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मैं शिया हूं. सुन्नियों के साथ नमाज़ पढ़ता हूं. हिंदुओं के साथ ईद मनाता हूं!

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REHAN_ABBASमेरा तरीका ए मजहब क्या पूछती हो मुन्नी
शिया के साथ शिया सुन्नी के साथ सुन्नी

रेहान अब्बास पत्रकार हैं. टीवी वाले. एक बड़े वाले मीडिया हाउस में सीनियर प्रोड्यूसर हैं.लिखते भी हैं. ईद है. है या थी कि बहस में पड़े बिना रेहान जी को पढ़िए. वो ईद पर क्या साझा कर रहे हैं.


वो अक्सर कहता है. मैं शिया हूं. सुन्नियों के साथ ईद की नमाज़ पढ़ता हूं और हिन्दुओं के साथ शाम को ईद मनाता हूं. वो भी शराब और कबाब के साथ.

ये हैं मेरे दोस्त फ़राज़ अली नक़वी. मस्त मलंग. धर्म से कोई नाता नहीं. ईद पर सुबह थोड़ी देर के लिये मुसलमान बन जाते हैं. ऐसा करने के पीछे वजह ख़ुदा का ख़ौफ़ नहीं बल्कि घरवालों का दबाव होता है. जिसे वो ख़ुद पुकारते हैं ख़ुदा का दबाव नहीं बल्कि घरवालों का ख़ौफ़. क्योंकि उनके हिसाब से ख़ुदा ने मज़हब के हर दबाव से उन्हें बरी कर रखा है.

आम दिनों में तो वो नमाज़ से बच जाते हैं लेकिन ईद के दिन उनके लिए बचना मुश्किल हो जाता है. क्योंकि उस दिन घरवालों की तमाम निगाहें घर के तमाम लोगों पर रहती हैं. इसलिए ईद के दिन नमाज़ से बचने का चोर दरवाज़ा उनको नहीं मिल पाता. वैसे उनके हिसाब से मज़हब के नाम पर जिस तरह की आतंकी आतिश-बाज़ियां खेली जा रही हैं उस माहौल में उनके जैसे ईमान वालों की ज़्यादा ज़रूरत है.

अपने इस बेबाक ईमान के वो इस क़दर पक्के हैं कि पक्के सा पक्के मुसलमान लंबे कुर्ते, छोटे पयजामे और दाढ़ी वाले उनसे घबराते हैं, कि कहीं ज़्यादा फ़राज़ के साथ रहे तो ईद की नमाज़ के बाद शराब और कबाब के साथ शाम में वो भी अपना ईमान तौलते नज़र ना आएं. दलीलें ही कुछ ऐसी हैं उनके पास. कुछ यूं मान लें कि धर्म मानने वालों के बीच में वो किसी सांस्कृतिक आतंकवादी से कम नहीं. कभी-कभी उनके जेब से गांजे की पुड़िया भी बरामद हुई है. जिसे भोले बाबा का प्रसाद समझ कर ईद की शाम में सुबह की नमाज़ के बाद खींचना वो किसी मज़हबी कार्रवाई से कम नहीं समझते. वैसे इस काम को बेहिचक होली, दीवाली पर अपने दोस्तों के साथ धड़ल्ले से करते नज़र आते हैं.

तो ख़ैर बात हो रही थी ईद पर उनके नमाज़ पढ़ने की तो, फ़राज़ अली शिया हैं और उनकी बीवी सुन्नी. तो ज़ाहिर है उनके ससुर भी सुन्नी हुए. और नमाज़ वो हमेशा अपने ससुर के साथ पढ़ते हैं. जब पहली बार ससुर के साथ वो नमाज़ पढ़ने गए तो वहां उन्होंने पाया कि लोग हाथ सामने बांध कर नमाज़ पढ़ रहे हैं. बचपन में कभी उन्होंने ऐसे नमाज़ नहीं पढ़ी थी. शिया थे तो बाप के ख़ौफ़ से शिया मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जाते थे. वहां सब सामने हाथ खोल कर नमाज़ पढ़ते थे.

कोई पक्का शिया होता या तो मस्जिद बदलता या फिर हाथ बांध कर तो क़त्तई ना पढ़ता. लेकिन शिवरात्रि पर गांजा खींचने के शौक़ीन फ़राज़ ने इन बातों का कोई असर नहीं लिया. वो सुन्नियों के बीच सुन्नी बन गए. फिर उनका कहना ये भी है कि कौन सा मैं नमाज़ पढ़ा रहा हूं. मुझे तो नमाज़ पढ़ाने वालो ईमाम और लोगों के पीछे कुछ वैसा ही करना है जैसा दूसरे कर रहे हैं. एक बार ये सुन कर कि फ़राज़ सिर्फ़ नमाज़ की नक़ल करके ईद के दिन मुसलमान बन जाते हैं, उनका दोस्त अतुल सचदेवा भी उनके साथ ईद की नमाज़ पढ़ आया.

ऐसे ही बहुत से दूसरे उनके दोस्त मसलन राहुल, रमेश, अनुज, अभिषेक उनके साथ नमाज़ पढ़ने जा चुके हैं. और फ़राज़ वैसे ही इनके साथ शिवरात्रि पर भोले बाबा का प्रसाद- कभी भांग तो कभी गांजा-पीते और खींचते रहे. अजब क़िस्म का लव जिहाद है ये भी.

तो अब समझ में आ गया होगा, आप लोगों को भी, कि क्यों फ़राज़ अली नक़वी कहते हैं कि मैं शिया हूं. सुन्नियों के साथ ईद की नमाज़ पढ़ता हूं. और हिंदुओं के साथ शाम में ईद मनाता हूं. नहीं समझ में आया तो बता दूं इसलिए कि फ़राज़ और उनका देखा-देखी उनके दोस्त राहुल, रजत, या रमेश, धर्म मानते नहीं बल्कि मनाते हैं. धर्म उनके लिये जंग नहीं जश्न है.

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