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एक और चर्चित एक्टिविस्ट राजनीति का रुख कर रहा है

माओवाद क्रांति की बात करता है. कहता है कि क्रांति बंदूक की नाल के रास्त आएगी. लेकिन क्रांति आए, उस से पहले उसका संदेश लोगों तक पहुंचाना पड़ता है. लोगों को समझाना पड़ता है कि क्रांति है क्या और क्यों ज़रूरी है. लेकिन क्रांति से उलट क्रांति के संदेश में बंदूक की नाल की कोई भूमिका नहीं होती. क्योंकि वो गा नहीं सकती. तो ये काम आता है विट्टल राव ‘गदर’ जैसे माओवादी कार्यकर्ताओं के सिर. ऐसे लोग, जो क्रांति की बात को मोटी-मोटी किताबों से निकाल कर गांव के नुक्कड़ पर इस तरह रख देते हैं कि अनपढ़ भी ग्रामशी और मार्क्स का मर्म समझ जाए. और ऐसा करने में उनकी तरफ गोली भी चल जाए तो मुंह से इंकलाब का गाना ही निकलता है.

इसी तरह अपनी पूरी ज़िंदगी माओवाद का संदेश पढ़ते हुए बिताने वाले गदर के बारे में कयास लगाए जा रहे हैं कि वो मुख्यधारा की ओर लौटेंगे और चुनावी राजनीति करेंगे. आज हम उन्हें जानेंगे.

गदर.
गदर. (फोटोः स्रोत )

गदर की ‘पैदाइश’

गदर तेलंगाना के मेडक ज़िले से आते हैं. आज़ादी से 2 साल बाद पैदा हुए. तारीख उन्हें याद नहीं. मां बाप ने नाम रखा गुम्मादी विट्टल राव. मां-बाप मज़दूरी करते थे. शुरुआती पढ़ाई निज़ामाबाद और हैदराबाद से हुई. फिर उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के लिए कॉलेज में दाखिला लिया. लेकिन पढ़ाई में मन लगा नहीं. 1960 के आखिर में बुर्रा कथा गाने लगे. बुर्रा कथा आंध्र और तेलंगाना की एक लोक कला है. एक तरह की किस्सागोई समझ लीजिए. इससे वे तेलंगाना आंदोलन के  बारे में लोगों को जागरूक करते थे. ऐसी दौरान उन पर बी नरसिंग राव की नज़र पड़ी. फिल्में बनाने वाले नरसिंग राव का झुकाव लेफ्ट की तरफ था. वो ‘आर्ट लवर्स असोसिएशन’ नाम से एक फोरम चलाते थे और आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर नुक्कड़ नाटक वगैरह करवाते थे.

बी नरसिंह राव. (फोटोःमिशन तेलंगाना)
बी नरसिंह राव. (फोटोःमिशन तेलंगाना)

नरसिंग राव ने विट्टल को एक बार अपने कार्यक्रम में गाने के लिए बुलाया. मौका था भगत सिंह की बरसी का. नरसिंग को विट्टल जंच गए. नरसिंग के साथ ही विट्टल ने 1971 के करीब ‘अपुरो रिक्शा’ गाना लिखा. अपुरो का मतलब होता है रुको. गाने में सुबह से शाम तक खटने के बावजूद भूखे रह जाने वाले रिक्शा चालक का किस्सा है. मज़दूरों और खासतौर पर रिक्शा चलाने वालों ने इसे खूब पसंद किया. इसके बाद नरसिंग और विट्टल ने ऐसे कई गाने लिखे. इन सभी गानों को एक किताब की शक्ल दी गई जिसका नाम रखा गया ‘गदर.’ ये नाम लिया गया था 1913 के पंजाब में अंग्रेज़ों से लड़ने के लिए खड़ी की गई गदर पार्टी के नाम से.  किताब के आने के बाद जब कभी विट्टल और नरसिंग की टोली कहीं नुक्कड़ नाटक करने जाती, लोग कहते कि गदर के लोग आ गए हैं. यही से ‘गदर’ विट्टल की पहचान के साथ जुड़ा और आगे चल कर उनका नाम बन गया.

माओवाद के लिए सरकारी नौकरी छोड़ी

गदर अपने गीतों और किस्सागोई में ऐसे लोगों की बात करते थे जिन्हें ताकतवर लोगों ने समाज के सबसे निचले पायदान पर ठेल दिया था. वो दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करके भी भूखे रह जाने वाले मज़दूर की बात करते थे. इसके साथ ही पिछड़ी जातियों (खासकर दलितों) पर होने वाले अन्याय की कहनी भी कहते थे. इसलिए राज्य में उन दिनों चल रहे नक्सल आंदोलन से उन्हें बहुत सहानुभूति रही. 1972 में गदर ने ‘आर्ट लवर्स असोसिएशन’ नाम जन नाट्य मंच कर दिया. इस बीच कैनरा बैंक में क्लर्क की नौकरी मिल गई. 9 साल नौकरी करके 1984 में गदर ने नौकरी छोड़ दी. और पूरा वक्त जन नाट्य मंच को देने लगे. इसके बाद नक्सल आंदोलन और जन नाट्य मंच में करीबी इतनी बढ़ गई कि उसे नक्सल आंदोलन का कल्चरल विंग कहा जाने लगा. खासतौर पर भाकपा (माले) के पीपल्स वार ग्रुप का. (पीपल्स वार ग्रुप 2004 में दूसरे नक्सली संगठनों से मिल गया और आज प्रतिबंधित कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के नाम से जाना जाता है)

अंडर ग्राउंड रह कर गदर जहां-जहां गए, उन्होंने लोगों तक माओवाद का संदेश पहुंचाया. वो ओग्गू कथा, वीधी भगोथम और येलम्मा कथा की शैली में किस्सागोई करते. पहनावा एकदम साधारण होता – सफेद धोती और कंधे पर एक काला कंबल. हाथ में एक लाठी. ये सादगी लोगों को बहुत पसंद आती और वो उनकी बातों से जुड़ाव महसूस करते.

मारने की कोशिश हुई, इल्ज़ाम पुलिस पर लगा

ये बात गदर को पुलिस के राडार पर ले आई. पुलिस की छापेमारी बढ़ी तो गदर अंडरग्राउंड हो गए. लेकिन उनका असर कम नहीं हुआ. उनके गीतों में सरकार द्वारा अपने ही लोगों के दमन और शोषण की बातें होती थीं. ये माओवादी प्रोपगैंडा का हिस्सा बने. कहा जाता है कि इन्हीं गानों  के चलते कई लोग नक्सल आंदोलन की ओर मुड़ गए. पुलिस जो नक्सली थे उन्हीं से इतनी परेशान थी कि और नक्सली नहीं चाहती थी. 1997 के अप्रैल में गदर को मारने की कोशिश हुई. कुछ बदमाशों ने उन पर गोली चलाई. गदर को चार गोलियां लगीं जिनमें से एक को निकाला नहीं जा सका क्योंकि उनकी जान को खतरा था. कहा गया कि ये सब पुलिस के इशारे पर हुआ था. इसका जवाब उन्होंने दिया लेकिन अपने अंदाज़ में. कहा,

‘पुलिस गोलियों से मेरी आवाज़ दबाना चाहती है क्योंकि मेरे गाने सरकार पर गोली की तरह चोट करते हैं. एक गोली मेरे बदन में अब भी मौजूद है, सरकार के दमन का प्रतीक बनकर.’

गदर जहां जाते हैं, भारी भीड़ जुटती है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)
गदर जहां जाते हैं, भारी भीड़ जुटती है. (फोटोःविकिमीडिया कॉमन्स)

वक्त के साथ गदर माओवाद से कुछ दूर हुए. लेकिन वापस लौटकर भी उन्होंने उनके लिए प्रचार करना छोड़ा नहीं. आम लोगों में उनका कद बढ़ता रहा, खासतौर पर वंचितों में. जब कभी उनकी सभा होती तो दूर-दूर से हज़ारों लोग उन्हें सुनने जुटते.  इसलिए आंध्र प्रदेश सरकार उनका कुछ बिगाड़न नहीं पाती थी. 2004 में जब वाय एस राजशेखर रेड्डी की सरकार ने नक्सलियों से बात करनी चाही, गदर को मध्यस्थ बनाया गया.

तेलंगाना आंदोलन में भागीदारी

तेलंगाना को आंध्र प्रदेश से अलग राज्य बनाने के लिए एक लंबा आंदोलन चला. हम में से ज़्यादातर लोग के चंद्रशेखर राव को उस आंदोलन के अकेले चेहरे के रूप में जानते हैं. गदर इस आंदोलन का वो चेहरा थे जिनकी ओर मीडिया का ध्यान ज़रा कम रहा. गदर 1969 से तेलंगाना आंदोलन से जुड़े रहे हैं. गदर ने अपने लोक-गीतों के ज़रिए आंदोलन को तेलंगाना के दूर दराज़ के इलाकों में पहुंचाया. अक्टूबर 2010 में गदर ने ऐलान किया कि वो ‘तेलंगाना प्रजा फ्रंट’ नाम की पार्टी बना कर तेलंगाना के लिए मांग बुलंद करेंगे. गदर ने कसम खाई कि वो तब तक अपने घर में पांव नहीं रखेंगे जब तक तेलंगाना अलग राज्य नहीं बन जाता. एक वक्त कहा जाता था कि तेलंगाना आंदोलन की कमान राव के हाथ से निकल कर गदर के हाथ में आ जाएगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. आंदोलन पर तेलंगाना राष्ट्र समिती की पकड़ बनी रही और अलग तेलंगाना बनने पर राव ही उसके पहले मुख्यमंत्री बने.

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेकर राव
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेकर राव

ऐसा माओवादी जिसे धर्म से परहेज़ नहीं

गदर की छवि आज एक कल्ट छवि के जन नेता हैं. उनके गीत यूट्यूब पर खूब सुने जाते हैं. ‘गाना डॉट कॉम’ और ‘सावन’ जैसी साइट्स पर उनके गाने दुनिया भर में ऑनलाइन सुने जाते हैं. इस दर्जे की प्रसिद्धी उन्हें और माओवादी नेताओं से कुछ अलग बनाती है. एक बात और है. साम्यवाद धर्म को ‘ओपियम ऑफ द मासेस’ मानता है. ऐसी चीज़ जो लोगों को सुलाए रखती है, क्रांति के आड़े आती है. इसली माओ की किताब में धर्म की जगह नहीं है. लेकिन गदर की सोच अलग है. गदर का कहना है कि लोगों की आध्यात्मिक ज़रूरत को पूरा किए बगैर धर्म को नकारना गलत है. उनके मुताबिक एक असल मार्क्सवाद लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करता है. इसलिए चुनावी राजनीति का रुख करने जा रहे गदर इन दिनों अपने इलाके के सभी बड़े मंदिरों के चक्कर लगा रहे हैं.

गदर के दिन में माओ के सिद्धांतों वाली क्रांति के लिए जगह है जिसमें वंचित अपने ऊपर राज कर रहे लोगों को उखाड़ फेंकते हैं. लेकिन वक्त ने उन्हें मानने पर मजबूर कर दिया है कि भारत में नक्सल आंदोलन भटक गया है और उसमें अब इतनी ताकत नहीं कि सरकार को पलट सके. खासकर आंध्र प्रदेश (तेलंगाना) में चले ऑपरेशन ग्रीन हंट के चलते उस इलाके में नक्लियों का ज़ोर कम हुआ है. आंध्र प्रदेश पुलिस की ग्रे हाउंड फोर्स ने उन्हें पड़ोस के छत्तीसगढ़ के जंगलों में खदेड़ दिया है. इसलिए गदर को 2017 के तेलंगाना में नई ज़मीन की तलाश है. वो कह रहे हैं कि अब चुनावी राजनीति के ज़रिए अपना मकसद पूरा करेंगे. वे इसमें कितने कामयाब होंगे, समय बताएगा.


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