कल तक सोशल मीडिया पर खूब हो-हल्ला मचा था कि मोबाइल रीचार्ज करना महंगा पड़ने वाला है. कहा जा रहा था कि "वोडाफोन और एयरटेल वाले प्रीपेड प्लान के दाम बढ़ाने वाले हैं." लेकिन मंगलवार 9 जून की शाम ढलते-ढलते बॉम्बे हाई कोर्ट से एक ऐसी खबर आई, जिसने ना सिर्फ देश के कॉरपोरेट जगत से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में भूचाल ला दिया.
हाई कोर्ट के फैसले से टेलीकॉम कंपनियों को 20,000 करोड़ की राहत, ग्राहकों पर क्या असर होगा?
Bombay High Court ने 9 जून को एक ऐसा फैसला दिया है, जिसने आपके मोबाइल फोन का बजट बिगड़ने से बचा लिया है. अपने फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने Vodafone-Idea और Airtel पर लगाए गए One Time Spectrum Charges यानी OTSC को रद्द कर दिया है.


बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने इस फैसले में केंद्र सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया. जिसके तहत भारती एयरटेल (Airtel) और वोडाफोन-आइडिया (Vi) पर 'वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज' (OTSC) लगाया गया था. कोर्ट के इस एक फैसले से टेलीकॉम कंपनियों को सीधे-सीधे 20,000 करोड़ रुपये की महा-राहत मिल गई है.
ऐसे में हैरानी नहीं कि बुधवार 10 जून को शेयर बाजार खुलते ही टेलीकॉम कंपनियों के शेयरों में भारी हलचल देखने को मिली. सिर्फ इतना ही नहीं सत्ता के गलियारों में इस टैक्स रिलीफ को लेकर बहस चरम पर जा पहुंची. आप सोच रहे होंगे कि गुरु, ये कंपनियों का पुराना टैक्स का लफड़ा है तो भला इससे हमारी-आपकी जेब का क्या कनेक्शन? तो बॉस, कनेक्शन बड़ा सीधा सा है. अगर कोर्ट ये 20,000 करोड़ रुपये माफ नहीं करता, तो इसका बोझ आखिर में आपके और हमारे पर ही आता. सीधे-सीधे कहें तो हमारे मोबाइल टैरिफ प्लान महंगे हो जाते.
दिमाग की बत्ती जली ना? तो फिर आइए, लगे हाथों ये भी समझ लेते हैं कि ये पूरा मामला क्या था, इसकी शुरुआत कैसे हुई, पिछली तारीख से नियम बदलने (Retrospective Taxation) की सियासत ने मार्केट को कैसे बिगाड़ दिया और सबसे बढ़कर अब रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफोन के इस ट्राएंगल का आपके बजट पर क्या असर पड़ेगा!
मामला क्या था, कैसे हुई इसकी शुरुआत?
मामले की तह तक पहुंचने के लिए आइये फ्लैशबैक में चलते हैं. करीब 14 साल पहले. साल था 2012... ये वही दौर था, जब पूरे देश में 2G स्पेक्ट्रम घोटाले का हल्ला मचा था. सुप्रीम कोर्ट ने एक झटके में 122 टेलीकॉम लाइसेंस रद्द कर दिए थे. उसी वक्त तत्कालीन मनमोहन सरकार ने एक नया नियम निकाला.
फरमान निकला कि "जिन कंपनियों को 2008 से पहले प्रशासनिक आवंटन के जरिए यानी बिना नीलामी के 4.4 MHz या 6.2 MHz से ज्यादा स्पेक्ट्रम मिला हुआ है, उन्हें उस एक्स्ट्रा स्पेक्ट्रम के लिए 'वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज' (OTSC) देना पड़ेगा."
खेल कहां बिगड़ा?
सिर्फ इतना ही नहीं, उस वक्त सरकार ने कहा था कि 'वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज' आदेश जारी होने की तारीख से नहीं, बल्कि पिछली तारीख से (Retrospectively) लागू होगा. यानी कंपनियां सालों से जिस स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल कर चुकी थीं, उसका बिल उन्हें आज (आदेश जारी होने की तारीख) के बाजार भाव (नीलामी दर) के हिसाब से चुकाना पड़ेगा.
यहीं पर सारा पेंच फंस गया. मुंबई के जाने माने कॉरपोरेट लॉयर अंजनी कुमार राय टेलीकॉम कंपनियों का पक्ष समझाते हुए लल्लनटॉप से कहते हैं,
उस वक्त टेलीकॉम कंपनियों का कहना था कि जब उन्होंने लाइसेंस लिया था, तब नियम अलग थे. अब बीच खेल में आप पिछली तारीख से नियम कैसे बदल सकते हैं?
बस, यहीं से सरकार बनाम टेलीकॉम कंपनियों की ये जंग अदालतों के चक्कर काटने लगी.
कंपनियों पर कुल बकाया कितना था?
बॉम्बे हाई कोर्ट के 9 जून के फैसले से पहले कंपनियों पर जो तलवार लटक रही थी, उसका पूरा फाइनेंशियल गुणा-गणित कुछ इस तरह से सेट था-
बॉम्बे हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की ख़बर के मुताबिक फैसला सुनाते हुए उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि पिछली तारीख से इस तरह के मनमाने चार्ज लगाना कानूनी रूप से सही नहीं है. सरकार अपनी मर्जी से पुराने कॉन्ट्रैक्ट्स की शर्तों को एकतरफा नहीं बदल सकती.
'पिछली तारीख से टैक्स' की वो राजनीति
ये पहली बार नहीं था, जब 'पिछली तारीख से नियम बदलने' की पॉलिटिक्स ने भारत के बिजनेस सेंटिमेंट को चोट पहुंचाई हो. याद करिए वोडाफोन और केयर्न एनर्जी (Cairn Energy) का वो पुराना टैक्स विवाद, जहां पिछली सरकारों ने कानून बदलकर विदेशी कंपनियों से पुराना टैक्स मांगा था. उस डिमांड ने पूरी दुनिया में भारत की छवि को 'टैक्स टेररिज्म' (Tax Terrorism) वाली बना दिया था.
टेलीकॉम कंपनियों के इस OTSC मामले ने भी ठीक वही काम किया. इसने भारत के टेलीकॉम मार्केट को बुरी तरह प्रभावित किया. जो बाजार कभी 12-15 कंपनियों से गुलजार था, वो घटकर सिर्फ 'ढाई' कंपनियों (जियो, एयरटेल और संघर्ष करती वोडाफोन-आइडिया) पर सिमट गया. सरकार की इस टैक्स की हवस के चलते वोडाफोन-आइडिया जैसी दिग्गज कंपनी पर कर्ज का ऐसा पहाड़ टूटा कि वो आज तक वेंटिलेटर पर हैं.
आपकी जेब पर इसका क्या असर होगा?
गुरु, अब आते हैं आपके सबसे बड़े सवाल पर कि इस 20,000 करोड़ रुपये की माफी से आपकी जेब को क्या नफा-नुकसान होगा? तीन पॉइंट में पूरी बात समझने की कोशिश करते हैं,
1. टैरिफ हाइक (Tariff Hike) पर ब्रेक लगेगाटेलीकॉम कंपनियां पिछले कुछ समय से 5G नेटवर्क बिछाने के नाम पर भारी निवेश कर रही हैं. जानकार बताते हैं कि ये कंपनियां घाटा पाटने के लिए मोबाइल प्लान्स के दाम बढ़ाने की तैयारी में थीं. अगर 9 जून को कोर्ट वोडाफोन और एयरटेल के खिलाफ फैसला सुनाती, तो इन कंपनियों को तुरंत 20,000 करोड़ रुपये सरकारी खजाने में जमा करने पड़ते. कंपनियां ये पैसा अपनी जेब से तो देती नहीं, बल्कि आपके रीचार्ज के दाम 15-20 फीसदी और बढ़ाकर वसूलतीं. इस फैसले ने फिलहाल उस बड़े झटके को टाल दिया है.
2. 'डुओपोली' का खतरा टला, वोडाफोन-आइडिया को संजीवनी20 हजार में करोड़ में से 12 हजार करोड़ रुपये अकेले वोडाफोन-आइडिया को चुकाने थे. जरा सोचकर देखिए कि अगर वोडाफोन-आइडिया को ये 12,000 करोड़ रुपये देने पड़ते, तो शायद कंपनी पूरी तरह बैठ जाती. अगर वोडाफोन बंद हो जाती, तो भारतीय टेलीकॉम मार्केट में केवल दो खिलाड़ियों का राज हो जाता. पहली एयरटेल और दूसरी रिलायंस जियो. बिजनेस की भाषा में इसे 'डुओपोली' (Duopoly) कहते हैं.
मतलब दूर-दूर तक कॉम्पिटीशन का सवाल ही नहीं. और बॉस, जब बाजार में प्रतियोगिता खत्म हो जाती है, तो बची हुई कंपनियां ग्राहकों को अपनी मर्जी से लूटती हैं. वोडाफोन का टिके रहना आपके हक में है ताकि बाजार में कॉम्पिटिशन बना रहे.
3. 5G और 6G रोलआउट में आएगी तेजीटैक्स के मुकदमों में जो पैसा फंसने वाला था, अब एयरटेल और वोडाफोन उस पैसे का इस्तेमाल देश में बेहतर 5G इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने और कॉल ड्रॉप जैसी समस्याओं को ठीक करने में कर पाएंगी.
अब क्या सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी?कहानी का अंत अभी नहीं हुआ है गुरु. बोले तो पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त... बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला भले ही कंपनियों के पक्ष में आया है, लेकिन जानकारों का मानना है कि 10 जून की समीक्षा बैठक के बाद डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम (DoT) इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है.
लेकिन कोर्ट ने जिस तरह से सरकार की इस 'पिछली तारीख से वसूली' की नीति को आड़े हाथों लिया है, उसे देखते हुए सरकार के लिए भी आगे की राह आसान नहीं होगी. उद्योग जगत की मांग है कि सरकार को अब इस विवाद को यहीं खत्म कर देना चाहिए ताकि देश में एक 'स्टेबल' और 'बिजनेस-फ्रेंडली' माहौल बन सके.
अब एक सवाल आपके लिए: क्या आपको लगता है कि सरकारों को इस तरह पिछली तारीख से कानून बदलकर कंपनियों पर टैक्स ठोकना चाहिए? या फिर कोर्ट ने 20,000 करोड़ रुपये की ये राहत देकर बिल्कुल सही फैसला किया है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिएगा!
वीडियो: एयरटेल के बाद वोडाफोन आइडिया ने भी बढ़ाई रिचार्ज की कीमतें, अब देने होंगे इतने पैसे






















