए हैं।
  • मिस-सेलिंग का मतलब है ग्राहक की जरूरत के विपरीत उत्पाद बेचना या बिना स्पष्ट सहमति के उत्पाद बेचने जैसी गतिविधियां, जो ग्राहक के साथ गलत या भ्रामक जानकारी देने पर आधारित होती हैं।
  • RBI के नए नियमों से बैंक अब लोन के साथ बीमा कंपल्सरी बंडलिंग नहीं कर सकेंगे और ग्राहक को किसी भी बीमा कंपनी से चुनने की स्वतंत्रता मिलेगी, साथ ही ग्राहक की लिखित सहमति अनिवार्य होगी।

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि होम लोन लेने के लिए गए हों और आपको बिना मांगे बीमा पॉलिसी मिल गई हो? लेकिन अब बैंक आपके साथ इस तरह की मिस-सेलिंग (Mis-Selling) नहीं कर पाएंगे. इस तरह की चीजों पर रोक लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इंतजाम कर दिया है.  

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इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रिजर्व बैंक ने इससे जुड़े नए निर्देश जारी किए हैं. ये निर्देश सभी कमर्शियल बैंकों पर लागू होते हैं. ये नियम स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों वगैरा के लिए अलग-अलग हैं. नए नियम 1 जनवरी, 2027 से लागू होंगे. 

Mis-Selling क्या है और यह क्यों मायने रखती है?

मिस -सेलिंग तब होती है जब कोई बैंक आपको ऐसा वित्तीय उत्पाद बेचता है जिसकी आपको जरूरत नहीं हैं लेकिन बैंक आपको गलत या भ्रामक जानकारी देकर यह बेच देता है. आरबीआई ने अब इस ढांचे के तहत पहली बार इसे औपचारिक कानूनी परिभाषा दी है. सर्कुलर के मुताबिक मिस-सेलिंग के दायरे में 5 खास स्थितियां होती हैं:

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1-ग्राहक की जरूरतों के अनुरूप न होने वाला उत्पाद बेचना, भले ही ग्राहक ने तकनीकी रूप से इसके लिए सहमति दे दी हो.
2-किसी भी प्रोडक्ट को गलत या अधूरी सूचना के बेचना
3-ग्राहक की साफ सहमति के बिना उत्पाद बेचना
4-किसी ग्राहक को एक सामान खरीदने के लिए मजबूर करना ताकि वह दूसरा सामान भी खरीद सके
5-कोई भी ऐसी गतिविधि जिसे सेबी, भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDA) या पेंशन निधि नियामक एवं विकास प्राधिकरण (PFRDA) जैसे किसी अन्य वित्तीय नियामक की तरफ से कुप्रबंधन के रूप में मिस-सेलिंग बताया गया हो.

रिपोर्ट बताती है कि अगर यह साबित हो जाता है कि बैंक ने मिस-सेलिंग की है तो बैंक को ग्राहक की ओर से की गई पूरी पेमेंट वापस करनी होगी.  साथ ही, किसी तरह के अन्य नुकसान की भरपाई भी करनी होगी. इतना ही नहीं, अगर ग्राहक को लगता है कि बैंक ने गलत किया तो उसे बैंक के साथ हुए समझौते की हस्ताक्षर की गई प्रति मांग सकता है. साथ ही 30 दिनों के भीतर शिकायत दर्ज कर सकते हैं.

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लोन को बीमा के साथ जोड़ना अब गैरकानूनी है

इंडिया टुडे को पिछले कुछ साल में पाठकों से मिलने वाली सबसे आम शिकायतों में से एक यह है कि बैंक कर्ज लेने वाले लोगों से होम लोन या पर्सनल लोन स्वीकृत कराने की शर्त के रूप में बैंक के ही साझेदार से बीमा खरीदने के लिए मजबूर करते हैं. आरबीआई ने अब इस तरीके पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया है.

आरबीआई ने इसे कंपल्सरी बंडलिंग (compulsory bundling) कहा है. कंपल्सरी बंडलिंग को आम बोलचाल की भाषा में कहें, तो किसी एक उत्पाद की खरीद को दूसरे उत्पाद की खरीद पर निर्भर बनाना. चाहे वह बैंक का अपना उत्पाद हो या किसी थर्ड पार्टी का प्रोडक्ट. अब यह प्रतिबंधित होगा. 

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आपकी सहमति के बिना 'पत्ता भी नहीं हिलेगा"

हालांकि, यहां एक पेंच भी है. अगर बैंक को वाकई किसी लोन पर जोखिम से बचाव के लिए बीमा की जरूरत है, जैसे कि होम लोन प्रोटेक्शन प्लान, तो वह इसकी मांग कर सकता है. लेकिन ग्राहक को अपनी पसंद के किसी भी बीमा कंपनी से बीमा खरीदने की आजादी होगी. इसी तरह से अगर कोई व्यक्ति खुद किसी प्रोडक्ट्स का कॉम्बो चुनता है या किसी सामान के साथ दूसरा सामान मुफ्त मिलता है, तो यह नियमों के तहत स्वीकार्य है.

इसके अलावा अब आपकी सहमति बहुत ही खास मायने रखेगी. आमतौर पर अब तक बैंक ग्राहकों की सहमति के नाम पर बारीक अक्षरों में छपा एक हस्ताक्षर, किसी फॉर्म पर पहले से ही टिक किया हुआ बॉक्स या एक ऐसा हिस्सा  जिसमें कुछ इस तरह लिखा होता था, “मैं बैंक और उसके साझेदारों से प्रस्ताव प्राप्त करने के लिए सहमत हूं.” आरबीआई ने उन सभी तरीकों को बंद कर दिया है.

नए निर्देशों के अनुसार, कोई बैंक किसी उत्पाद (चाहे वह उसका अपना हो या किसी तीसरे पक्ष का) की पेशकश या बिक्री तभी कर सकता है जब ग्राहक ने उस विशिष्ट उत्पाद के लिए स्पष्ट और लिखित सहमति दी हो. एक उत्पाद के लिए दी गई सहमति को दूसरे उत्पाद के लिए सहमति नहीं माना जा सकता. 

वहीं, आपके घर पर सामान बेचने वाले एजेंट भी अब आरबीआई की निगरानी में हैं. आरबीआई के नए निर्देशों के तहत पहली बार इन्हें सीधे नियामक ढांचे के दायरे में लाया गया है.

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