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ब्रिटेन का वो नेता, जिसके PM बनने की बात पर अमेरिका-यूरोप की नींद उड़ जाती है

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जेरमी कोर्बिन. ब्रिटेन की लेबर पार्टी का मौजूदा मुखिया. 8 दिसंबर को उन्हें ‘मैकब्राइड इंटरनेशनल पीस प्राइज’ मिला. बहुत जाना-माना अवॉर्ड है ये. जिन सीन मैकब्राइड के नाम पर इसे शुरू किया गया, उन्होंने ऐमनेस्टी इंटरनेशनल की नींव रखी थी. किसी को ये अवॉर्ड मिले, वो भी एक नेता को, ये कोई छोटी बात नहीं थी. मगर दुनियाभर की मीडिया ने इसे छोटा बना दिया. बिल्कुल तवज्जो नहीं दी. बाहरी अखबारों  को छोड़िए, यहां तक कि ब्रिटेन के एक भी बड़े अखबार ने इसे इंचभर जगह नहीं दी. अगर किसी भी और नेता को ये पुरस्कार मिला होता तो ऐसा न होता. खूब बात होती. बधाइयां दी जातीं. ऐसा क्यों हुआ? क्या ये खबर गलती से छूट गई? मीडिया का ध्यान नहीं गया? वजह इनमें से कोई भी नहीं है. इसे जानकर छोड़ा गया. इसकी वजह हैं खुद कोर्बिन. पूरी संभावना है कि ये इंसान ब्रिटेन का अगला प्रधानमंत्री बन जाएगा. इसकी कल्पना से ही अमेरिका की नींद उड़ जाती है. जिस दिन कोर्बिन ब्रिटेन के PM बन गए, उस दिन से ब्रिटेन और अमेरिका की दोस्ती खत्म हो जाएगी.

कोर्बिन के प्रधानमंत्री बनने की संभावना से यूरोपीय देशों के पसीने छूटने लगते हैं. यहां तक कि ब्रिटिश मीडिया बौखला जाती है. आप कोर्बिन के बारे में इंटरनेट पर सर्च कीजिए. ज्यादातर ऐसी चीजें मिलेंगी, जहां बड़े-बड़े अखबार उनको कोस रहे होंगे. ऐसा नहीं कि कॉर्बिन में कोई कमी है या वो बुरे हैं. बल्कि ये सारा डर, सारी असुरक्षा इसलिए कि बाकियों के मन में चोर है. ये चोर ही है, जिसके कारण कोर्बिन को ब्रिटेनवाले ही ब्रिटेन का विरोधी ठहरा देते हैं. क्योंकि ये वो शख्स है, जो सत्ता मिलने पर ब्रिटेन को विनम्र बना देगा. उसकी अकड़ उठाकर कहीं फेंक आएगा. ब्रिटेन को वैसा बर्ताव ही नहीं करने देगा, जिसकी उसको आदत है.

चुनाव से एक हफ्ते पहले सर्वे में ये अनुमान जताया गया था कि लेबर पार्टी का बुरा हाल होने वाला है. इन सब कयासों को गलत साबित करते हुए कोर्बिन के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी ने उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छा किया. इतना कि जीतने वाली कंजरवेटिव पार्टी को हारा हुआ माना गया. और कोर्बिन हारकर भी जीत गए.
चुनाव से एक हफ्ते पहले सर्वे में ये अनुमान जताया गया था कि लेबर पार्टी का बुरा हाल होने वाला है. इन सब कयासों को गलत साबित करते हुए कोर्बिन के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी ने उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छा किया. कोर्बिन हारकर भी जीत गए.

कोर्बिन कहते हैं, अमेरिकी सरकार अपराधी है

एक छोटे से घर में रहने वाले जेरमी कोर्बिन अक्सर खुद साइकिल चलाकर दफ्तर आते-जाते दिखते हैं. खूब यात्राएं की हैं उन्होंने. कहते हैं, सभी संस्कृतियों के पास हमें सिखाने के लिए बहुत कुछ बेहतर है. पिछले 40 साल से लेबर के नेता हैं. मगर उसूलों पर बात आए तो अपनी ही पार्टी का विरोध कर देते हैं. 500 से ज्यादा बार अपनी ही पार्टी के खिलाफ वोट कर चुके हैं. जब दुनिया के ज्यादातर देश अमेरिका की चमचागिरी कर रहे होते हैं, तब कोर्बिन उसको लताड़ते हैं. उसे उसके गुनाह याद दिलाते हैं. कहते हैं, अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक में जो किया वो अपराध है.

कोर्बिन अमेरिका के सबसे बड़े राजनैतिक आलोचक हैं. कहते हैं, दुनिया में जो सबसे बड़े मसले हैं, उनमें से ज्यादातर अमेरिका के पैदा किए हुए हैं. वो अमेरिकी सरकार को कॉर्पोरेट का गुलाम कहते हैं.
कोर्बिन अमेरिका के सबसे बड़े राजनैतिक आलोचक हैं. कहते हैं, दुनिया में जो सबसे बड़े मसले हैं, उनमें से ज्यादातर अमेरिका के पैदा किए हुए हैं. वो अमेरिकी सरकार को कॉर्पोरेट का गुलाम कहते हैं. इराक और अफगानिस्तान युद्ध को अमेरिका का अपराध बताते हैं.

कोर्बिन PM बने तो अमेरिका और ब्रिटेन की दोस्ती टूट जाएगी

जब दुनिया की सरकारें हर चीज को प्राइवेट सेक्टर के हवाले करने पर तुली हैं, तब कोर्बिन पब्लिक सेक्टर की तरफदारी करते हैं. कहते हैं कि रेलवे जैसी सुविधाएं जनता के फायदे के लिए होनी चाहिए, मुनाफा कमाने के लिए नहीं. कहते हैं, अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगना चाहिए. कारोबारियों को मिलने वाली टैक्स छूट खत्म करनी चाहिए. अमीरों और गरीबों के बीच का अंतर कम होना चाहिए. कोर्बिन की दिक्कत उनकी ईमानदारी है. वो अपने समय से कहीं आगे के नेता हैं. इतने आगे कि अपने ही देश में अछूत समझ लिए जाते हैं. अमेरिका और यूरोपीय देश तो उनसे सहमते हैं. गजब की साफगोई है बंदे में. जिस बात को कहने से अच्छे-अच्छे डरते हैं, वो तपाक से बोल जाते हैं. अमेरिका के लिए तो खूब बोलते हैं. हद गरियाते हैं उसको. जनता को नहीं, नेताओं को.

वो कहते हैं, दुनिया में जितनी परेशानियां हैं उनमें आधे से ज्यादा तो अमेरिका की वजह से हैं. पिछले लंबे समय से ब्रिटेन अमेरिका का सबसे करीबी दोस्त रहा है. दोनों एक राह चलते हैं. अमेरिका जो करता है, ब्रिटेन उसमें साथ देता है. कोर्बिन के PM बनने से ये खत्म हो जाएगा. बिल्कुल खत्म. तब शायद फ्रांस करीब चला जाएगा अमेरिका के. जिनकी दाढ़ी में तिनका है, उनके पास कोर्बिन को नापसंद करने की कई बड़ी वजहें हैं. क्या, इसका नमूना नीचे पॉइंट्स में जानिए:

1. इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने इराकी शहरों में जो किया, वो वैसा ही था जैसा 2004 में अमेरिका ने इराक के फलुजा में किया था. दोनों में कोई अंतर नहीं है. अमेरिका का लालच ही है, जिसके कारण वो दूसरे देशों में जाकर जंग लड़ता है.
2. टोनी ब्लेयर सरकार ने इराक में जो कुछ भी किया, वो युद्ध अपराध है. वो लड़ाई गलत थी. अवैध थी. गैरकानूनी थी. ब्लेयर के ऊपर मुकदमा चलना चाहिए. उन्हें सजा मिलनी चाहिए. (टोनी और कोर्बिन दोनों लेबर पार्टी के हैं.)
3. परमाणु हथियारों को खत्म करना बहुत ज़रूरी है. पूरी दुनिया को ये न्यूक्लियर रेस खत्म करनी चाहिए. आपसी बातचीत से तमाम परमाणु हथियारों को खत्म करने की सहमति बनानी चाहिए.
4. मैनचेस्टर में आतंकी हमला होने के बाद कोर्बिन ने कहा: हमारे देश और हमारी सरकारों ने विदेशों में जो जंगें लड़ीं, जिन युद्धों में मदद दी, उसका हमारी जमीन पर होने वाली आतंकवादी घटनाओं से सीधा संबंध है. हमें ये मानने की बहादुरी दिखानी होगी कि ‘आतंक के खिलााफ जारी जंग’ का कोई अच्छा असर होता नहीं दिख रहा.
5. इजरायल का हक है होना. मैं उसके होने के खिलाफ नहीं हूं. मगर कब्जा करने, दमन करने और फिलिस्तीन के इलाके हथियाने का मैं पुरजोर विरोध करता हूं.
6. मार्च 2011 में जब डेविड कैमरॉन सरकार ने लीबिया पर बमबारी का फैसला किया, तो केवल 13 सांसद थे जिन्होंने इसका विरोध किया. इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने वालों में एक नाम कोर्बिन का भी था.
7. ब्रिटेन को सीरिया, इराक या किसी भी देश में जाकर जंग नहीं लड़नी चाहिए. किसी भी देश के ऊपर हवाई हमले नहीं करने चाहिए.
8. सीरिया में हवाई बमबारी करने से ISIS खत्म नहीं होगा. इससे निर्दोष लोग बेमौत मारे जाएंगे.
9. मैं राजशाही के खिलाफ हूं. मेरे लिए इसका कोई मतलब नहीं. अगर मुझे मौका मिले तो मैं ब्रिटेन के शाही परिवार को दिया जाने वाला रॉयल स्टेटस खत्म कर दूंगा. मगर मैं जानता हूं कि ब्रिटिश जनता अपनी रॉयल फैमिली को बहुत मानती है. मुझे बहुत सारी ज़रूरी लड़ाइयां लड़नी हैं. सो इस संघर्ष को मैं नहीं लड़ने वाला.
10. मैं ऐसा यूरोप चाहता हूं जो सामाजिक सुरक्षा दे. पर्यावरण से जुड़ी चीजों पर अच्छा काम करे. न कि केवल एक मुक्त बाजार बना रहे.
11. ब्रिटेन को NATO से अलग हो जाना चाहिए. इसमें शीत युद्ध के दौर की आक्रामकता और औपनिवेशिक मानसिकता है. सोवियत के पतन के बाद ही NATO को खत्म कर दिया जाना चाहिए था.
12. मैं पुतिन को पसंद नहीं करता. मगर ये सच है कि रूस जैसा आक्रामक बर्ताव कर रहा है, उसके लिए अमेरिका और यूरोप जिम्मेदार हैं. यूक्रेन में भी रूस ने जो किया, उसके लिए भी पश्चिमी देश जिम्मेदार हैं. ये असल में वेस्टर्न देशों का पाखंड है. NATO जिस तरह पूरब की ओर बढ़ता जा रहा था, ऐसे में रूस का यूक्रेन में उठाया गया कदम वाजिब था. हालांकि ये भी सच है कि रूस ने क्रीमिया पर कब्जा करके यूक्रेन की संप्रभुता को तोड़ा है.
13. कूटनीति का सबसे कारगर तरीका है कि सबसे बात करो. हर पक्ष से बात करो. किसी पक्ष को छोड़ने से, उसको किनारे कर देने से, समस्या सुलझने वाली नहीं है. इसीलिए हमें हमास और हिजबुल्लाह से भी बात करनी चाहिए. हमास फिलिस्तीन का चरमपंथी संगठन है. अमेरिका और यूरोपीय देश इसे आतंकवादी मानते हैं. हिजबुल्लाह शिया चरमपंथी संगठन है. फिलहाल लेबनान की सरकार में भागीदार है. इसका ईरान के साथ करीबी रिश्ता है. इसको भी आतंकवादी संगठन माना जाता है.
14. सैन्य कार्रवाई से बस खून-खराबा होता है. इससे कुछ बेहतर नहीं होता. कुछ सही नहीं होता.

15. शरणार्थियों के लिए दरवाजे बंद करना इंसानियत नहीं है. माइग्रेशन आज से नहीं हो रहा. ब्रिटेन दुनिया के सबसे अमीर देशों में से एक है. उसे गरीबों, मजबूरों के प्रति जिम्मेदारी निभानी चाहिए.

हमास फिलिस्तीनी आजादी का समर्थक है. कहता है, हथियार उठाए बिना इजरायल से पार नहीं पाया जा सकता है.
हमास फिलिस्तीनी आजादी का समर्थक है. कहता है, हथियार उठाए बिना इजरायल से पार नहीं पाया जा सकता है. कोर्बिन कहते हैं कि समस्या को सुलझाने के लिए हर पक्ष से बात की जानी चाहिए. क्योंकि जंग कोई मसला हल नहीं करती.

दुनिया के सबसे ईमानदार, बेहतरीन नेताओं में से एक हैं कोर्बिन

आज की तारीख में दुनिया के अंदर जो सबसे ईमानदार, सबसे संवेदनशील नेता हैं, उनमें से एक हैं कोर्बिन. मैं अक्सर ऐसी सुपरलेटिव डिग्री का इस्तेमाल नहीं करती. मगर, चूंकि बात कोर्बिन के बारे में हो रही है, सो ‘बेहतरीन’ जैसी सुपरलेटिव डिग्री का इस्तेमाल करना बनता है. गजब के इंसान हैं वो. पूरी तरह से इंसानियत से भरे. ‘अमेरिका फर्स्ट’ और फलां फर्स्ट के दौर में ‘ह्यूमन फर्स्ट’ सोचने वाले. चोर को चोर कह देते हैं. इतनी साफगोई है इस इंसान में कि ब्रिटेन जैसे पूंजीवादी देशों के लिए तो ईशनिंदा ही समझ लीजिए. अभी हाल ही में डेविड केमरॉन ने इस्तीफा दिया था. इसके बाद ब्रिटेन में चुनाव हुए. कंजरवेटिव, यानी टोरी पार्टी की जीत हुई. टरीजा मे बनीं प्रधानमंत्री. मगर उनकी जीत में भी हार थी.

असली जीत हुई थी कोर्बिन की. लेबर पार्टी ने जबरदस्त वापसी की. कंजरवेटिव को कुल 318 सीटें मिलीं. पिछले चुनाव से 13 कम. वहीं लेबर पार्टी को 262 सीटें मिलीं. पिछली बार से 32 सीटें ज्यादा. कंजरवेटिव पार्टी के कई मंत्री हार गए. सबसे पक्की सीटें उनके हाथ से निकल गईं. ये छोटी बात नहीं. ये जो चुनाव था, वो ब्रेग्जिट पर हुआ था. ब्रेग्जिट, यानी यूरोपियन यूनियन को ब्रिटेन का टाटा बाय-बाय. जब ब्रेग्जिट रेफरेंडम को वहां की जनता ने जिता दिया, तो कैमरॉन ने इस्तीफा दे दिया. तो ये चुनाव ब्रेग्जिट पर भी फैसला था. मालूम था कि कंजरवेटिव पार्टी इसपर आगे जाएगी. तब फिर उसका प्रदर्शन इतना खराब रहा. इस चुनाव के हीरे थे कोर्बिन. युवाओं के बीच बहुत लोकप्रिय हैं वो. कहते हैं, अर्थव्यवस्था की हालत खराब होने का मतलब ये नहीं कि सरकार अपनी जिम्मेदारियां भूल जाए. कल्याणकारी योजनाएं किसी भी सूरत में बंद नहीं की जानी चाहिए.

यहूदियों का अतीत बहुत मार्मिक रहा है. बड़े जुल्म सहे हैं उन्होंने. हिटलर के दौर में उनके साथ जो हुआ, वो कभी नहीं भूला जाना चाहिए. मगर फिलिस्तीन के साथ इजरायल फिलहाल जो कर रहा है, उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता. पश्चिमी देश इस संवेदनशील मुद्दे पर बचकर निकल जाते हैं. मगर कोर्बिन तो कोर्बिन हैं. वो खुलकर बोलने से कोई परहेज नहीं रखते.
यहूदियों का अतीत बहुत मार्मिक रहा है. बड़े जुल्म सहे हैं उन्होंने. हिटलर के दौर में उनके साथ जो हुआ, वो कभी नहीं भूला जाना चाहिए. मगर फिलिस्तीन के साथ इजरायल फिलहाल जो कर रहा है, उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता. पश्चिमी देश इस संवेदनशील मुद्दे पर बचकर निकल जाते हैं. मगर कोर्बिन तो कोर्बिन हैं. वो खुलकर बोलने से कोई परहेज नहीं रखते.

शायद वेस्ट के इकलौते नेता हैं, जो खुलकर फिलिस्तीन का साथ देते हैं

कोर्बिन की बातें किसी खुशहाल सपने जैसी लगती हैं. आज के टाइम में सरकारें कॉर्पोरेट सेक्टर की चमचागिरी करती हैं. ऐसे दौर में कोर्बिन स्वास्थ्य सुविधाएं मुफ्त करने की बात करते हैं. कहते हैं, पढ़ाई मुफ्त होनी चाहिए. उन्होंने ये तक कहा कि पहले की लेबर सरकारों के वक्त में जिन लोगों को अपनी पढ़ाई के लिए खूब खर्च करना पड़ा, एजुकेशन लोन लेना पड़ा, उनसे वो माफी मांगते हैं. कोर्बिन के अलावा एक नेता बता दीजिए अमेरिका और यूरोप का, जो फिलिस्तीन का खुलकर साथ देता हो. उनकी तकलीफों के बारे में बोलता हो. बहुत हिम्मत चाहिए होती है ऐसा करने के लिए. इजरायल के लिए जिस तरह की भावनाएं जुड़ी हैं, उनमें फिलिस्तीन के दुख-दर्द के बारे में बोलना भी यहूदी-विरोधी बता दिया जाता है. हिटलर के समय में यहूदियों के साथ जो अमानवीयता हुई, उसके कारण ‘ऐंटी-सेमेटिक’ किसी शर्मनाक गाली से कम नहीं है. लोग भूल जाते हैं कि बहस इजरायल के होने या न होने की नहीं है. बहस है उसके औपनिवेशिक रवैए की. अपने पांव पसारकर फिलिस्तीनी आबादी के इलाकों पर कब्जे से दिक्कत है. ये उतना ही बुरा है, जितना बुरा ‘ऐंटी-सेमेटिक’ होना है. ये बात इसलिए भी मायने रखती है कि इजरायल के गठन में जिन देशों का हाथ था, उनमें ब्रिटेन सबसे ऊपर है.

चुनाव में कंजरवेटिव पार्टी जीत गई. मगर ये जीत कामयाबी नहीं थी. करारी हार थी उनके स्टैंड की. टरीजा मे के चुनाव अभियान की विफलता थी. कोर्बिन बाजीगर निकले. हारे, मगर फिर भी जीत गए.
चुनाव में कंजरवेटिव पार्टी जीत गई. मगर ये जीत कामयाबी नहीं थी. करारी हार थी उनके स्टैंड की. टरीजा मे के चुनाव अभियान की विफलता थी. कोर्बिन बाजीगर निकले. हारे, मगर फिर भी जीत गए. अगर 2020 में भी वो लेबर के लीडर रहते हैं, तो PM बन सकते हैं.

कोर्बिन जैसे हैं, वैसा होना बहुत मुश्किल है नेताओं के लिए

कोर्बिन शायद इकलौते नेता हैं वेस्ट के, जो लैटिन अमेरिकी क्रांतियों की तारीफ करते हैं. लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले नागरिकों का हौसला बढ़ाते हैं. कोर्बिन जैसे हैं, वैसा होना बहुत मुश्किल है. खासतौर पर अमेरिका और यूरोप में तो बहुत ही ज्यादा मुश्किल है. जिन देशों के अंदर अपने आप को सबसे ऊपर मानने की और औरों पर हावी होकर अपना फायदा निकालने की आदत है, उन्हें कोर्बिन से खतरा है. कमजोर देशों का शोषण करने वाले ताकतवर देशों को कोर्बिन से खतरा है. बस अमीरों का बात करने वाली सरकारों को कोर्बिन से खतरा है. कॉर्पोरेट लालच के कारण जंग लड़ने वालों को कोर्बिन से खतरा है. जाहिर सी बात है, ऐसे नेता की तारीफ करना उनके एजेंडे में नहीं है. इसीलिए उनके अवॉर्ड जीतने की बात यूं दबा दी जाती है कि किसी को कुछ मालूम ही न चले. कोई न जान पाए कि गलत को बेखौफ होकर गलत कहने वाले नेता अब भी होते हैं.


टीम लल्लनटॉप गुजरात के चप्पे-चप्पे से आपके लिए लाई है जमीनी खबरें. कमरे में बैठकर नहीं किया चुनाव कवर. जमीन पर उतरे. चुनाव से जुड़ी सभी खबरें पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट के ‘चुनाव’ सेक्शन में जाएं. कुछ खबरों के लिंक नीचे हैं, उन्हें भी देख लें: 

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