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हिंदी फिल्मों की सबसे बड़ी मां जिसे उसके असल बेटे ने बहुत दुख दिए

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‘विजय… बड़ा सौदागर बन गया है रे. मगर एक बात बोलूं, अपनी मां को खरीदने की कोशिश मत कर. तू अभी इतना अमीर नहीं हुआ है कि अपनी मां को खरीद सके.’

‘दीवार’ फिल्म में 1 घंटे, 54 मिनट के बाद जब निरूपा रॉय ये डायलॉग बोलकर शशि कपूर के साथ घर से निकल जाती हैं तो अमिताभ बच्चन के पास करने के लिए कुछ नहीं बचता. ‘दीवार’ में सपोर्टिंग एक्टर होने के बावजूद अमिताभ ने शशि कपूर से ज्यादा तारीफ पाई थी, लेकिन जब-जब निरूपा रॉय स्क्रीन पर आतीं, आपके पास सिर्फ उन्हें देखने के अलावा कोई चारा नहीं होता है.

‘दीवार’ ही वो फिल्म थी, जिसने हिंदी सिनेमा के हाथ पर लिख दिया कि निरूपा रॉय उसकी मां है. वैसे निरूपा को सुमित्रा देवी का रोल मिलने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. बताते हैं कि यश चोपड़ा इस रोल के लिए पहले वैजयंती माला को लेना चाहते थे. जब वैजयंती को पता चला कि राजेश खन्ना ने ये फिल्म करने से इनकार कर दिया है तो उन्होंने भी खुद को पीछे कर लिया. फिर यशजी को ख्याल आया वहीदा रहमान का, लेकिन वहीदा ‘कभी-कभी’ में अमिताभ के अपोजिट कास्ट हो चुकी थीं, तो ये आइडिया भी ड्रॉप कर दिया गया. आखिर में ये रोल आया निरूपा रॉय के हिस्से में. बाकी सब इतिहास है.

खैर, ‘दीवार’ के बारे में बातें तो खत्म होंगी नहीं, पर आज निरूपा की बात…


एक अखबार के ऐड के की वजह से सिनेमा को मिलीं निरूपा

निरूपा का असल नाम कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा था. वो गुजरात के वलसाड में पैदा हुई थीं. निरूपा महज चौथी क्लास तक पढ़ी थीं और 15 साल की उम्र में ही उनकी शादी सरकारी मुलाजिम कमल रॉय से कर दी गई थी. एक दिन पति-पत्नी बैठे अखबार पढ़ रहे थे तो उन्हें एक विज्ञापन दिखा. ‘अभिनेता-अभिनेत्रियों की जरूरत है.’ दोनों मुंबई गए, लेकिन कास्ट सिर्फ कोकिला को किया गया. ये उनका और फिल्म इंडस्ट्री का पहला परिचय था.

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फिर उन्होंने नाम बदलकर निरूपा रॉय रख लिया और 1946 में उनकी पहली फिल्म रिलीज हुई ‘रनक देवी’ जो गुजराती भाषा में थी. इसी साल उनकी पहली हिंदी फिल्म भी रिलीज हुई, ‘अमर राज’. और फिर ये सफर चलता गया… चलता गया. गुजराती फिल्म इंडस्ट्री की शुरुआत में भी निरूपा का काफी योगदान है.


 

सिर्फ ‘मां’ ही नहीं थीं निरूपा

निरूपा रॉय को सिर्फ उनके मां वाले किरदारों के लिए याद किया जाता है, लेकिन इस रवायत में उनके पुराने किरदार भुला दिए जाते हैं. शुरुआती दिनों में निरूपा कई फिल्मों में लीड हीरोइन रही थीं. हिंदी सिनेमा की उल्लेखनीय फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में भी निरूपा का किरदार था, जिसने उन्हें स्थापित हीरोइनों के तौर पर स्थापित किया. त्रिलोक कपूर के साथ तो उन्होंने 18 फिल्में की थीं. भारत भूषण, बलराज साहनी और अशोक कुमार के साथ भी निरूपा ने ढेर सारी फिल्में की थीं, जिनमें वो मुख्य किरदारों में थीं.

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निरूपा को शुरुआती दिनों में रूढ़िवादी भारतीय महिलाओं के रोल दिए गए. कहीं वो अपने पति के जूते खोलते दिखती थीं तो कहीं गांव में घर का काम करते हुए. लेकिन इसका उनकी एक्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ा. आज 2016 में बिकिनी, पूल और किसिंग सीन्स पर इतनी हायतौबा होती है, लेकिन निरूपा ने उस वक्त भी ऐसे सीन बड़े स्वाभाविक तरीके से किए. ‘तांगेवाली’, ‘दो बीघा जमीन’, ‘गुणसुंदरी’, ‘रानी रूपमती’ और ‘गरम कोट’ उनकी यादगार फिल्में हैं.

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1951 में रिलीज हुई फिल्म ‘हर हर महादेव’ में उन्होंने देवी पार्वती का किरदार इतनी इंटेंसिटी से निभाया कि लोगों ने सच में उन्हें देवी मान लिया था. रामायण के अरुण गोविल की तरह निरूपा के घर के सामने भी लोगों की लाइन लगती थी जो उनसे आशीर्वाद लेने आते थे. निरूपा के बारे में और दिलचस्प फैक्ट है कि तीन फिल्मों में सपोर्टिंग ऐक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने वाली वो पहली एक्ट्रेस थीं. ये अवॉर्ड उन्हें ‘मुनीम जी’, ‘छाया’ और ‘शहनाई’ के लिए मिला था.


 

सिने-मा

किसी हीरोइन के 35 पार होते ही उसे मां के रोल थमाने की बॉलीवुड की पुरानी परंपरा है. निरूपा को 1970 के बाद से मां के रोल ऑफर होने लगे थे और यहीं से सिने-मा की सूरत बदल गई. फटे-पुराने-मैले कपड़ों में एक गरीब मां जो बड़ी मुश्किल से अपने बच्चों को पालती है. निरूपा ने ऐसे किरदारों को इतनी इंटेसिटी से परदे पर उतारा कि उन्हें ‘Queen of Misery’ का टाइटल दिया गया.

‘दीवार’ के क्लाइमैक्स में जब अमिताभ निरूपा की गोद में दम तोड़ते हैं तो निरूपा इतनी जोर से चीखती हैं कि सच में मरा हुआ कोई बेटा भी वापस आ जाए. ये वो सीन है जब निरूपा का चेहरा, उनकी आवाज, उनके हाथ, यहां तक कि उनकी सफेद मैली साड़ी भी एक्टिंग करने लगती है.

‘मर्द’ फिल्म में जब निरूपा का बच्चा अनाथालय से खो जाता है, तब वो बदहवास होकर सड़क पर चीखते हुए भागती हैं. उसी समय उनकी आवाज चली जाती है. उस सीन में निरूपा की एक्टिंग इतनी शानदार है कि देखनेवाले को खुद अपना गला चोक होता महसूस होने लगता है.

निरूपा राय वो एक्ट्रेस हैं जो देव आनंद, अमिताभ बच्चन, शशि कपूर और मिथुन जैसे बड़े एक्टर्स की मां का किरदार निभा चुकी हैं. वो इकलौती एक्ट्रेस हैं, जिन्होंने दो-दो पीढ़ियों के एक्टर्स की मां के रोल निभाए हैं. परदे पर वो धर्मेंद्र और सनी देओल की मां का किरदार निभा चुकी हैं. निरूपा 1955 में आई एक फिल्म में देव आनंद की मां बनी थीं, जबकि दोनों की उम्र में सिर्फ 8 साल का फर्क था.


 

निरूपा पर बहू ने दहेज प्रताड़ना का केस किया था

परदे पर दुखियारी मां और प्यार करने वाली सास के किरदार निभाने वाली निरूपा की असल जिंदगी की घटनाएं उनकी छवि से बहुत उलट रहीं. निरूपा के दो बेटे हैं, योगेश और किरन. उनके छोटे बेटे की पत्नी उना रॉय ने निरूपा, उनके पति कमल और उनके बड़े बेटे पर दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज कराया था. ये 2001 की बात है जब निरूपा के गिरफ्तार होने तक की नौबत आ गई थी. उनकी बहू ने उनके परिवार पर काले धन से जुड़े गंभीर आरोप भी लगाए थे और कहा था कि निरूपा ने उसे घर से निकाल दिया था. उन्हें किसी फिल्मी बेटे ने इतने दुख नहीं दिए जितने उनके बड़े बेटे ने कथित तौर पर दिए.


 

प्रॉपर्टी को लेकर अक्सर भिड़ते रहे निरूपा के बेटे

निरूपा के मौत के बाद उनके दोनों बेटों में प्रॉपर्टी को लेकर अक्सर झगड़ा होता रहा. वैसे ये हैरानी की बात है कि महज चौथी क्लास तक पढ़ीं निरूपा ने 1963 में मुंबई के नेपियन सी रोड पर 10 लाख रुपए की प्रॉपर्टी खरीदी थी. इस प्रॉपर्टी में 3 हजार स्क्वायर फिट में फैला घर और 8 हजार स्क्वायर फिट का गार्डन है. बताते हैं कि अब इसकी कीमत 100 करोड़ के आसपास है. निरूपा के मौत के बाद उनके पति कमल इसके मालिक हो गए थे, लेकिन कमल की मौत के बाद दोनों बेटों में इसके लिए लड़ाई हो गई.

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छोटे बेटे किरन का दावा था कि उनके बड़े भाई योगेश ने निरूपा और कमल को खूब परेशान किया था, जिसकी वजह से दोनों लोग ये प्रॉपर्टी उनके नाम कर गए थे. किरन के मुताबिक निरूपा ने उनसे यहां तक कह दिया था कि उनकी मौत के बाद उनके बेडरूम में किरन ही रहें और योगेश को उस कमरे में घुसने दें. इस बारे में जब भी योगेश से सवाल किए गए, वो हमेशा जवाब देने से बचते रहे.

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About the iconic mother of Hindi cinema, Nirupa Roy and the real misery of her life

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