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LGBTQ के खून देने पर लगाया बैन NACO की बीमारी की ओर इशारा करता है

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नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (NACO). भारत में एड्स से रोकथाम और इलाज का काम देखने वाली संस्था. टीवी पर आने वाले इसके एड देखकर ये संस्था बड़ी प्रोग्रेसिव लगती है. एक-एक कर के इसने एड्स के इर्द-गिर्द बहुत सारे मिथक तोड़े हैं. लेकिन अब इसने दिल तोड़ने वाली बात की है. कहा है कि LGBTQ कम्युनिटी के लोग ब्लड न दें क्योंकि वो हाई रिस्क ग्रुप में आते हैं. एलजीबीटी माने लेस्बियन, गे, बाईसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर. वो लोग, जिन्हें समलैंगिक कहा जाता है.

ये हमें मालूम चला चेतन कोठारी की वजह से. चेतन एक RTI एक्टिविस्ट हैं. उन्होंने 26 अप्रैल 2017 को NACO वालों को RTI वाला कागज़ दिया था. NACO के ब्लड सेफ्टी डिविज़न ने 22 जून 2017 को उस पर माथापच्ची की. फिर 30 जून 2017 को NACO के सेंट्रल पब्लिक इंफॉर्मेशन ऑफिसर (CPIO) ने इसका जवाब दिया. इतनी तारीखें इसलिए बताईं कि आप जान जाएं कि NACO ने जल्दबाज़ी में ऐसा नहीं कहा होगा. उनके पास पर्याप्त वक्त था.

इस तरह सोचने वाला NACO अकेला नहीं है. कई डॉक्टर भी ऐसा मानते हैं कि LGBTQ कम्युनिटी के लोगों के कई पार्टनर होते हैं, जिनके साथ वो संभोग करते हैं. इस तरह उनके HIV पॉज़िटिव होने की संभावना ज़्यादा होती है. HIV पॉज़िटिव आदमी का खून किसी को चढ़ाने से उसे भी HIV हो सकता है. तो HIV को रोकने का एक तरीका ये हुआ कि LGBTQ लोगों को ब्लड डोनेट ही न करने दो!

दुनिया भर के शहरों में 'गे प्राइड परेड' आयोजित होती हैं, लेकिन LGBT समुदाय के लिए पूर्वाग्रह जस के तस बने हुए हैं. (फोटोःरॉयटर्स)
दुनिया भर के शहरों में ‘गे प्राइड परेड’ आयोजित होती हैं, लेकिन LGBT समुदाय के लिए पूर्वाग्रह जस के तस बने हुए हैं. (फोटोःरॉयटर्स)

LGBTQ में ज़्यादा भेदभाव गे लोगों को झेलना पड़ता है

पूरा LGBTQ समुदाय लोगों की नज़र में अपराधी ही होता है, लेकिन ज़्यादा निशाने पर गे लोग रहते हैं. इनके लिए ‘मेन हू स्लीप विद मेन’ (MSM) टर्म का इस्तेमाल किया जाता है. हमने इस बारे में फोर्टिस हॉस्पिटल चंडीगढ़ के डॉक्टर निशांत जोशी से बात की. उन्होंने कहा,

”मौजूदा रिसर्च के मुताबिक गे लोगों में HIV के केस हेट्रोसेक्शुअल लोगों की अपेक्षा कुछ ज़्यादा सामने आते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि गुदा मैथुन (एनल सेक्स) के दौरान गुदा (एनस) में मौजूद म्यूकस मेंब्रेन के टूटने की संभावना रहती है. ब्लीडिंग भी हो सकती है. तो HIV फैलने की संभावना बढ़ जाती है. एक औरत और मर्द के बीच ‘प्राकृतिक’ संभोग के मामले में ऐसा कम होता है. 

खून चढ़ाने से पहले तमाम टेस्ट किए जाते हैं. लेकिन कोई भी टेस्ट पूरी तरह सही साबित नहीं हो सकता. ना ही स्क्रीनिंग को फूल प्रूफ किया जा सकता है. इसलिए कोशिश रहती है कि खून ऐसे लोगों से लिया जाए जिनके HIV संक्रमित होने का खतरा कम से कम हो.”

तो NACO के जवाब की एक वजह सामने आती है. लेकिन तमाम रिसर्च के हवाले के बावजूद NACO का रवैया सही नहीं कहा जा सकता. वो इसलिए कि NACO ने भी उस पूर्वाग्रह को सच मान लिया है जिसके मुताबिक गे लोग ‘हाइपरसेक्शुअल’ होते हैं. माने ये लगातार अलग-अलग पार्टनर के साथ संभोग करते हैं. इसके साथ ही ये अनुमान भी लगा लिया गया है कि गे लोग प्रोटेक्शन इस्तेमाल नहीं करते.

कुछेक उदाहरणों को लेकर एक पूरे समाज पर इस तरह का ब्लैंकेट बैन लगाना किसी भी तर्क के बावजूद गलत ही रहेगा. हाइपसेक्शुएलिटी और असुरक्षित यौन क्रिया हेट्रोसेक्शुअल लोग भी कर सकते हैं. जांच में उनका सैम्पल भी फेल हो सकता है.

खून चढ़ाने से पहले उसकी जांच की जाती है, लेकिन कोई जांच सुरक्षा की गैरंटी नहीं होती. इसलिए कोशिश रहती है कि 'सुरक्षित स्रोत' से खून लिया जाए. (फोटोःरॉयटर्स)
खून चढ़ाने से पहले उसकी जांच की जाती है, लेकिन कोई जांच सुरक्षा की गैरंटी नहीं होती. इसलिए कोशिश रहती है कि ‘सुरक्षित स्रोत’ से खून लिया जाए. (फोटोःरॉयटर्स)

और भी भ्रांतियां हैं लोगों में

सही जानकारी के अभाव में कई लोग ये मानते हैं कि LGBTQ लोगों का खून चढ़ाने से ‘उस तरह के’ हॉर्मोन भी उनके शरीर में आ जाएंगे. NACO के बैन से इस तरह के भ्रम पक्के हो सकते हैं. लोग मान कर चलने लगते हैं, कुछ तो गड़बड़ है, तभी तो बैन लगा है.

जबकि सच ये है कि अगर कोई गे संभोग के दौरान प्रोटेक्शन इस्तेमाल करता हो, तो उसका खून किसी हेट्रोसेक्शुअल के खून जितना ही सुरक्षित होगा. ये जानकारी भी हमें डॉक्टर निशांत जोशी ने ही दी है.

रक्तदान एक भावनात्मक मुद्दा भी है

रक्तदान सिर्फ मेडिकल वजहों से नहीं किया जाता. ज़रूरत के वक्त किसी के लिए खून देने से आपको एक अलग तरह का जुड़ाव महसूस होता है. एक अलहदा आत्मिक शांति मिलती है. कैंप में किसी अंजान के लिए खून देते वक्त भी ऐसा ही लगता है. इसीलिए मुसीबत के समय लोग बड़ी संख्या में खून देने पहुंचते हैं. खून देने पर बैन से LGBTQ समुदाय इस खुशी से भी कट जाता है.

जून 2016 में अमरीका के ऑरलैंडो में एक गे क्लब में एक आदमी असॉल्ट राइफल लेकर घुस गया और अंधाधुंध फायरिंग कर दी. 49 लोगों की जान गई. घायलों को अस्पताल ले जाया गया. इसकी खबर लगते ही बड़ी संख्या में LGBTQ लोग खून देने अस्पताल गए. वो ज़रूरत के वक्त अपनी कम्युनिटी का साथ देना चाहते थे. लेकिन उन्हें अस्पताल से वापस भेज दिया गया. अमरीका ने 1983 में MSM के खून देने पर रोक लगा दी थी. लेकिन 2014 में उसने कानून कुछ नर्म किया. लेकिन अब भी अमरीका में MSM खून नहीं दे सकते अगर उन्होंने एक साल के अंदर संभोग किया हो. न्यूज़ीलैंड और ब्रिटेन में इसी तरह का कानून है. कैनेडा में MSM को खून देने के लिए पांच साल तक संभोग से दूर रहना होता है.

फोटोःरॉयटर्स
रक्तदान एक भावनात्म मुद्दा भी है (फोटोःरॉयटर्स)

HIV और ब्लड ट्रांस्फ्यूज़न

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक ब्लड ट्रांस्फ्यूज़न (एक इंसान का खून दूसरे को चढ़ाने से) से HIV का खतरा 0.002% से लेकर 0.85% तक होता है. बेहतर स्क्रीनिंग के ज़रिए इसे और कम किया जा सकता है.

फ्रांस से सीख सकता है NACO

फ्रांस ने भी अमरीका के साथ ही 1983 में MSM के खून देने पर रोक लगाई थी. लेकिन 2014 में वहां की सरकार ने माना कि ये कानून बेज़ा भेदभाव करते हैं और उन्हें पलट दिया. अब फ्रांस में कोई भी ब्लड डोनेट कर सकता है. इसका ऐलान करते हुए फ्रांस के सामाजिक मामलों की मंत्री मैरिसॉल टूरेन ने कहा,

”ब्लड डोनेट करना एक नागरिक होने के नाते उदारता प्रकट करने का मामला है. किसी के यौन बर्ताव के आधार पर उसे इस से दूर नहीं रखा जा सकता”

यहां ये नहीं कहा जा रहा है कि मेडिकल साइंस की तमाम रिसर्च को कचरे के डिब्बे में डाल दिया जाए. एड्स एक भयानक बीमारी है जो आज भी लाइलाज है. तो रोकथाम के लिए जो बन पड़े, करना चाहिए. लेकिन जिस तरह का बैन NACO ने लगाया है, उस से एड्स का खतरा टालने की पूरी कीमत एक समुदाय की भावनाएं चुका रही हैं. वो भी तब, जब हेट्रोसेक्शुअल लोगों का खून भी कमोबेश वही सारे खतरे लिए होता है, जितने कि गे लोगों का खून में बताए जाते हैं.

होना ये चाहिए कि फ्रांस की तरह खून देने से पहले होने वाली स्क्रीनिंग को बेहतर किया जाए जिस से LGBTQ और हेट्रोसेक्शुअल दोनों तरह के लोगों के सैम्पल की सही जानकारी समय रहते मिल जाए. इसके बाद किसी से खून लेने से पहले ये पूछने की नौबत नहीं आएगी, कि उसका/उसकी साथी औरत है या मर्द.

मामला लोगों की सेहत का भी है और भावनाओं का भी.


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