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LIC में अपना हिस्सा बेचने से पहले सरकार ने किसके साथ सीक्रेट मीटिंग की, और क्यों?

ब्लूमबर्ग के मुताबिक निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के अधिकारियों ने जानबूझकर बिक्री के समय को गोपनीय रखा.

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एलआईसी देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी है (फोटो क्रेडिट: Business Today)

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  • LIC के शेयर बिक्री के मामले में एक निवेश बैंकर को लेनदेन शुरू होने से कुछ घंटे पहले विनिवेश विभाग के कार्यालय में तलब किया गया और उन्हें OFS की जानकारी दी गई।
  • सरकार ने LIC के शेयरों की बिक्री का समय जानबूझकर गोपनीय रखा ताकि ट्रेडर पहले से तैयार न हो सकें और शेयरों की कीमतों पर दबाव न डाला जा सके।
  • सरकार को LIC की 6.5% हिस्सेदारी बेचने से लगभग 31,500 करोड़ रुपये प्राप्त हुए और चार निवेश बैंकों ने सलाहकार शुल्क नहीं लिया।

LIC के शेयर बिक्री के मामले में सलाह देने वाले एक निवेश बैंकर को लेनदेन शुरू होने से कुछ घंटे पहले विनिवेश विभाग के ऑफिस में तलब किया गया था. इस निवेश बैंकर को कथित तौर पर लास्ट मोमेंट तक यह जानकारी नहीं थी कि उन्हें क्यों बुलाया गया है.

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इंडिया टुडे ने ब्लूमबर्ग के हवाले से यह जानकारी दी है. रिपोर्ट के मुताबिक मामले से वाकिफ सूत्रों ने बताया है कि विनिवेश विभाग के ऑफिस पहुंचने पर सरकारी अधिकारियों ने इस निवेश बैंकर को LIC के ऑफर फॉर सेल (OFS) की जानकारी दी थी. उसे OFS के बारे में स्टॉक एक्सचेंजों को बताने के लिए कहा गया था. लिखा है कि यह गोपनीयता जानबूझकर बरती गई थी. 

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सरकार ने LIC की शेयर बिक्री को क्यों छुपाया?

ब्लूमबर्ग के मुताबिक निवेश और सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के अधिकारियों ने जानबूझकर बिक्री के समय को गोपनीय रखा. इसकी वजह ये थी कि सरकार नहीं चाहती थी कि ट्रेडर पहले से तैयारी कर सकें. अधिकारियों को डर था कि अगर कारोबारियों को पहले भनक लग गई कि सरकार LIC के शेयरों का एक बड़ा हिस्सा बेचने वाली है, तो ये कारोबारी शेयर बिक्री शुरू होने से पहले ही LIC के शेयरों की कीमतों पर दबाव डाल सकते हैं.

ब्लूमबर्ग ने बताया कि सरकार को सलाह देने वाले चारों निवेश बैंकों को भी अलग-अलग चरणों में इसकी जानकारी दी गई. एक बैंकर को सरकार के इस फैसले के बारे में सोमवार 3 अगस्त को शेयर बाजारों को सूचित किए जाने से कुछ ही समय पहले पता चला.

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सरकार ने यह भी फैसला किया कि वह अपनी हिस्सेदारी (जिसे वह बेचना चाहती थी यानी 6.5%) एक साथ बिक्री के लिए लॉन्च नहीं करेगी. इसके बजाय शुरू में LIC में 2.5% हिस्सेदारी की पेशकश की गई. मांग बढ़ने पर बाकी 4% हिस्सेदारी बेचने का रास्ता चुना गया.

रिपोर्ट के मुताबिक कम शेयर ऑफर करने का मकसद ये था कि कंपनी के शेयरों को खरीदार मिल जाएं. इसी रणनीति से कंपनी के ओएफएस को 1.2 गुना अभिदान मिला. इससे सरकार को पूरी 6.5% हिस्सेदारी बेचने और लगभग 31,500 करोड़ रुपये जुटाने में मदद मिली.

बैंकरों ने मुफ्त में काम किया

ब्लूमबर्ग के मुताबिक सरकार को सलाह देने वाले चार निवेश बैंकों में से किसी ने भी 31,500 करोड़ रुपये की बिक्री पर काम करने के लिए सलाहकार शुल्क नहीं लिया. एक निवेश बैंक ने प्रस्ताव प्रक्रिया के दौरान बिना किसी शुल्क के काम करने की पेशकश की थी. इसके चलते अन्य सलाहकारों ने भी अपने शुल्क छोड़ दिए.

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