एक रिटायर कर्मचारी को पीएफ क्लेम के सेटलमेंट में देरी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) पर भारी पड़ गई है. इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक EPFO को 14 लाख रुपये के पीएफ दावे में 35 दिन की देरी के लिए 6% ब्याज सहित पूरी रकम लौटाने का निर्देश दिया गया है.
PF क्लेम में 35 दिन की देरी, EPFO को कोर्ट ने लगाई फटकार, 6% ब्याज के साथ पैसा देने का निर्देश
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने एक कर्मचारी के 14 लाख रुपये पीएफ क्लेम को 35 दिन लटकाए रखा था. कंज्यूमर कोर्ट ने इस पर सख्ती दिखाते हुए 6% ब्याज सहित पेमेंट का निर्देश दिया है.

एक कंज्यूमर कोर्ट ने 14 लाख रुपये से ज्यादा के पीएफ क्लेम देने में 35 दिनों की देरी के लिए 6% ब्याज का भुगतान करने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने माना कि ईपीएफओ ईपीएफ स्कीम 1952 के तहत, निर्धारित 20 दिनों की अवधि के भीतर दावे पर कार्रवाई करने में विफल रहा.
ईपीएफओ को 45 दिन में करना होगा कोर्ट के आदेश का पालनपिछले हफ्ते पारित एक आदेश में इसे मुंबई उपनगरीय जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ईपीएफओ को सेवा में कमी का दोषी पाया. आयोग ने संगठन को 9 नवंबर 2016 से 13 दिसंबर 2016 तक की विलंब अवधि के लिए 14 लाख 6 हजार 272 रुपये की क्लेम राशि पर 6% सालाना की दर से ब्याज का भुगतान करने का आदेश दिया. ईपीएफओ को आदेश का पालन करने के लिए 45 दिन का समय दिया गया है.
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इस मामले की शिकायत करने वाले रिटायर कर्मचारी फ्लीट मैरीटाइम सर्विसेज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड में काम करते थे.अपने रिटायरमेंट के बाद उन्होंने 19 अक्टूबर 2016 को अपने पीएफ का क्लेम किया था. लेकिन ईपीएफओ ने निर्धारित समय-सीमा के भीतर इसका निपटारा नहीं किया.
ईपीएफओ ने तर्क दिया कि मूल दावे के साथ जरूरी संयुक्त घोषणा पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था. इसकी वजह से 7 नवंबर 2016 को पीएफ क्लेम से जुड़े सभी कागज वापस कर दिए गए थे. ईपीएफओ ने कहा कि दस्तावेजों का पूरा सेट 2 दिसंबर, 2016 को ही मिला. इसके बाद 14 दिसंबर 2016 को 20 दिनों के भीतर पीएफ क्लेम निपटाया गया.
हालांकि, आयोग ने ईपीएफओ के बचाव को खारिज कर दिया. आयोग ने कहा कि संगठन शिकायतकर्ता को भेजे गए किसी भी लिखित अस्वीकृति पत्र या कमी संबंधी सबूतों को प्रस्तुत करने में विफल रहा है. यह साबित नहीं हो सकता है कि पहले जो कागज दिए गए थे वे पूरे नहीं थे.
‘सेवा में कमी’ का दोषी माना गयाकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विपक्षी पक्ष यह साबित करने में विफल रहा है कि 19 अक्टूबर 2016 को कर्मचारी द्वारा किया गया दावा अधूरा था. कंज्यूमर कोर्ट ने आगे कहा कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन को निर्धारित अवधि के भीतर दावे पर कार्रवाई करके उसका निपटारा कर देना चाहिए था. कोर्ट ने माना ऐसा न करना 'सेवा में कमी' के बराबर है.
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