E20 या Ethanol Blended Petrol (EBP) के टैंक में अब टैंक मालिकों की भी इंट्री हो गई है. टैंक मालिक मतलब पेट्रोल पंप के मालिक. पेट्रोल पंप मालिकों का कहना है कि एथेनॉल की पानी सोखने की खासियत (हाइग्रोस्कोपिक नेचर) की वजह से मॉनसून और तटीय इलाकों में उनके E20 स्टॉक में मिलावट हो रही है, क्योंकि मौजूदा अंडरग्राउंड स्टोरेज टैंक पारंपरिक पेट्रोल के हिसाब से बनाए गए थे, न कि ज्यादा एथेनॉल मिक्स वाले फ्यूल के लिए. नाम नहीं बताने की शर्त पर तीन पेट्रोल पंप मालिकों ने 'द हिंदू' से E20 लागू करने को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं.
एथेनॉल वाले पेट्रोल से अब पंप वाले परेशान, पानी सोखने की आदत आफत बन गई
पेट्रोल पंप मालिकों का कहना है कि एथेनॉल की पानी सोखने की खासियत (हाइग्रोस्कोपिक नेचर) की वजह से मॉनसून और तटीय इलाकों में उनके E20 स्टॉक में मिलावट हो रही है, क्योंकि मौजूदा अंडरग्राउंड स्टोरेज टैंक पारंपरिक पेट्रोल के हिसाब से बनाए गए थे, न कि ज्यादा एथेनॉल मिक्स वाले फ्यूल के लिए.


पेट्रोल पंप मालिकों की ये चिंता ऐसे समय में सामने आई है जब पहले से ही सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो वायरल हैं जिनमें कथित तौर पर ग्राहकों को फ्यूल डिस्पेंसर से E20 के बजाय गंदा पानी भरते हुए दिखाया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक तेल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल पंप मालिकों से इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी न बोलने का निर्देश दिया है. उनमें से एक ने कहा, "इस वजह से गाड़ियां स्टार्ट नहीं हो सकती हैं या कुछ दूर चलने के बाद खराब हो सकती हैं. हमें इस मिलावट के बारे में तभी पता चलता है जब ऐसे ग्राहक शिकायत लेकर हमारे पास आते हैं."
'द हिंदू' को इंडस्ट्री के एक जानकार ने बताया,
"जमीन के नीचे बने जिन टैंकों में फ्यूल रखा जाता है, उनमें अक्सर कुछ मात्रा में पानी आ जाता है. ऐसा बारिश के पानी के अंदर जाने, नमी, भाप के जमने या पेट्रोल पंप तक पेट्रोल लाने वाले टैंकर से पानी के मिल जाने की वजह से होता है. जब जमीन के नीचे बने टैंकों में मौजूद पूरे E20 स्टॉक में पानी की मात्रा 0.5 फीसदी से ज़्यादा हो जाती है, तो एथेनॉल पानी के साथ मिल जाता है क्योंकि इसकी प्रकृति तो पानी को सोखने वाली (हाइग्रोस्कोपिक) होती है. इसके बाद इससे 'फेज़ सेपरेशन' होता है, जिसमें पानी और एथेनॉल का मिश्रण टैंक की तली में बैठ जाता है, जबकि पेट्रोल ऊपर एक अलग परत बना लेता है."
पंप मालिकों ने आगे बताया कि डिस्पेंसिंग यूनिट जमीन के नीचे बने टैंक के तल से फ्यूल ऊपर खींचती है, इसलिए कुछ गाड़ियों में E20 के बजाय पानी वाला यह मिश्रण जा सकता है. इसकी वजह से तटीय इलाकों में चिंताएं और बढ़ गईं, क्योंकि वहां जमीन के नीचे पानी होता है.
पेट्रोल पंप के कुछ मालिकों ने यह भी आशंका जताई कि माइल्ड स्टील से बने अंडरग्राउंड टैंक और पाइपलाइन में जंग लगने का खतरा बढ़ सकता है, क्योंकि एथेनॉल पानी सोखता है, जिससे फ्यूल के खराब होने की संभावना बढ़ जाती है. हालांकि, कुछ लोगों का कहना था कि तेल कंपनियों ने E20 के लिए तैयारी करते हुए पेट्रोल डिस्पेंसिंग यूनिट्स में सील और वॉशर को नियोप्रीन रबर से बदल दिया है. लेकिन पानी मिलने का डर तो है ही.
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पंप मालिकों का खर्चा बढ़ रहा हैपेट्रोल पंप डीलरों ने बताया कि उन्हें दिन में तीन बार अंडरग्राउंड स्टोरेज टैंक में पानी की मिलावट की जांच करने का निर्देश दिया गया है, और मॉनसून के दौरान यह जांच हर दो घंटे में एक बार करनी होती है. कई पंप ऐसी डिपस्टिक का इस्तेमाल करते हैं जिस पर पानी का पता लगाने वाला पेस्ट लगा होता है जो पानी के संपर्क में आने पर लाल हो जाता है. अगर मिलावट का पता चलता है, तो डीलर ऑयल मार्केटिंग कंपनी को सूचित करता है, जो हैंड पंप का इस्तेमाल करके टैंक से पानी निकालने के लिए कर्मचारी को भेजती है. इस चक्कर में अगर तेल खराब हुआ तो उसे फेंकना पड़ता है. ऊपर बताए गए लोगों में से एक ने कहा कि हाल ही में उनका 600 लीटर फ्यूल खराब हो गया, जबकि कुछ अन्य डीलरों का 20,000 लीटर तक का स्टॉक खराब हो गया. उन्होंने ऐसे खराब फ्यूल को फेंकने के लिए गाइडलाइंस की भी मांग की है.
मिलावट पर जीरो टॉलरेंस- इंडियन ऑयलएक प्रेस बयान में, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) ने कहा कि मिलावट के मामले में उनकी 'जीरो टॉलरेंस' पॉलिसी है. कंपनी ने बताया कि क्वालिटी सही करने के कड़े सिस्टम के तहत रेगुलर इंस्पेक्शन, अचानक जांच और साइंटिफिक टेस्टिंग की जाती है. सिर्फ़ पिछले हफ्ते ही कंपनी ने अपने रिटेल आउटलेट्स पर अचानक 10,000 जांच कीं, 8,500 से ज़्यादा क्वालिटी टेस्ट किए और इसकी स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए सैकड़ों स्पेशल इंस्पेक्शन टीमें तैनात कीं.
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ठीक बात ये तो होना ही चाहिए. फ्यूल में पानी नहीं मिलना चाहिए. टैंक में जंग नहीं लगना चाहिए. E20 फ्यूल से गाड़ी खराब नहीं होनी चाहिए. मगर ये सब हो तो रहा है. रायपुर का मारुति केस इसकी एक बानगी है.
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