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क्यों दिल्ली के इस ईसाई धर्मगुरु की प्रार्थना हम सभी को पढ़नी चाहिए

इन सवालों पर गौर करें –

#.1 मोदी रोको मिशन में जुटा चर्च?

#.2 वेटिकन से तय होगी भारत की सरकार?

#.3 चुनाव से पहले चर्च की चिट्ठी क्यों?

#4. चुनाव का साल, चर्च की चाल?

इससे बुरा क्या हो सकता है कि ज़रूरी खबरें बताने की जगह मीडिया को अपना समय ये बात साफ करने में लगाना पड़े कि भैया फलानी घटना ‘खबर’ है ही नहीं. कुछ नहीं हुआ है. कोई चिंता की बात नहीं. सब घर जाओ. 23 मई, 2018 का दिन ऐसा ही है, जब लल्लनटॉप आपको ये बताना चाहता है कि दिल्ली के आर्चबिशप और चर्च से जुड़ी कोई ‘खबर’ न थी, न है. खबर इसलिए नहीं, क्योंकि आर्चबिशप ने कुछ भी विवादास्पद नहीं कहा है. जो सारे सवाल ऊपर पूछे गए हैं, वो पूरी तरह से बेबुनियाद हैं. लेकिन पब्लिक को तो लॉजिक मांगता, दलील नको. तो हम आपको टोपला भर के लॉजिक देंग.

पहले जान लीजिए कि आर्कबिशप ने कहा क्या?

आर्चबिशप की चिट्ठी पर तरह-तरह की आपत्तियां उठाने वाले ज़्यादातर लोग वही हैं जिन्हें इतना तक नहीं मालूम कि आर्चबिशप होता क्या है. ईसाई अलग-अलग पंथों में बंटे हुए हैं. हर पंथ का अपना एक ‘चर्च’ होता है, जैसे मठ होते हैं. इस चर्च के तहत उस पंथ के सारे चर्च (शहर, गांव, जंगल, पहाड़ जहां भी वो बने हों) काम करते हैं. जैसे मठों में महंतों के रैंक होते हैं, चर्च में भी होते हैं. ऐसा ही एक सामान्य ओहदा है बिशप. इनपर सामान्यतः किसी एक चर्च में कोई ज़िम्मेदारी होती है. अब ऐसे बिशप जो एक पूरे शहर के लिए ज़िम्मेदार होते हैं, उन्हें कहते हैं आर्चबिशप. तो दिल्ली के आर्चबिशप मोस्ट रेवरेंड अनिल जे.टी. कूटो दिल्ली के इंचार्ज हैं. नाम में ‘मोस्ट रेवरेंड’ लगा है, इसलिए ये समझें कि आर्चबिशप कूटो का ताल्लुक कैथलिक ईसाईयत से है (यहीं से ‘वेटिकन’ वाला बेहूदा इल्ज़ाम आता है).

अब आते हैं आर्चबिशप की चिट्ठी पर, जिसे लेकर सारा बवाल कटा है. पहले आप चिट्ठी देख लीजिए.

8 मई की चिट्ठी पर 22 मई को अचानक विवाद होता है. साज़िश की बू उन खबरों से ही आती है, जिन्होंने इस चिट्ठी को विवादास्पद बताया.
8 मई की चिट्ठी पर 22 मई को अचानक विवाद होता है. साज़िश की बू उन खबरों से ही आती है, जिन्होंने इस चिट्ठी को विवादास्पद बताया.

जो अंग्रेज़ी नहीं समझते, उनके लिए हम चिट्ठी का अनुवाद यहां दे रहे हैं, बिना किसी काट-छांटः

8 मई, 2018

दिल्ली आर्चडायोसीस के तहत आने वाले सभी पैरिश प्रीस्टस (कैथलिक चर्च में एक ओहदा) और धार्मिक संस्थानों के लिए

विषयः हमारे देश के लिए प्रार्थना

प्रिय पिताओं, भाइयों और बहनों,

हम एक अस्थिर राजनैतिक माहौल में जी रहे हैं. ये हमारे संविधान और हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने में निहित लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक खतरा है.

हमारे देश और उसके नेताओं के लिए प्रार्थना करना हमेशा हमारी पवित्र परंपरा का हिस्सा रहा है. और अब जब आम चुनाव आने वाले हैं, प्रार्थना की और ज़्यादा ज़रूरत है.

13 मई वर्जिन मैरी से जुड़ा एक पवित्र दिन है. तो आइए, 13 मई, 2018 से हम 2019 में बनने वाली नई सरकार के लिए प्रार्थना करना शुरू करें.

मेरा अनुरोध है कि आप सभी हर शुक्रवार को कम से कम एक वक्त का उपवास रखें और अपने तथा देश के आध्यात्मिक नवीनीकरण में अपनी ऊर्जा लगाएं.

मेरी ये भी अनुरोध है कि आप सभी हर शुक्रवार को एक मुफीद समय पर प्रार्थना सभाएं कराएं. ये प्रार्थना सभाएं हमसे जुड़े सारे संस्थानों में हों और इनमें हमारे देश की बेहतरी की दुआ मांगी जाए.

इन सभाओं में आप चाहें तो संलग्न प्रार्थना पढ़ सकते हैं.

भवदीय
अनिल कूटो
आर्कबिशप, दिल्ली

नोटः ये लेटर 13 मई, 2018 (रविवार) को होने वाली प्रार्थना सभा में पढ़ा जाए.

इसी चिट्ठी के साथ प्रार्थना भी थी –

इस प्रार्थना में कहीं भी सत्ताधारी भाजपा को निशाना नहीं बनाया गया है. सभी के मंगल की कामना है. सभी में भाजपा भी आती है.
इस प्रार्थना में कहीं भी सत्ताधारी भाजपा को निशाना नहीं बनाया गया है. सभी के मंगल की कामना है. सभी में भाजपा भी आती है.

प्रार्थना का हिंदी अनुवाद-

हमारे देश के लिए प्रार्थना

आज़ादी और प्रेम के स्रोत हमारे प्रभु, सत्य का प्रकाश हमारे देश पर बरसाएं, ताकि असत्य का अंधेरा दूर हो.

संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के भाव, और हमारे देश की नींव रखने वाले महापुरुषों के सपनों को साकार करें.

सभी जाति, संप्रदाय और रुझानों वाले लोग शांति और सद्भाव से साथ रहें, हिंसा और नफरत से दूर.

हे प्रभु, हमारी विधायिका सोचने-समझने वालों के मिलने की जगह बने. हमारी न्यापालिका ईमानदारी, विवेक और न्याय की राह पर चले. हमारा प्रिंट, विज़ुअल और सोशल मीडिया सत्य का माध्यम बने ताकि विमर्श आगे बढ़े. देश के संस्थानों को बुरी ताकतों से बचाएं.

देश के गरीबों को आजीविका के साधन मिलें. दलित, आदिवासी समाज में हाशिए पर ठेल दिए गए लोगों को देश निर्माण की मुख्यधारा में लौटाएं. जीवन के हर हिस्से में न्याय और ईमानदारी का वास हो.

हमारे चुनाव लोकतंत्र के असल मूल्यों पर चलते हुए गरिमा के साथ लड़े जाएं. हमारे राजनेता ईमानदार और देशभक्त हों.

हे प्रभु, इस समय जब सत्य, न्याय और स्वतंत्रता संकट के बादलों में घिर रहे हैं, हमारी ये प्रार्थना सुनें.

हे परमपिता, हमारे देश को आपकी पवित्र आत्मा का आशीष मिले.

हे मदर मैरी, हमारे और हमारी तरह जूझ रहे सभी देशों को उम्मीद की राह दिखाएं.

***

 

कोई क्रिया हुई ही नहीं है. लेकिन हिंदू धर्म के स्वघोषित पैरोकार प्रतिक्रिया की रट लगाने लगे हैं.
कोई क्रिया हुई ही नहीं है. लेकिन हिंदू धर्म के स्वघोषित पैरोकार प्रतिक्रिया की रट लगाने लगे हैं.

तीन वजहें, जो बताती हैं कि सारा विवाद बेबुनियाद था

1. ये भाजपा या हिंदुत्व को नुकसान पहुंचाने साज़िश नहीं है

हमने आपको चिट्ठियां दिखाईं. अनुवाद भी पढ़ाया. ये कहीं से नहीं लगता कि चिट्ठी की भाषा कहीं से भी सरकार या एक पार्टी पर हमला कर रही है. एक पार्टी, अमुक पार्टी, सत्ताधारी पार्टी वगैरह शब्द भी नहीं हैं. तो अगर सरकार में मंत्री या भाजपा से जुड़े नेता चिट्ठी को विवादास्पद बताते हैं तो उन्हें ये भी बताना चाहिए कि विवाद है किस बात पर.

2. अगर पार्टी या सरकार पर प्रश्न है तो भी क्या गलत है?

मान लेते हैं कि आर्कबिशप ने लेटर में कुछ अदृश्य टेक्स्ट लिखा है जो हमें नज़र नहीं आया लेकिन सत्तापक्ष के लोगों को नज़र आ गया. और ये टेक्स्ट सरकार और सरकार चला रही पार्टी के खिलाफ जाता है. तब भी आर्कबिशप की चिट्ठी को विवादास्पद नहीं कहा जा सकता. आर्कबिशप कूटो इसी देश के नागरिक हैं. और उनसे सवाल पूछ रहे लोगों की ही तरह उनके पास भी अभिव्यक्ति का अधिकार है. अगर उन्हें ऐसा लगता है कि उनके समाज पर किसी तरह का खतरा है तो उन्हें इस बारे में आवाज़ उठाने का पूरा हक होना चाहिए. हिंदू धर्मगुरु भी लगातार सरकार पर सवाल उठाते हैं. मध्यप्रदेश में नर्मदा घोटाले में संत समाज ने शिवराज सरकार को चोर तक कहा है. लेकिन हमें नहीं याद कि उन संतों पर किसी ने सवाल उठाए हों.

rajnath

3. ‘खतरा’ है भी तो कितना बड़ा

मान लेते हैं कि आर्कबिशप की चिट्ठी से सारे ईसाई सरकार के दुश्मन हो जाएंगे और 2019 में भाजपा को वोट नहीं डालेंगे. लेकिन इसका भाजपा की सेहत पर कोई असर पड़ेगा, ऐसा नहीं लगता. भारत की आबादी 132 करोड़ से ज़्यादा है. इसमें ईसाई तीन करोड़ से भी कम हैं. उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली लोकसभा सीटों को छोड़ दें तो वो कहीं प्रभावी वोटबैंक नहीं हैं. ऐसे में वो भाजपा को वोट दे न दें, उसके प्रदर्शन पर कोई असर पड़ेगा, इसकी संभावना न्यूनतम है.

इति.

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