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'कुंवर नारायण को पढ़ते हुए अक्सर कवाफ़िस और लुई बोर्खेस की याद आती है'

असद़ ज़ैदी की कलम से.

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असद ज़ैदी, कवि-साहित्यकार
असद ज़ैदी

कुंवर नारायण (1927 – 2017) अब भी हैं. उनकी कविताएं, उनके लेख, उनके विचार और वो सब कुछ भी जो अलग-अलग समय में अलग-अलग कवियों, लेखकों, समीक्षकों और पाठकों ने कुंवर नारायण के विषय में लिखा है.

ये सभी बातें, राय और टिप्पणियां उनके ज़ानिब खुलने वाले दरवाज़ों की मानिंद हैं जिनसे गुज़रकर हमें एक कवि, एक साहित्यकार, एक मानवतावादी और एक व्यक्ति – कुंवर नारायण के विषय में और अधिक जानने को मिलता है. प्रस्तुत लेख कवि और साहित्यकार असद ज़ैदी  जी द्वारा कुंवरजी को ज्ञानपीठ दिए जाने की घोषणा (2005) के बाद दैनिक,’आज समाज’ के लिए लिखा गया था. जिसे बाद में अनुराग वत्स ने अपने ब्लॉग/ऑनलाइन पत्रिका सबद में संकलित किया था. आपको यहां पढ़वा रहे हैं.


‘ईमान का खाता’ : कुंवर नारायण और उनकी कविता

धीरे धीरे टूटता जाता
मेरी ही हंसी से मेरा नाता

कुंवर नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा है जिसने बहुत ज़माना देखा है. वह अपने तजुर्बे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते हैं और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहते हैं. काव्यशास्त्रीय नज़र से देखें तो कह सकते हैं उनके लहजे ही में सब कुछ है. उनको पढ़ते हुए लगता है कि उनका काफ़ी ज़ोर अपने इसी लहजे को साधे रखने और इसी ठाठ को बनाए रखने में सर्फ़ होता है–यही उनकी तर्ज़ है. बुफ़ों के शब्दों में : ‘द स्टाइल इज़ द मैन’.

पर यह कहना असंगत न होगा कि स्टाइलिस्टों से कुलबुलाते काव्य-परिदृश्य में वह एक महत्वपूर्ण स्टाइलिस्ट-भर नहीं हैं. वह मूलतः नैतिक और सामाजिक रूप से अत्यन्त सावधान और प्रतिबद्ध कवि हैं. हिन्दी के अव्वलीन नागरिक-कवि का कार्यभार और अधिकार अब उन्हीं के पास है. एक ज़माना पहले, 1960 के दशक के आरंभिक वर्षों में, मुक्तिबोध ने उन्हें अपने समीक्षात्माक लेख में ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना’ का कवि कहा था. कुंवर नारायण ने हरदम मुक्तिबोध की इस निशानदेही का मान रखा और कभी भी पहचान के इस घेरे से बाहर नहीं गए.

उनकी शाइस्तगी, संतुलन, नर्म-मिज़ाजी और धैर्यशील तबियत की वजह से उन्हें मध्यममार्गी विचारधारा का प्रतिनिधि कवि माना जाता है. यह कोई ग़लत धारणा भी नहीं है पर यह उनके मूल स्वभाव का ठीक से अहाता नहीं करती. वह एक बेचैन, नाराज़ और मेहनती इंसान भी हैं. अपने समय के गंभीर मानवीय सवालों पर–वे राजनीतिक हों या सांस्कृतिक–वह पोज़ीशन लेने से नहीं बचते. वह अपनी वज़ेदारी या मुरव्वत-पसंदी को बेशतर अपने ईमान के आड़े नहीं आने देते. उनकी तबियत ही को उनकी शख्सियत और काम का समानार्थक मान लेना उन्हें एक पहले से बने खांचे में ढालना है.

यूं भी आम विमर्शों में ‘मध्यम मार्ग’ का बहुत भ्रामक अर्थों में इस्तेमाल होता रहता है. अव्वल तो एक ऐसे मुल्क और ज़बान में जहां मध्यममार्ग आम तौर पर लद्धड़पन और विकल्पहीनता का ही दूसरा नाम होता है, उसे एक उस्तादाना आत्मविश्वास के साथ आकर्षक, रचनात्मक और नैतिक रूप से विश्वसनीय बनाना कोई आसान काम नहीं है.

दूसरे, कुंवर नारायण का मध्यममार्ग कोई ‘सेफ़’ या आसान मार्ग भी नहीं है.

उनकी प्रगतिशीलता या गतिशीलता और रैडिकलिज़्म इस बात में है कि वह मध्यममार्ग की ओट में यथास्थितिवाद से समझौता नहीं करते, बल्कि बार-बार यथास्थिति की विडंबनाओं और अतियों को ही निशाना बनाते हैं. वह विकल्प को सम्भव और प्रतिरोध को ज़रूरी मानते हैं. वह उस सिनिसिज़्म को अपने पास नहीं फटकने देते जो सत्ता और प्रतिरोध के दरम्यान, यथास्थिति और विकल्प के दरम्यान, लगातार नैतिक बराबरी खोजता रहता है. नैतिक समतुल्यता की तलाश, बल्कि चाह, हमारे मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी जगत का प्रिय शग़ल है जो कि सामाजिक प्रतिक्रियावाद का ही एक रूप है. यह वह लिबास है जो मध्यमवर्गीय बौद्धिकों की उरियानी को ढकता है. ऐसा नहीं है कि कुंवर नारायण की नज़र वैकल्पिक राहों के ख़तरों और गड्ढों पर नहीं रहती : वह उनको लेकर ख़ुद को और दूसरों को आगाह और तैयार भी करते हैं, पर किसी हाल में यथास्थिति में रिलैप्स नहीं करते.

कुंवर नारायण ने अपने कृतित्व में जितना ध्यान देखने, सुनने और बोलने में लगाया है उससे ज़्यादा जानने, जज़्ब करने और समझने में सर्फ़ किया है. उनके जैसी अध्ययनशील और मननशील कविता अपने लिए काफ़ी जगह और अवकाश मांगती है. फिर उसे एक दिलकश सादगी, विनम्रता, सम्प्रेषणीयता और लुत्फ़ के साथ पेश होना होता है. यहां भी इसके पीछे की जो मशक़्क़त और उधेड़बुन है वह दिखाई नहीं देती, अपने कारख़ाने को वह ओझल ही रखते हैं. वहां निहित ऊर्जा भी अपनी ओर ध्यान नहीं खींचती.

ऐसा किफ़ायत-शुआर कवि जब कहता है ‘अबकी बार लौटा तो / बृहत्तर लौटूंगा’ तो यह एक बहुत बड़ा वक्तव्य बन जाता है, एक साथ विश्वसनीय और लगभग पौराणिक. कुंवर नारायण का हुनर यही है : उन्हें मालूम है कि उनकी सामर्थ्य का बिन्दु कब और कहां आ रहा है. उन्हें उसे पाने के लिए ज़ोर आज़माईश नहीं करनी पड़ती. जब वह कहते हैं कि ‘इन गलियों से / बेदाग़ गुजर जाता तो अच्छा था’ तो पिछले बीस-तीस साल का भारतीय इतिहास ही नहीं, सारा का सारा भारतीय दुखांत आंखों के सामने घूम जाता है. इन दो पंक्तियों में क्या नहीं है ? कुंवर जी के काव्य में दर्दमंदी तो है ही, ‘अपने ही सिरहाने बैठकर’ अपने को देखने की बेदर्द कोशिश भी है.

उनकी कविता में कई ज़बानों, कई वक़्तों, और कई साहित्यिक संस्कृतियों का संगम है.  जो उन्हीं जैसे गुणग्राहक और पारखी कवि थे.

और उनकी दिलचस्पियों का घेरा भी काफ़ी बड़ा है : इतिहास, पुरातत्व, सिनेमा, संगीत, कला, क्लासिकल साहित्य, आधुनिक विचार, समकालीन विश्व साहित्य, संस्कृति विमर्श. उर्दू की क्लासिकी कविता तो उनकी प्रेरणा का स्रोत रही ही है.

इन सब चीज़ों पर और बहुत सी बातों पर सोचते हुए जिस एकमात्र हिन्दी कवि की बार-बार याद आती है वह हैं उनके पुराने साथी रघुवीर सहाय, जिन्हें गए अब क़रीब बीस साल हो जाएंगे. दोनों एक ही परम्परा के जुड़वां वारिस हैं, दोनों की अपनी-अपनी ज़मीन है–कुंवर नारायण का इलाक़ा ज़्यादा बड़ा है, उनके यहां ज़्यादा चीज़ें, ज़्यादा आवाज़ें, ज़्यादा भाषाएं और ज़्यादा स्वीकार है. वह कम मध्यमवर्गीय और कम परेशान हैं. पर न सिर्फ़ उनके काम एक-दूसरे के पूरक हैं, बल्कि दोनों की खामोशियां और नाराज़ियां एक ही तरह की हैं. अपनी चुप्पी और फ़िक्रमन्दी में वे बिल्कुल एक हैं. दोनों के शाइर नासिख़ नहीं ग़ालिब ठहरते हैं, और दोनों अनीस से ज़्यादा मीर की महफ़िल में दिखाई देते हैं. उर्दू में जिसे ‘देहलवियत’ कहा जाता है, हिन्दी कविता में वह चीज़ और वह तर्ज़ लखनऊ के इन दो हिन्दी कवियों में पाई जाती है. वह शोखी से बचते हैं पर अपनी ज़राफ़त दिखाते हुए कहते हैं : ‘लगता है कोई भीषण दुर्व्यवस्था / हमारी रक्षा कर रही.’

ज्ञानपीठ सम्मान हिन्दी कविता की इस महान, पर अपेक्षाकृत ख़ामोश, लखनवी परम्परा का सम्मान है.

ज्ञानपीठ पुरस्कार ने भी, जो बीच-बीच में बुरी तरह लड़खड़ा जाता है, कुंवर नारायण के बहाने कुछ विश्वसनीयता और प्रासंगिकता वापस पाई है.


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वीडियो देखें: कुंवर नारायण जी की कविता – ‘बात सीधी थी, पर..’

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