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IMA देहरादून का 'शेरू', जो अब तालिबान के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक है

पूरी दुनिया में इस समय कोविड-19 महामारी से भी ज्यादा चर्चा तालिबान की है. वो घोषणा कर चुका है कि अफगानिस्तान की अगली सरकार लोकतांत्रिक नहीं होगी. ऐसे में दुनियाभर के देश इस बात पर नज़रें टिकाए हैं कि अब कौन से तालिबानी लीडर अफगानिस्तान की सत्ता संभालेंगे. मुल्ला बरादर, हिब्तुल्लाह अखुंदज़ादा जैसे नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं. तालिबान के इन सबसे ताकतवर नेताओं में एक नाम शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकज़ई का भी है.

भारत से है संबंध

शेर मोहम्मद अब्बास का भारत से भी नाता है. वो देहरादून की इंडियन मिलिट्री अकेडमी (IMA) के 1982 बैच में शामिल था. उस समय के उसके बैचमेट शेर मोहम्मद को ‘शेरू’ नाम से जानते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘शेरू’ यानी शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई ने डेढ़ बरस तक IMA में रहकर ट्रेनिंग प्राप्त की थी. इसके कुछ समय बाद वो अफगानिस्तान चला गया था. और उसके कुछ वक्त बाद वहां तालिबान के साथ हो लिया. ‘शेरू’ आज इस संगठन का बड़ा नेता बन चुका है.

मेजर जनरल (रिटायर्ड) डीए चर्तुवेदी ने TOI से बात करते हुए कहा,

“मुझे आज भी याद है. उसकी उम्र बाकियों से कुछ ज़्यादा थी. हमेशा मूंछें रखता था. लेकिन उस वक्त वो कट्टरपंथी विचारों वाला नहीं लगा था.”

Afghan Peace Talks With Taliban In Doha
सितंबर 2020 में अफगान सरकार और तालिबान के बीच शुरू हुई शांति वार्ता के दौरान शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकज़ई, लाल घेरे में. (तस्वीर- पीटीआई)

तालिबान सरकार में मंत्री भी रहा

कर्नल (रिटायर्ड) केसर सिंह शेखावत उस वक्त शेर मोहम्मद के बैचमेट थे. अखबार के मुताबिक, ये लोग साथ में ऋषिकेश भी गए थे. IMA में ट्रेनिंग के बाद शेर मोहम्मद ने अफगान नेशनल आर्मी जॉइन कर ली थी. वहां वो लेफ्टिनेंट के पद पर था और सोवियत-अफगान वॉर में लड़ा भी था. उसके बाद वो तालिबान के संपर्क में आया. 1996 में ही तालिबान से पूरी तरह जुड़ा और 1996 से 2001 तक जब तालिबान की सत्ता थी तो विदेश मामलों के सहायक मंत्री के पद पर भी रहा था. उस दौरान तालिबान का एक प्रतिनिधिमंडल अमेरिका भी गया था. बिल क्लिंटन से मिलकर बात करने के लिए. उसमें भी शेर मोहम्मद शामिल था.

IMA में शेर मोहम्मद के बैचमेट रहे लोगों का कहना है कि अगर वो अब तालिबान सरकार में अहम पद पर आता है तो भारत-अफगानिस्तान संबंध के लिहाज से अहम साबित हो सकता है. क्योंकि शेर मोहम्मद की भारत से जुड़ी पुरानी यादें हैं. इन बैचमेट्स के मुताबिक, ऐसे में मुमकिन है कि वो दोनों देश के संबंध ठीक रखने में अहम साबित हो.

ख़ैर, ये बात कितनी सही या ग़लत साबित होगी, ये तो आना वाला वक्त ही बताएगा. फिलहाल तो भारत सरकार भी अफगानिस्तान पर कोई भी स्टैंड लेने से पहले वेट एंड वॉच की पॉलिसी पर चल रही है और वहां नई सरकार के सामने आने का इंतज़ार कर रही है.


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